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15 अगस्त को लालकिले से तिरंगा नहीं फहरा सके हमारे ये 2 प्रधानमंत्री, वजह जानकर रह जाएंगे हैरान

Independence Day:हर साल 15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से तिरंगा फहराना प्रधानमंत्री की ऐतिहासिक परंपरा बन चुका है। लेकिन गुलजारीलाल नंदा और चंद्रशेखर ऐसे दो प्रधानमंत्री रहे, जिन्हें यह अवसर नहीं मिला।
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Aug 15, 2026
India's first PM Jawaharlal Nehru News
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू लाल कैले से संबोधित करते हुए। ( फोटो: AI)

स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर और प्रधानमंत्री का संबोधन अब भारतीय लोकतंत्र की पहचान बन चुके हैं। हर साल 15 अगस्त की सुबह देश की नजरें दिल्ली के लालकिले पर टिकी रहती हैं। प्रधानमंत्री यहां तिरंगा फहराते हैं, देशवासियों को संबोधित करते हैं और सरकार की प्राथमिकताओं और देश की उपलब्धियों का जिक्र करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के इतिहास में दो ऐसे प्रधानमंत्री भी रहे हैं, जो प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए कभी 15 अगस्त को लालकिले से तिरंगा नहीं फहरा सके?

दोनों को लालकिले की प्राचीर से देश को संबोधित करने का अवसर नहीं मिला

इनमें पहला नाम गुलजारीलाल नंदा का है और दूसरा नाम चंद्रशेखर का। दोनों ही अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में प्रधानमंत्री बने, लेकिन दोनों का कार्यकाल ऐसा रहा कि स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले की प्राचीर से देश को संबोधित करने का अवसर नहीं मिल पाया।

लालकिले से प्रधानमंत्री के संबोधन की परंपरा कैसे बन गई?

भारत की आजादी के साथ ही प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस संबोधन की परंपरा को विशेष महत्व मिला। हालांकि एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आजादी की पहली रात यानी 14 और 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि में जवाहरलाल नेहरू ने जो ऐतिहासिक भाषण दिया था, वह लालकिले से नहीं बल्कि संविधान सभा में दिया गया था।

लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री के संबोधन की परंपरा

नेहरू का वह संबोधन ‘Tryst with Destiny’ के नाम से इतिहास में दर्ज है। इसके बाद स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री के संबोधन की परंपरा धीरे-धीरे स्थापित हुई और आगे चलकर यह समारोह देश के सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय आयोजनों में शामिल हो गया।

आज प्रधानमंत्री का लालकिले पर पहुंचना, राष्ट्रीय ध्वज फहराना और राष्ट्र को संबोधित करना स्वतंत्रता दिवस का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। लेकिन इतिहास में दो प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल इस परंपरा से अलग रहा।

असाधारण परिस्थितियों में देश की बागडोर संभालने वाले पहले प्रधानमंत्री: गुलजारीलाल नंदा

गुलजारीलाल नंदा भारतीय राजनीति के उन नेताओं में शामिल रहे, जिन्होंने बेहद असाधारण परिस्थितियों में देश की बागडोर संभाली। वह दो बार भारत के कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने। दोनों ही बार उन्हें यह जिम्मेदारी एक प्रधानमंत्री के निधन के बाद संक्रमणकालीन व्यवस्था के तौर पर मिली।

पहली बार मई 1964 में जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद नंदा ने प्रधानमंत्री पद संभाला। उनका कार्यकाल बहुत छोटा रहा। वह जून 1964 में लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री बनने तक इस पद पर रहे।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नंदा का पहला कार्यकाल 15 अगस्त तक पहुंचा ही नहीं। यानी उन्हें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री के तौर पर देश को संबोधित करने का मौका नहीं मिला।

इसके करीब डेढ़ साल बाद देश को फिर ऐसी ही परिस्थिति का सामना करना पड़ा। जनवरी 1966 में ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद गुलजारीलाल नंदा ने दोबारा कार्यवाहक प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी संभाली।

इस बार भी उनकी भूमिका स्थायी प्रधानमंत्री की नहीं थी। वह तब तक पद पर रहे, जब तक कांग्रेस ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में चुन नहीं लिया। जनवरी 1966 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के साथ नंदा का दूसरा कार्यकाल भी समाप्त हो गया।

इस तरह नंदा दो बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन दोनों अवसर इतने छोटे थे कि उनका कार्यकाल किसी भी 15 अगस्त तक नहीं पहुंच पाया।

यही वजह है कि भारतीय इतिहास में प्रधानमंत्री पद संभालने के बावजूद गुलजारीलाल नंदा उन प्रधानमंत्रियों की सूची में आते हैं, जिन्होंने लालकिले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस पर देश को संबोधित नहीं किया।

