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कम पानी, कम लागत और बेहतर कमाई, मिलेट्स की खेती में ये नई तकनीकें बदल सकती हैं किसानों की तस्वीर

Millets Farming Scientific Technologies : मिलेट्स (मोटे अनाज) की खेती में SMI, लाइन बुवाई, बीज उपचार, मशीनीकरण और FPO से लागत घटाने और पैदावार बढ़ाने के आधुनिक वैज्ञानिक उपाय जानें।
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Millets Farming

Millets Farming : कैसे करें मोटे अनाज की केती, PC- Chatgpt

मिलेट्स यानी मोटे अनाज की खेती अब केवल पारंपरिक फसल तक सीमित नहीं रह गई है। सीमित पानी, बढ़ती इनपुट लागत और श्रम की चुनौती के बीच युवा किसान और कृषि संस्थान मिलेट्स की खेती में वैज्ञानिक तकनीकों और स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं। लाइन बुवाई, उचित बीज उपचार, नर्सरी आधारित रोपाई, सिस्टम ऑफ मिलेट्स इंटेंसिफिकेशन (SMI), मशीनीकरण और किसान उत्पादक संगठनों (FPO) की मदद से खेती की लागत और श्रम जरूरत को नियंत्रित करने की कोशिश हो रही है।

SMI से बेहतर पौध संख्या और खेत प्रबंधन

सिस्टम ऑफ मिलेट्स इंटेंसिफिकेशन यानी SMI में उचित दूरी, स्वस्थ पौध तैयार करने, लाइन में रोपाई और खेत प्रबंधन पर जोर दिया जाता है। इसका उद्देश्य पौधों को पर्याप्त जगह, पोषण और प्रकाश उपलब्ध कराना है।

हालांकि SMI की तकनीक और उसका फायदा मिलेट की प्रजाति, स्थानीय जलवायु और खेत की स्थिति के अनुसार बदल सकता है। इसलिए इसे बिना स्थानीय कृषि सलाह के हर क्षेत्र में एक समान तरीके से लागू करना उचित नहीं है।

लाइन बुवाई और बीज उपचार से शुरुआत

मिलेट्स की खेती में अच्छी गुणवत्ता वाले बीज और सही पौध संख्या महत्वपूर्ण हैं। लाइन में बुवाई करने से खेत में पौधों की दूरी बनाए रखना, निराई-गुड़ाई और कुछ कृषि कार्यों को आसान बनाया जा सकता है।

बीज उपचार भी शुरुआती अवस्था में बीज और पौधों को बेहतर शुरुआत देने में मदद करता है। किसान को स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र की अनुशंसित विधि और प्रमाणित जैव-उत्पाद का ही इस्तेमाल करना चाहिए।

जैविक इनपुट से घट सकती है बाहरी लागत

कुछ मिलेट्स उत्पादन मॉडल में बीजामृत, जीवामृत और नीम आधारित जैविक तैयारियों जैसे स्थानीय इनपुट का इस्तेमाल किया जाता है। इनका फायदा यह है कि कुछ सामग्री किसान स्थानीय स्तर पर तैयार कर सकते हैं और बाहरी इनपुट पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर सकते हैं।

लेकिन जैविक इनपुट को हर परिस्थिति में रासायनिक उर्वरक या पौध संरक्षण उत्पाद का पूर्ण विकल्प मानना सही नहीं है। फसल की पोषक जरूरत और मिट्टी की स्थिति के अनुसार एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन अपनाना अधिक व्यावहारिक है।

माइक्रोबियल कंसोर्टिया पर भी हो रहा शोध

कर्नाटक के मंड्या क्षेत्र में छोटे मिलेट्स जैसे प्रोसो, लिटिल और बार्नयार्ड मिलेट पर माइक्रोबियल कंसोर्टिया के इस्तेमाल को लेकर अनुसंधान किया गया है। इसमें बीज उपचार और मिट्टी में प्रयोग के जरिए पौधों की वृद्धि, पोषक तत्वों के उपयोग और उत्पादन पर प्रभाव का अध्ययन किया गया।

ऐसे शोध परिणाम महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसी अनुसंधान केंद्र के परीक्षण परिणाम को हर किसान के खेत में मिलने वाला निश्चित उत्पादन या मुनाफा नहीं माना जा सकता। स्थानीय परिस्थितियों में परिणाम अलग हो सकते हैं।

मशीनों से घटेगा श्रम का दबाव

छोटे मिलेट्स की खेती में बुवाई, निराई और कटाई जैसे कामों में श्रम की जरूरत अधिक हो सकती है। इसी वजह से ICRISAT और अन्य कृषि संस्थान छोटे किसानों के खेतों के अनुकूल मशीनीकरण समाधान विकसित कर रहे हैं।

