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ज़रा याद करो कुर्बानी: क्या था रेशमी रुमाल आंदोलन, किसने बुलंद की थी अंग्रेज़ों के खिलाफ आवाज़?

Silk Letter Movement: रेशमी रुमाल आंदोलन अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ एक गुप्त क्रांतिकारी योजना थी, जिसमें रेशमी कपड़ों पर आज़ादी के संदेश भेजे जाते थे। मौलाना महमूद हसन की अगुवाई में चले इस आंदोलन का 1916 में भंडाफोड़ हुआ और उन्हें माल्टा में कैद कर दिया गया।
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भारत

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MI Zahir

Aug 15, 2026

Silk Letter Movement News

भारत की आज़ादी के संग्रेाम में रेशमी रुमाल आंदोलन ने भी अहम भूमिका निभाई। (फोटो: AI)

भारत की आज़ादी का इतिहास केवल 1857, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा या भारत छोड़ो आंदोलन तक सीमित नहीं है। इसके पीछे कई ऐसी और कोशिशें भी थीं, जिनमें ब्रिटिश शासन को चुनौती देने के लिए गुप्त संगठन, अंतरराष्ट्रीय संपर्क और क्रांतिकारी योजनाएं बनाई गईं। ऐसी ही एक महत्वपूर्ण कोशिश थी रेशमी रुमाल आंदोलन, जिसे इतिहास में Silk Letter Movement या रेशमी रुमाल तहरीक के नाम से जाना जाता है।

आज़ादी का अमृत महोत्सव पोर्टल में स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे सेनानी के रूप में दर्ज किया

इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन और उनके शिष्य मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी शामिल थे। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल ने भी महमूद हसन को स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे सेनानी के रूप में दर्ज किया है, जिन्होंने ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए आंदोलन खड़ा किया और बाद में माल्टा में कैद रहे।

आख़िर कौन थे मौलाना महमूद हसन ?

मौलाना महमूद हसन का जन्म 1851 में बरेली में हुआ था। वे दारुल उलूम देवबंद के शुरुआती विद्यार्थियों में थे और आगे चल कर वहीं प्रमुख शिक्षक और शेखुल हदीस बने। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के आधिकारिक इतिहास में भी उन्हें स्वतंत्रता सेनानी और जामिया की स्थापना से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्व के रूप में दर्ज किया गया है।

ब्रिटिश शासन को भारत की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ी बाधा मानते थे

उनकी राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि वे ब्रिटिश शासन को भारत की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ी बाधाओं में देखते थे। उन्होंने शिक्षा और धार्मिक संस्थाओं से जुड़े अपने व्यापक संपर्कों को राजनीतिक जागरूकता के लिए इस्तेमाल किया। उनके शिष्यों में उबैदुल्लाह सिंधी और हुसैन अहमद मदनी जैसे नाम शामिल थे।

क्या था रेशमी रुमाल आंदोलन?

प्रथम विश्वयुद्ध 1914 में शुरू हुआ तो ब्रिटेन अंतरराष्ट्रीय युद्ध में उलझ गया। महमूद हसन और उनके सहयोगियों ने इसे भारत में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ विद्रोह खड़ा करने के संभावित अवसर के रूप में देखा।

अफ़ग़ानिस्तान और तुर्की का समर्थन लेने का विचार

योजना का उद्देश्य केवल स्थानीय स्तर पर विरोध करना नहीं था। इसके लिए अफगानिस्तान, तुर्की और जर्मनी जैसी ब्रिटेन-विरोधी शक्तियों से मदद हासिल करने की कोशिश की गई। राष्ट्रपति भवन के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, इस योजना में अफगानिस्तान और तुर्की का समर्थन लेकर भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह संगठित करने का विचार था। महमूद हसन और उबैदुल्लाह सिंधी इसके महत्वपूर्ण नेताओं में थे। महमूद हसन हिजाज़ पहुंचे, जबकि उबैदुल्लाह सिंधी काबुल गए। वहां से ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ संपर्क और सहयोग जुटाने की कोशिशें आगे बढ़ीं।

रेशमी रुमाल नाम क्यों पड़ा?