दूसरा नाम: भारतीय राजनीति के बेहद अस्थिर दौर के प्रधानमंत्री चंद्रशेखर

दूसरा नाम है चंद्रशेखर का। वह नवंबर 1990 में देश के प्रधानमंत्री बने। उनका प्रधानमंत्री पद तक पहुंचना भारतीय राजनीति के बेहद अस्थिर दौर की कहानी से जुड़ा था।

उस समय केंद्र में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं था। चंद्रशेखर ने समाजवादी पृष्ठभूमि वाले नेता के तौर पर प्रधानमंत्री पद संभाला और उनकी सरकार को कांग्रेस का बाहर से समर्थन हासिल था।

लेकिन यह राजनीतिक समीकरण ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सका। सरकार बनने के कुछ ही महीनों बाद कांग्रेस और चंद्रशेखर सरकार के बीच मतभेद गहराने लगे। अंततः चंद्रशेखर ने मार्च 1991 में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

हालांकि इसके बाद उनकी सरकार नई सरकार के गठन तक कार्यवाहक व्यवस्था के रूप में काम करती रही, लेकिन यहां एक अहम अंतर था। मार्च में इस्तीफा देने के बाद चंद्रशेखर 15 अगस्त को नियमित प्रधानमंत्री के रूप में लालकिले की प्राचीर पर नहीं थे।

इसी कारण उन्हें भी उन प्रधानमंत्रियों में गिना जाता है, जिन्होंने प्रधानमंत्री पद संभाला, लेकिन स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले से राष्ट्र को संबोधित करने का अवसर नहीं मिला।

पंद्रह अगस्त को लाल किले से तिरंगा नहीं फहरा सके दो तत्कालीन प्रधानमंत्री गुलजारीलाल नंदा और चंद्रशेखर। (फोटो: AI)

दोनों प्रधानमंत्रियों की कहानी में क्या समानता थी?

गुलजारीलाल नंदा और चंद्रशेखर की राजनीतिक यात्राएं एक-दूसरे से काफी अलग थीं। नंदा दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने और दोनों बार उनका कार्यकाल बेहद छोटा रहा। दूसरी तरफ चंद्रशेखर पूर्णकालिक प्रधानमंत्री बने, लेकिन उनकी सरकार राजनीतिक अस्थिरता के बीच ज्यादा समय तक नहीं चल सकी।

फिर भी दोनों के मामले में एक समानता रही-15 अगस्त और प्रधानमंत्री पद का उनका कार्यकाल एक साथ नहीं आया।

यही वजह है कि जब हर साल स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री लालकिले से तिरंगा फहराते हैं, तब भारतीय राजनीतिक इतिहास का यह छोटा लेकिन दिलचस्प तथ्य भी चर्चा में आता है।

क्या हर प्रधानमंत्री ने लालकिले से पहला भाषण दिया?

यहां इतिहास की एक और दिलचस्प बात सामने आती है। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन उसी समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का प्रसिद्ध ‘Tryst with Destiny’ संबोधन लालकिले से नहीं हुआ था।

वह भाषण संविधान सभा के विशेष सत्र में दिया गया था। इसके बाद लालकिले को स्वतंत्रता दिवस समारोह का प्रमुख स्थल बनाया गया और प्रधानमंत्री के ध्वजारोहण और राष्ट्र के नाम संबोधन की परंपरा मजबूत होती चली गई।

आज यह समारोह केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं रह गया है। यह स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों, देश की लोकतांत्रिक यात्रा और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन चुका है।

15 अगस्त का लालकिला क्यों है इतना खास?

लालकिला केवल दिल्ली की एक ऐतिहासिक इमारत नहीं है। यह भारत के स्वतंत्रता संघर्ष और सत्ता परिवर्तन की कहानी से भी जुड़ा हुआ है। मुगल दौर से लेकर ब्रिटिश शासन और फिर स्वतंत्र भारत तक, लालकिले ने भारतीय इतिहास के कई महत्वपूर्ण दौर देखे हैं।

इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण जब स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री हर साल यहां से तिरंगा फहराते हैं, तो यह दृश्य देश की आजादी और लोकतांत्रिक व्यवस्था की निरंतरता का प्रतीक बन जाता है।

प्रधानमंत्री का भाषण भी केवल सरकार की उपलब्धियों का लेखा-जोखा नहीं होता। इसमें देश की आर्थिक स्थिति, सुरक्षा, विकास, सामाजिक योजनाओं, भविष्य की योजनाओं और राष्ट्रीय चुनौतियों का उल्लेख किया जाता है।

लेकिन इसी परंपरा के बीच गुलजारीलाल नंदा और चंद्रशेखर का इतिहास एक अलग तस्वीर पेश करता है। दोनों प्रधानमंत्री बने, दोनों ने देश की सरकार का नेतृत्व किया, लेकिन उनके राजनीतिक कार्यकाल की समय-सीमा ऐसी रही कि स्वतंत्रता दिवस के दिन लालकिले की प्राचीर से तिरंगा फहराने का अवसर उनके हिस्से में नहीं आया।

Updated on:
15 Aug 2026 04:19 pm
Published on:
15 Aug 2026 03:48 pm