
India Economy in 1947 : 1947 में कैसी थी भारत की स्थिति, PC- Chatgpt
आजादी के 79 साल बाद भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। लेकिन 15 अगस्त 1947 को देश ने जब अंग्रेजी शासन से मुक्ति पाई, तब तस्वीर बिल्कुल अलग थी। कम आय, बेहद कम साक्षरता, कमजोर औद्योगिक आधार, सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं और बुनियादी ढांचे की भारी कमी नए भारत के सामने चुनौतियों की लंबी सूची थी।
आज जब हम 1947 के भारत की बात करते हैं तो एक बात ध्यान रखना जरूरी है। उस समय के कई आंकड़े आज की तरह नियमित और व्यापक तरीके से उपलब्ध नहीं थे। इसलिए 1947 की स्थिति समझने के लिए 1950-51 के आर्थिक आंकड़ों और 1951 की जनगणना को आधार बनाना ज्यादा उचित है।
आज भारत में स्कूलों की संख्या लाखों में है। लेकिन आजादी के आसपास शिक्षा की पहुंच बेहद सीमित थी। 1951 की जनगणना के मुताबिक भारत की साक्षरता दर सिर्फ 18.3 प्रतिशत थी। पुरुषों में यह 27.2 प्रतिशत और महिलाओं में महज 8.9 प्रतिशत थी। यानी देश की बड़ी आबादी पढ़ना-लिखना नहीं जानती थी।
1950-51 में देश में करीब 2.10 लाख प्राथमिक स्कूल, 13,596 मिडिल स्कूल और 7,416 हाई/हायर सेकेंडरी स्कूल थे। इसी साल देश में केवल 578 कॉलेज और 27 विश्वविद्यालय थे।
अब तस्वीर का दूसरा सिरा देखिए। 2024-25 में भारत में कुल 14.71 लाख स्कूल थे। इनमें करीब 7.31 लाख प्राथमिक, 4.34 लाख उच्च प्राथमिक, 1.43 लाख माध्यमिक और 1.64 लाख उच्च माध्यमिक स्कूल शामिल थे।
यानी स्कूलों का नेटवर्क आजादी के समय की तुलना में कई गुना बढ़ चुका है। लेकिन सिर्फ स्कूलों की संख्या बढ़ना ही कहानी नहीं है। 1951 में जहां साक्षरता 18.3 प्रतिशत थी, वहीं 2011 की जनगणना में यह 73 प्रतिशत तक पहुंच गई। यानी आजादी के शुरुआती भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी, जनता को शिक्षित करना।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी हालात बेहद चुनौतीपूर्ण थे। 1951 में भारत की औसत जीवन प्रत्याशा सिर्फ 32.1 साल थी। उसी समय शिशु मृत्यु दर 1,000 जीवित जन्मों पर 146 थी।
यह आंकड़ा बताता है कि आजादी के समय केवल अस्पतालों की संख्या कम होना ही समस्या नहीं थी। संक्रामक बीमारियां, कुपोषण, साफ पानी की कमी, स्वच्छता की कमजोर व्यवस्था और ग्रामीण इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच बड़ी समस्याएं थीं।
आज तस्वीर काफी बदल चुकी है। सरकार के अनुसार जीवन प्रत्याशा आजादी के समय के करीब 32 साल से बढ़कर लगभग 67 साल के स्तर तक पहुंच चुकी थी।
स्वास्थ्य ढांचे का विस्तार भी हुआ है। जून 2024 तक देश में 1.67 लाख से अधिक उप-स्वास्थ्य केंद्र, 26,636 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 6,155 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र काम कर रहे थे।
इसका अर्थ यह नहीं है कि आज भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में कोई समस्या नहीं है। लेकिन 1947 और आज के बीच का अंतर यह दिखाता है कि स्वास्थ्य सेवाओं का नेटवर्क किस पैमाने पर बढ़ा है।
अब आते हैं सबसे महत्वपूर्ण सवाल पर, आम भारतीय कितना कमाता था? 1947 के लिए आज की तरह सीधे तुलना योग्य प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा निकालना आसान नहीं है। अलग-अलग ऐतिहासिक अध्ययनों में अलग पद्धतियां इस्तेमाल हुई हैं।
भारत सरकार के पुराने राष्ट्रीय आय आंकड़ों में 1948-49 की कीमतों पर 1947 के आसपास प्रति व्यक्ति आय करीब 239 रुपये आंकी गई थी। 1900 से 1947 के बीच वास्तविक प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि भी बेहद धीमी रही- करीब 0.1 प्रतिशत सालाना।
1950-51 में नई राष्ट्रीय आय श्रृंखला के अनुसार प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय 2011-12 की स्थिर कीमतों पर करीब 12,493 रुपये थी।