इस आंदोलन का सबसे चर्चित पहलू था रेशमी कपड़े पर लिखे गए गुप्त संदेश।

उबैदुल्लाह सिंधी ने काबुल से महमूद हसन के लिए महत्वपूर्ण सूचनाएं रेशमी कपड़े पर लिख कर भेजीं। इन संदेशों में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ योजनाओं और संपर्कों से जुड़ी जानकारियां थीं। ब्रिटिश खुफिया तंत्र के हाथ जब ये रेशमी पत्र लगे तो इस पूरी गुप्त योजना के बारे में पता चला।

रुमाल पर लिखते थे ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने की योजना

यही वजह थी कि बाद में यह पूरी कोशिश इतिहास में रेशमी रुमाल तहरीक के नाम से मशहूर हुई। भारत सरकार के रिकॉर्ड में भी उल्लेख है कि ये पत्र रेशम पर लिखे गए थे और उनमें ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने की योजना से जुड़ी महत्वपूर्ण सूचनाएं थीं। इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि रेशमी कपड़ा आंदोलन का माध्यम और पहचान बना था; आंदोलन स्वयं इससे कहीं बड़ी राजनीतिक और क्रांतिकारी योजना थी।

अंग्रेज़ों को कैसे पता चला?

इतिहास के अनुसार सन 1916 में ब्रिटिश खुफिया तंत्र के हाथ रेशमी पत्र लग गए। इसके बाद अधिकारियों ने इन पत्रों और उनसे जुड़े लोगों की गतिविधियों की जांच शुरू की। काबुल और हिजाज़ में चल रही गतिविधियों तथा ब्रिटिश भारत में मौजूद संपर्कों का नेटवर्क धीरे-धीरे सामने आने लगा।

महमूद हसन और उनके साथियों पर ब्रिटिश कार्रवाई तेज हो गई

ऐतिहासिक शोध में 15 अगस्त 1916 को एक महत्वपूर्ण रेशमी पत्र के पकड़े जाने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद महमूद हसन और उनके साथियों पर ब्रिटिश कार्रवाई तेज हो गई। इस घटना ने आंदोलन की गुप्त योजना को गंभीर झटका दिया। कई सहयोगियों को गिरफ्तार किया गया या निगरानी में रखा गया।

माल्टा की कैद और कठिन परीक्षा

इतिहास के मुताबिक महमूद हसन को हिजाज़ से गिरफ्तार कर माल्टा भेज दिया गया। उनके साथ मौलाना हुसैन अहमद मदनी और अन्य सहयोगियों को भी वहां नजरबंद किया गया। ब्रिटिश प्रशासन के मूल रिकॉर्ड में माल्टा में भारतीय बंदियों की निगरानी और उनके संबंध में सरकारी पत्राचार मौजूद है। माल्टा की कैद उनके जीवन का बेहद कठिन दौर था। लेकिन इस कैद ने उनके राजनीतिक विश्वास को समाप्त नहीं किया।

भारत में उन्हें नेताओं और कार्यकर्ताओं ने सम्मान दिया

सन 1920 में उनकी रिहाई हुई और वे भारत लौटे। उनके लौटने पर उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं ने सम्मान दिया। इसके बाद उनके राजनीतिक दृष्टिकोण में भी एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है।

क्रांतिकारी योजना से असहयोग आंदोलन तक

रेशमी रुमाल आंदोलन की योजना सशस्त्र विद्रोह और विदेशी सहायता पर आधारित थी। लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध के बाद परिस्थितियां बदल गईं। तुर्की की स्थिति बदली, ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ नई राजनीतिक रणनीतियां सामने आईं और भारत में महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन का रास्ता मजबूत हुआ।