छोटे कृषि यंत्रों का इस्तेमाल सही समय पर काम पूरा करने और श्रम लागत को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। हालांकि मशीन की उपलब्धता और उसका आर्थिक लाभ क्षेत्र तथा किसान के खेत के आकार पर निर्भर करता है।

FPO से बाजार तक पहुंच आसान

मिलेट्स की खेती में केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। किसान को बीज, मशीन, भंडारण, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच भी चाहिए। यहां FPO महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

किसान समूह के जरिए मशीन किराये पर लेने, इनपुट खरीदने, उत्पाद को एकत्र करने और बड़े खरीदारों से बातचीत करने की क्षमता बढ़ सकती है। मूल्यवर्धित उत्पाद—जैसे आटा, बिस्किट, स्नैक्स और अन्य खाद्य पदार्थ—किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार पैदा कर सकते हैं, हालांकि इसके लिए प्रसंस्करण और विपणन व्यवस्था जरूरी है।

FLD से तकनीक का खेत में परीक्षण

फ्रंटलाइन डेमोंस्ट्रेशन (FLD) का उद्देश्य किसानों को किसी तकनीक का व्यावहारिक प्रदर्शन दिखाना है। मिलेट्स में उन्नत किस्म, उचित पौध संख्या, पोषण प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण और दूसरी तकनीकों के प्रदर्शन से किसान नई पद्धति को अपने खेत की परिस्थितियों में समझ सकते हैं।

ICAR और कृषि विश्वविद्यालयों के ऐसे प्रदर्शन कार्यक्रमों से स्थानीय स्तर पर तकनीक अपनाने में मदद मिल सकती है। लेकिन प्रदर्शन वाले खेत और सामान्य किसान के खेत में मिट्टी, मौसम और प्रबंधन की स्थिति अलग होने के कारण परिणामों में अंतर संभव है।

ICAR-IIMR की तकनीकी भूमिका

हैदराबाद स्थित ICAR-Indian Institute of Millets Research (ICAR-IIMR) विभिन्न मिलेट फसलों के उत्पादन, किस्म, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर शोध करता है। संस्थान की तकनीकी सिफारिशों में फसल के अनुसार किस्म चयन, बुवाई, पोषण, पौध संरक्षण और कटाई के तरीके शामिल हैं।

इसलिए किसान को किसी सामान्य इंटरनेट सलाह के बजाय अपने क्षेत्र के लिए ICAR-IIMR, कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र की अनुशंसित तकनीक को प्राथमिकता देनी चाहिए।

मिलेट्स की खेती में क्या फायदे?

तकनीकसंभावित फायदा
लाइन बुवाईपौध दूरी और खेत प्रबंधन आसान
SMIपौध स्थापना और संसाधन उपयोग में सुधार
बीज उपचारशुरुआती फसल स्थापना में मदद
जैविक इनपुटस्थानीय संसाधनों के उपयोग की संभावना
मशीनीकरणश्रम और समय बचाने में मदद
FPOइनपुट और बाजार तक सामूहिक पहुंच
मूल्य संवर्धनउत्पाद के लिए अतिरिक्त बाजार

चुनौतियां भी कम नहीं

मिलेट्स को कम पानी वाली फसल माना जाता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर मिलेट हर सूखे क्षेत्र में बिना सिंचाई के समान उत्पादन देगा। उपयुक्त फसल और किस्म का चयन स्थानीय वर्षा, मिट्टी और मौसम पर निर्भर करता है।

इसके अलावा गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता, तकनीकी जानकारी, मशीनों तक पहुंच, प्रसंस्करण और बाजार की कमी किसानों के सामने बड़ी चुनौतियां हो सकती हैं। मिलेट्स का बाजार भी स्थानीय मांग और खरीद व्यवस्था के अनुसार बदलता है।

किसान कैसे शुरू करें?

सबसे पहले अपने क्षेत्र के लिए उपयुक्त मिलेट और किस्म का चयन करें। इसके बाद मिट्टी जांच के आधार पर पोषण प्रबंधन तय करें। प्रमाणित बीज लें और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार बीज उपचार तथा लाइन बुवाई अपनाएं।

जहां SMI या मशीनीकरण उपलब्ध हो, वहां पहले छोटे क्षेत्र में इसका प्रदर्शन करें। FPO या किसान समूह से जुड़कर मशीन, प्रशिक्षण और बाजार की सुविधा हासिल की जा सकती है।

बिक्री से पहले स्थानीय बाजार, खरीदार और उपलब्ध सरकारी विपणन व्यवस्था की जानकारी लें। कीमतों के लिए eNAM या संबंधित राज्य की मंडी व्यवस्था से ताजा जानकारी लेना बेहतर है।