यहां यह समझना जरूरी है कि 1947 के रुपये और आज के रुपये को सीधे गुणा करके तुलना नहीं की जा सकती। महंगाई और अलग-अलग कीमत-श्रृंखलाओं के कारण वास्तविक तुलना के लिए स्थिर कीमतों या क्रय शक्ति जैसी पद्धतियों का इस्तेमाल करना पड़ता है।
लेकिन व्यापक तस्वीर साफ है आजादी के समय भारत कम आय वाला देश था और लंबे समय तक प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि बहुत धीमी रही थी।
आज भारत की अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र की बड़ी भूमिका है। लेकिन आजादी के आसपास भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि थी। 1950-51 में कृषि, पशुपालन और उससे जुड़ी गतिविधियों का राष्ट्रीय आय में हिस्सा करीब 49 प्रतिशत था। इसके मुकाबले खनन, विनिर्माण और छोटे उद्योगों का हिस्सा करीब 16.7 प्रतिशत था। यानी देश की अर्थव्यवस्था का लगभग आधा हिस्सा कृषि पर टिका था।
समस्या यह थी कि कृषि की उत्पादकता कम थी और सिंचाई, आधुनिक बीज, उर्वरक, बिजली तथा कृषि तकनीक का व्यापक इस्तेमाल नहीं था। 1950-51 में शुद्ध सिंचित क्षेत्र करीब 20.85 मिलियन हेक्टेयर था।
आज कृषि का जीडीपी में हिस्सा काफी कम हो चुका है, जबकि उद्योग और सेवाओं का वजन बढ़ा है। इसका मतलब यह नहीं कि कृषि का महत्व खत्म हो गया है- आज भी करोड़ों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है- लेकिन अर्थव्यवस्था की संरचना बदल चुकी है।
भारत के पास आजादी के समय उद्योग बिल्कुल नहीं थे, ऐसा कहना गलत होगा। कपड़ा, जूट, लौह-इस्पात, चाय, कोयला और कुछ अन्य उद्योग मौजूद थे। टाटा जैसी भारतीय औद्योगिक कंपनियां भी स्थापित हो चुकी थीं। लेकिन औद्योगिक आधार बहुत सीमित था और भारी उद्योगों की क्षमता कमजोर थी।
1950-51 में खनन, विनिर्माण और छोटे उद्यमों का राष्ट्रीय आय में हिस्सा करीब 16.7 प्रतिशत था। आजादी के बाद भारत ने सार्वजनिक क्षेत्र, इस्पात संयंत्रों, भारी मशीनरी, बिजली, बांधों और वैज्ञानिक संस्थानों पर जोर देकर औद्योगिक आधार तैयार करने की कोशिश की। यही वजह है कि आज का भारत सिर्फ कृषि आधारित अर्थव्यवस्था नहीं है।
आज देश में एक्सप्रेसवे, राष्ट्रीय राजमार्ग और लाखों किलोमीटर का सड़क नेटवर्क है। लेकिन 1951 में भारत का कुल सड़क नेटवर्क करीब 3.99 लाख किलोमीटर था। इसमें राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई सिर्फ 19,811 किलोमीटर थी। कुल सड़क नेटवर्क में ग्रामीण सड़कों की भूमिका भी सीमित थी। 2016 तक देश का कुल सड़क नेटवर्क बढ़कर करीब 56.03 लाख किलोमीटर हो गया था।
यानी आजादी के बाद सड़क नेटवर्क का विस्तार केवल शहरों तक नहीं रहा, बल्कि गांवों को जोड़ने वाले नेटवर्क में भी बड़ा बदलाव आया।
आजादी के समय भारत के पास रेलवे का एक बड़ा नेटवर्क जरूर था। 1950 में भारतीय रेलवे का मार्ग किलोमीटर करीब 53,596 किलोमीटर था। लेकिन यह समझना जरूरी है कि रेलवे का निर्माण केवल भारतीय जनता को आधुनिक परिवहन सुविधा देने के उद्देश्य से नहीं हुआ था। औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में रेलवे का इस्तेमाल बंदरगाहों तक कच्चा माल पहुंचाने, सैनिकों की आवाजाही और प्रशासनिक नियंत्रण को मजबूत करने के लिए भी किया गया। आजादी के बाद इसी रेलवे नेटवर्क को एक राष्ट्रीय परिवहन प्रणाली में बदलने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
अगर पूरी तस्वीर को एक साथ रखें तो 1947 के आसपास का भारत ऐसा देश था जहां-
लेकिन एक बात जरूर थी, भारत के पास एक विशाल आबादी, बड़ा कृषि आधार, प्राकृतिक संसाधन, बंदरगाह, रेलवे नेटवर्क, कुछ औद्योगिक केंद्र और सबसे महत्वपूर्ण, एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपनी आर्थिक दिशा तय करने का अवसर था।
Updated on:
15 Aug 2026 04:11 pm
Published on:
15 Aug 2026 04:11 pm
