
मनाली की पहाड़ियों में स्थित हिडिंबा देवी मंदिर की यात्रा एक ऐसा अनुभव है, जो आस्था, इतिहास और प्रकृति को एक साथ समेटता है। देवदार के घने जंगलों से घिरा यह पैगोडा शैली का मंदिर धार्मिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही अपनी अनूठी वास्तुकला और शांत वातावरण के कारण भी यात्रियों को आकर्षित करता है।
हिडिंबा देवी मंदिर, जिसे स्थानीय लोग ढुंगरी मंदिर के नाम से भी जानते हैं, हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में मनाली के पास डूंगरी वन विहार में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 1553 ईस्वी में राजा बहादुर सिंह ने करवाया था। राष्ट्रीय धरोहर सूची में इसे 16वीं–17वीं शताब्दी के निर्मित स्थल के रूप में माना गया है।
मंदिर पगोडा (पैगोडा) शैली में निर्मित है, जिसमें देवदार की लकड़ी से बनी तीन चौकोर छतें हैं और चौथी, सबसे ऊपर की छत तांबे या पीतल से बनी शंकु के आकार की है। मुख्य द्वार पर देवी दुर्गा की नक्काशी, जानवरों, नर्तकियों, कृष्ण के जीवन और नवग्रहों के दृश्य उकेरे गए हैं। मंदिर के भीतर एक विशाल चट्टान है, जिस पर देवी के पदचिह्न हैं और लगभग 3 इंच ऊंची पीतल की प्रतिमा स्थापित है।
महाभारत के अनुसार, भीम ने हिडिंबा के भाई हिडिम्ब को पराजित किया, फिर हिडिंबा से विवाह किया और उनका पुत्र घटोत्कच हुआ। भीम और पांडवों के चले जाने के बाद हिडिंबा ने राज्य संभाला, फिर तपस्या के लिए जंगल में चली गईं और देवी का रूप धारण कर लिया। उन्हें मनाली की कुलदेवी और ग्रामदेवी माना जाता है।
मंदिर में श्रावण मास (जुलाई–अगस्त) में ‘बहादुर सिंह रे जातर’ नामक मेला मनाया जाता है, जो राजा बहादुर सिंह की स्मृति में आयोजित होता है। इसके अलावा, मई में हिडिंबा देवी के जन्मदिन पर स्थानीय महिलाएं संगीत और नृत्य के साथ उत्सव मनाती हैं। नवरात्रि के दौरान भी यहां विशेष पूजा और उत्सव होते हैं, जब देवी दुर्गा के स्थान पर हिडिंबा देवी की आराधना प्रमुख होती है। जून 2026 में 18 से 26 जून तक देवी भागवत कथा और महायज्ञ का आयोजन भी हुआ था, जिसमें क्षेत्रीय देवी-देवताओं का महासमागम हुआ।
मनाली मॉल रोड से मंदिर तक लगभग 1.5 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई है, जो 15–20 मिनट में पूरी हो जाती है। निकटतम हवाई अड्डा भुंतर (कुल्लू–मनाली एयरपोर्ट) है, जबकि निकटतम रेलवे स्टेशन जोगिंदर नगर है। मंदिर सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है।
देवदार के जंगलों में स्थित होने के कारण मौसम अचानक बदल सकता है, इसलिए गर्म कपड़े साथ रखें। पैदल चढ़ाई के दौरान आरामदायक जूते पहनें। मंदिर परिसर में धार्मिक भावनाओं का सम्मान करें और किसी भी प्रकार की प्रचार या वाणिज्यिक गतिविधि (Commercial Activity) न करें।
मंदिर की शांत वादियां, देवदार की ठंडी छांव और पौराणिक कथा का संगम एक अनूठा अनुभव प्रदान करता है। यह स्थान धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है और प्रकृति प्रेमियों और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए भी आकर्षक है।