
भारतीय थाली, जो सदियों से विविधता और संतुलन का प्रतीक रही है, अब एक नए युग में प्रवेश कर रही है - जहां स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य और पोषण को भी प्राथमिकता दी जा रही है। यह बदलाव केवल घरों तक सीमित नहीं है, बल्कि रेस्टोरेंट, डिजिटल अभियानों और शोध रिपोर्टों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में, पारंपरिक थाली को हेल्दी किचन ट्रेंड के रूप में पुनः अपनाया जा रहा है। न्यूट्रिशनिस्ट ल्यूक कौटिन्हो ने हाल ही में चेतावनी दी कि कई लोग थाली में अनजाने में कार्बोहाइड्रेट पर अधिक निर्भर हो जाते हैं, जबकि दाल और सब्जियां कम हो जाती हैं। वे सलाह देते हैं कि थाली में सबसे पहले सब्जियां और प्रोटीन लें, और रोटी-चावल बाद में खाएं - इससे रक्त शर्करा नियंत्रित रहता है और संतुलन बना रहता है।
इसी तरह, लखनऊ में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में डॉ. पूनम तिवारी (डाइटेटिक्स प्रमुख, डॉ. राम मनोहर लोहिया संस्थान) ने पारंपरिक थाली को सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर करने और फास्ट फूड पर निर्भरता कम करने का एक मॉडल बताया। उन्होंने कहा कि आयरन, फोलिक एसिड से समृद्ध फोर्टिफाइड गेहूं की रोटियां, दाल (प्रोटीन, जिंक, मैग्नीशियम), मौसमी हरी सब्जियां (विटामिन A, कैल्शियम, आयरन), दही (कैल्शियम, प्रोबायोटिक्स) और सलाद (विटामिन C) मिलाकर एक संतुलित थाली तैयार की जा सकती है।
नवरात्रि जैसे त्योहारों में भी थाली को हेल्दी बनाने के प्रयास बढ़ रहे हैं। कई होटल और रेस्टोरेंट अब पारंपरिक व्यंजनों को मिलेट्स, ग्लूटेन-फ्री विकल्पों और कम तेल-शक्कर वाले रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। जैसे कि, साबूदाना खिचड़ी, स्वीट पोटैटो टिक्की जैसी चीजें शामिल की जा रही हैं।
बेंगलुरु में भी एक 'ग्रीन रिवॉल्यूशन' चल रहा है - जहां रेस्टोरेंट्स अब मौसमी सब्जियों, क्षेत्रीय सामग्री और हल्के, पौष्टिक व्यंजनों को थाली का केंद्र बना रहे हैं। यह बदलाव स्वास्थ्य, स्थिरता और हल्के भोजन की चाहत से प्रेरित है।
एक हालिया अध्ययन (Nature, अप्रैल 2026) में प्रोफेसर शमीका रवि और सहयोगियों ने पाया कि 2011–12 से 2023–24 तक भारत में खाद्य खर्च में बदलाव आया है। अनाज पर खर्च घटा है, जबकि दूध, फल और कुछ क्षेत्रों में मांस का सेवन बढ़ा है। यह दर्शाता है कि थाली अब केवल अनाज नहीं, बल्कि पोषक तत्वों से भरपूर विविधता की ओर बढ़ रही है।
हालांकि हेल्दी थाली की मांग बढ़ रही है, लेकिन इसकी लागत भी बढ़ी है। क्रिसिल इंटेलिजेंस की Roti Rice Rate (RRR) रिपोर्ट के अनुसार, जून 2026 में एक शाकाहारी थाली की औसत लागत ₹27.4 हो गई, जो पिछले वर्ष ₹26.1 थी। वहीं, मांसाहारी थाली ₹58.2 तक पहुंच गई, जो पिछले वर्ष ₹54.9 थी। टमाटर, खाना पकाने के तेल और LPG की बढ़ी कीमतें इसका मुख्य कारण हैं।
UNICEF इंडिया ने मई 2025 में #MeriThaliSehatwali डिजिटल अभियान शुरू किया, जिसका उद्देश्य परिवारों में स्वस्थ भोजन और विविध रंगीन थाली की आदत को बढ़ावा देना है। अभियान में छह सरल लेकिन महत्वपूर्ण सुझाव शामिल हैं—जैसे बच्चों के लिए सही समय पर पोषण, रंग-बिरंगी थाली, जंक फूड से दूरी और सक्रिय जीवनशैली।
डॉ. नंदिता अय्यर, जो ‘The Great Indian Thali’ की लेखिका हैं, बताती हैं कि थाली केवल भोजन नहीं, बल्कि स्थानीय इतिहास, मौसम और संस्कृति का प्रतिबिंब है। एक संतुलित थाली में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और सब्जियां सही अनुपात में होनी चाहिए। सोशल मीडिया पर दिखने वाली बड़ी थालियां अक्सर पोषण की दृष्टि से संतुलित नहीं होतीं।
थाली को स्वास्थ्यवर्धक बनाने के लिए कुछ आसान कदम हैं: