
चुनाव आते ही राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े मंच, रैलियां, विज्ञापन, सोशल मीडिया अभियान और हजारों कार्यकर्ताओं की गतिविधियां दिखाई देती हैं। लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद क्या होता है? खासकर वह पार्टी जो चुनाव हार गई हो, उसके पास पैसा कहां से आता है? पार्टी के दफ्तर कैसे चलते हैं, कर्मचारियों का खर्च कौन उठाता है और अगले चुनाव की तैयारी के लिए पैसा कैसे जमा होता है?
दरअसल, राजनीतिक पार्टी की अर्थव्यवस्था केवल चुनाव के समय मिलने वाले चंदे पर निर्भर नहीं होती। पार्टियों के पास दान, सदस्यता शुल्क, पार्टी लेवी, बैंक ब्याज, संपत्ति या प्रकाशनों से आय और अन्य घोषित स्रोत हो सकते हैं। चुनाव आयोग राजनीतिक दलों की आय, चंदे और ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करता है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति का काफी हिस्सा देखा जा सकता है।
पहला है-दान और योगदान। व्यक्ति, कंपनियां और अन्य पात्र दानदाता राजनीतिक दलों को पैसा दे सकते हैं। जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29B राजनीतिक दलों को स्वैच्छिक योगदान स्वीकार करने की अनुमति देती है, हालांकि इसके साथ कानूनी शर्तें लागू होती हैं।
दूसरा है-सदस्यता शुल्क। पार्टी के सदस्य बनने वाले लोगों से मिलने वाला शुल्क भी आय का स्रोत है। बड़ी पार्टियों के लिए यह रकम चुनावी चंदे की तुलना में छोटी हो सकती है, लेकिन नियमित संगठन चलाने में इसका महत्व है।
तीसरा है-पार्टी लेवी। कुछ राजनीतिक दल अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों या पार्टी से जुड़े पदाधिकारियों से निर्धारित योगदान लेते हैं। यह भी पार्टी की आय का हिस्सा हो सकता है।
चौथा है-बैंक ब्याज और निवेश से आय। पार्टी के पास बैंक खातों में पैसा या अन्य वैध वित्तीय संपत्तियां हों तो उनसे ब्याज प्राप्त हो सकता है।
इसके अलावा प्रकाशनों की बिक्री, संपत्ति की बिक्री, सम्मेलन या प्रतिनिधि शुल्क जैसे स्रोत भी कुछ दलों की आय में दिखाई देते हैं। ADR के 2023-24 के विश्लेषण में इन मदों में सदस्यता शुल्क, बैंक ब्याज, संपत्ति बिक्री, प्रकाशन और पार्टी लेवी जैसी आय शामिल की गई है।
यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। चुनाव खत्म होने का मतलब यह नहीं है कि पार्टी का बैंक खाता खाली हो गया। राजनीतिक दल पूरे पांच साल की अवधि के लिए काम करते हैं। इसलिए उनकी आय और खर्च भी लगातार चलते रहते हैं।
किसी पार्टी के पास चुनाव के बाद पहले से जमा पैसा हो सकता है। चुनाव के दौरान उसने जितना पैसा जुटाया, उसका पूरा इस्तेमाल जरूरी नहीं कि उसी चुनाव में हो। इसके अलावा चुनाव के बाद भी पार्टी को दान मिल सकता है।
यानी चुनाव हारना और आर्थिक रूप से खत्म हो जाना दो अलग-अलग चीजें हैं। किसी पार्टी के पास सांसद और विधायक कम हों या बिल्कुल न हों, फिर भी वह संगठन के रूप में मौजूद रह सकती है। उसके कार्यालय, सदस्य, पदाधिकारी और कार्यकर्ता होते हैं और पार्टी अगले चुनाव की तैयारी जारी रख सकती है।
हां, राजनीतिक दलों को कॉरपोरेट योगदान मिल सकता है, लेकिन इसका कानूनी ढांचा महत्वपूर्ण है। राजनीतिक फंडिंग में बड़ा बदलाव 2017 के बाद आया था, जब चुनावी बॉन्ड व्यवस्था शुरू हुई और कंपनियों के राजनीतिक चंदे से जुड़े कुछ नियम बदले गए। लेकिन फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत ने राजनीतिक फंडिंग में दानदाताओं की जानकारी सार्वजनिक न होने को नागरिकों के सूचना के अधिकार से जुड़ा मुद्दा माना और असीमित कॉरपोरेट योगदान की अनुमति देने वाले संबंधित बदलाव को भी असंवैधानिक ठहराया।
इसलिए आज राजनीतिक फंडिंग को समझते समय इलेक्टोरल बॉन्ड को मौजूदा फंडिंग माध्यम समझना गलत होगा। यह व्यवस्था समाप्त हो चुकी है।
यहां एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। ADR के 2023-24 के विश्लेषण के मुताबिक छह राष्ट्रीय दलों की कुल आय करीब 5,820.91 करोड़ रुपये थी। इसमें करीब 2,524.14 करोड़ रुपये इलेक्टोरल बॉन्ड से आए थे, यानी लगभग 43.36 प्रतिशत। वहीं 2,544.28 करोड़ रुपये ऐसे दान से आए जिनके दानदाताओं की जानकारी उपलब्ध थी।
इस आंकड़े को वर्तमान स्थिति के रूप में नहीं देखना चाहिए, क्योंकि इलेक्टोरल बॉन्ड योजना फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद खत्म हो गई।
यहां राजनीतिक दलों के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है, जिस पार्टी का राष्ट्रीय संगठन मजबूत है, जिसके पास बड़ी संख्या में सदस्य हैं और जो लगातार चुनाव लड़ती है, उसके पास आमतौर पर धन जुटाने की क्षमता भी ज्यादा होती है।
2023-24 में 20 हजार रुपये से अधिक के घोषित दान के मामले में छह राष्ट्रीय दलों को कुल 2,544.28 करोड़ रुपये मिले। इसमें भाजपा ने अकेले करीब 2,243.95 करोड़ रुपये घोषित किए, जबकि कांग्रेस ने करीब 281.48 करोड़ रुपये घोषित किए। इससे पता चलता है कि राजनीतिक फंडिंग में पार्टियों के बीच बहुत बड़ा अंतर हो सकता है।
यहीं राजनीतिक फंडिंग की सबसे बड़ी पारदर्शिता वाली बहस आती है। कानून के तहत राजनीतिक दलों को 20 हजार रुपये से अधिक के योगदान की जानकारी निर्धारित रिपोर्ट में देनी होती है। यही वजह है कि चुनाव आयोग के पास राजनीतिक दलों की योगदान रिपोर्ट उपलब्ध होती है।
लेकिन 20 हजार रुपये से कम के योगदान के प्रत्येक दानदाता का नाम सार्वजनिक रूप से बताना जरूरी नहीं है। ADR ने 2023-24 के छह राष्ट्रीय दलों के आंकड़ों में करीब 199.37 करोड़ रुपये को ऐसे स्रोतों में रखा जिन्हें रिपोर्टों के आधार पर पूरी तरह ट्रेस नहीं किया जा सका। यानी पार्टी की कुल आय और जनता को दिखाई देने वाले दानदाताओं की सूची हमेशा एक जैसी नहीं होती।
चुनाव के बाद पार्टी का सबसे बड़ा खर्च सिर्फ राजनीतिक प्रचार नहीं होता। उसे संगठन चलाना पड़ता है। पार्टी के दफ्तर, कर्मचारियों की तनख्वाह, यात्रा, बैठकें, सम्मेलन, संगठनात्मक गतिविधियां, प्रचार सामग्री, कानूनी और प्रशासनिक खर्च जैसे कई मद होते हैं।
इसके अलावा पार्टी को अगले चुनाव के लिए संगठन तैयार करना होता है। जिला और प्रदेश स्तर के कार्यालय चलाना, कार्यकर्ताओं के कार्यक्रम करना और राजनीतिक गतिविधियां जारी रखना भी खर्च का हिस्सा है। इसलिए चुनाव हारने के बाद भी पार्टी की आर्थिक गतिविधियां खत्म नहीं होतीं।
जरूरी नहीं। राजनीतिक चंदा केवल सत्ता में रहने वाली पार्टियों को ही मिले, ऐसा कोई नियम नहीं है। किसी राजनीतिक दल की लोकप्रियता, संगठन का आकार, भविष्य की चुनावी संभावना और उसका राजनीतिक प्रभाव दान जुटाने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।
यही कारण है कि कई बार कोई पार्टी चुनाव में कमजोर प्रदर्शन करने के बावजूद आर्थिक रूप से सक्रिय रहती है। दूसरी तरफ कोई छोटी या कमजोर पार्टी चुनाव हारने के बाद आर्थिक संकट में भी आ सकती है। यानी राजनीतिक ताकत और आर्थिक ताकत एक-दूसरे से जुड़ी जरूर हैं, लेकिन दोनों हमेशा समान नहीं होतीं।
इसका सबसे महत्वपूर्ण रास्ता चुनाव आयोग की वेबसाइट है। ECI राजनीतिक दलों की वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट, योगदान रिपोर्ट और चुनावी खर्च से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करता है। 2024-25 की ऑडिट और योगदान रिपोर्टों में भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस समेत अनेक दलों की रिपोर्ट उपलब्ध हैं।
इसका मतलब यह है कि राजनीतिक दलों की वित्तीय स्थिति पूरी तरह बंद दरवाजे के पीछे नहीं है। लेकिन रिपोर्टों को पढ़ना आसान नहीं होता और छोटी रकम के दानदाताओं की जानकारी सार्वजनिक स्तर पर सीमित रहती है।
इसे एक सरल मॉडल से समझिए: चंदा + सदस्यता शुल्क + पार्टी लेवी + बैंक ब्याज + अन्य आय + पिछली बचत = पार्टी का उपलब्ध पैसा। और दूसरी तरफ-दफ्तर + कर्मचारी + संगठन + यात्रा + प्रचार + बैठकें + चुनावी खर्च = पार्टी का खर्च
इसलिए चुनाव हारने के बाद पार्टी का जीवन खत्म नहीं होता। वह अपनी बची हुई रकम, नए चंदे और नियमित आय के जरिए संगठन चलाती रहती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीतिक दल सिर्फ चुनाव लड़ने वाली मशीन नहीं हैं, बल्कि सालभर चलने वाले संगठन हैं। चुनाव उनके खर्च को कई गुना बढ़ा देता है, लेकिन चुनाव के बीच के चार-पांच साल भी उनके लिए संगठन और फंड जुटाने का समय होते हैं।
यही वजह है कि अगली बार जब कोई राजनीतिक पार्टी चुनाव हारती दिखे, तो सिर्फ यह सवाल पूछना पर्याप्त नहीं है कि 'कितनी सीटें मिलीं?' असली सवाल यह भी है- 'उस पार्टी के पास अगले चुनाव तक संगठन चलाने और दोबारा मैदान में उतरने के लिए पैसा कितना बचा है?'