असहयोग और ब्रिटिश संस्थाओं के बहिष्कार का समर्थन

महमूद हसन ने भी बाद के दौर में असहयोग और ब्रिटिश संस्थाओं के बहिष्कार का समर्थन किया। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल के अनुसार उन्होंने असहयोग आंदोलन के समर्थन में धार्मिक फतवे जारी किए और लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने के लिए भारत के विभिन्न हिस्सों की यात्रा की। यानी उनके जीवन में स्वतंत्रता संघर्ष के दो अलग चरण दिखाई देते हैं—पहले ब्रिटिश शासन के खिलाफ गुप्त क्रांतिकारी योजना और बाद में व्यापक जनआंदोलन तथा असहयोग की राजनीति।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया से भी जुड़ा नाम

महमूद हसन का योगदान केवल रेशमी रुमाल आंदोलन तक सीमित नहीं था। वे शिक्षा को भी राष्ट्रीय जागरण का महत्वपूर्ण माध्यम मानते थे।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के आधिकारिक इतिहास के अनुसार, उन्होंने 1920 में अलीगढ़ में जामिया की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसी दौर में उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता और राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए व्यापक सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। नवंबर 1920 में वे जमीयत उलेमा-ए-हिंद की बैठक में अध्यक्ष चुने गए, लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद 30 नवंबर 1920 को दिल्ली में उनका निधन हो गया।

क्या आज़ादी के इतिहास में उन्हें पर्याप्त जगह मिली?

रेशमी रुमाल आंदोलन सफल नहीं हो सका। ब्रिटिश खुफिया तंत्र ने योजना के बारे में पता लगा लिया और इसके प्रमुख लोगों को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन किसी आंदोलन की सफलता केवल उसके तत्काल परिणाम से तय नहीं होती। यह प्रयास इस बात का प्रमाण था कि प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भी भारत में ब्रिटिश शासन को चुनौती देने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योजनाएं बनाई जा रही थीं।

रेशमी रुमाल आंदोलन पर स्मारक डाक टिकट जारी हुआ

अहम बात यह है कि सन 2013 में भारत सरकार ने रेशमी रुमाल आंदोलन पर स्मारक डाक टिकट जारी किया। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इसे भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का महत्वपूर्ण अध्याय बताते हुए कहा था कि ऐसे समूहों और व्यक्तियों के बलिदान को याद किया जाना चाहिए। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन की बहुआयामी प्रकृति पर भी जोर दिया।

सईद मोहम्मद मियां का सिल्क लेटर मूवमेंट

इस आंदोलन पर इतिहासकारों का स्वतंत्र शोध भी उपलब्ध है। सईद मोहम्मद मियां का सिल्क लेटर मूवमेंट: ब्रिटिश रिकॉर्ड्स जैसी पुस्तक 'सिल्क लेटर कॉन्सपिरेसी केस' का लेखा-जोखा ब्रिटिश रिकॉर्ड्स के आधार पर इस पूरे प्रकरण का अध्ययन करता है। वहीं आधुनिक गीतकार शोध ने भी रेशमी पत्र प्रकरण और उसके बाद के राजनीतिक विचारधारा का विश्लेषण किया है।

स्वतंत्रता आंदोलन किसी एक विचारधारा का इतिहास नहीं

बहरहाल स्वतंत्रता के इतिहास के हिसाब से रेशमी रुमाल आंदोलन इसलिए याद रखा जाना चाहिए कि यह स्वतंत्रता संघर्ष की उस धारा की कहानी है जिसमें शिक्षा, संगठन, गुप्त संपर्क और अंतरराष्ट्रीय राजनीति-सबको ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश हुई। शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन की कहानी यह भी बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन किसी एक विचारधारा, समुदाय या पद्धति का इतिहास नहीं था, बल्कि अनेक धाराओं और असंख्य लोगों के प्रयासों से बना था।