
भारत में इस वर्ष मानसून का असमान और कमजोर स्वरूप खेती के लिए एक गंभीर चेतावनी बनकर उभरा है। मानसून की वर्षा जहां कुछ क्षेत्रों में समय पर और पर्याप्त रही, वहीं कई कृषि-प्रधान इलाकों में वर्षा की कमी ने फसल बुवाई और विकास को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। आइए देखें कि असमान वर्षा का किसानों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है और इससे निपटने के लिए कौन-से कदम उठाए जा सकते हैं।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने सितंबर में वर्षा सामान्य से कम रहने का अनुमान जताया है — कुल मिलाकर 94 प्रतिशत से कम, यानी दीर्घकालिक औसत (LPA) से नीचे। यह समय खरीफ फसलों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि अगस्त में लगभग 29 प्रतिशत और सितंबर में भी महत्वपूर्ण वर्षा होती है। बता दें, अगस्त में 16 प्रतिशत कम वर्षा हुई है।
अगस्त के बाद सितंबर में वर्षा कम रहने की संभावना का अर्थ यह है कि मानसून की कुल वर्षा 90 प्रतिशत LPA तक सीमित रह सकती है, जो खरीफ बुवाई और फसल विकास के लिए जोखिम भरा संकेत है।
इस वर्ष मानसून की वर्षा मात्रात्मक रूप से कुछ हद तक सामान्य रही, लेकिन वितरण असमान रहा। जून–जुलाई में देश में कुल वर्षा औसतन 87 प्रतिशत LPA रही, लेकिन कई जिलों में वर्षा की कमी बहुत अधिक थी।
विशेष रूप से पूर्व और उत्तर भारत में वर्षा औसतन 26 प्रतिशत कम रही, दक्षिण भारत में 23 प्रतिशत और पूर्वोत्तर में 11 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। यह असमानता उन क्षेत्रों में अधिक खतरनाक है, जो वर्षा पर निर्भर खेती करते हैं - जैसे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान और गुजरात।
असमान वर्षा और मानसून की सुस्त चाल के कारण खरीफ बुवाई की गति धीमी रही। 10 जुलाई तक बुवाई लगभग 16 प्रतिशत कम हुई — 531.25 लाख हेक्टेयर की तुलना में पिछले वर्ष 632.69 लाख हेक्टेयर बुवाई हुई थी।
हालांकि जुलाई में वर्षा में सुधार हुआ, जिससे बुवाई में गिरावट 23 प्रतिशत से घटकर लगभग 3 प्रतिशत रह गई। लेकिन खरीफ बुवाई को पिछले वर्ष के स्तर पर लाने के लिए अगस्त–सितंबर में लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि आवश्यक है, जो चुनौतीपूर्ण है।
असमान मानसून केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं है। इससे किसान की आय, घरेलू बजट, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य सेवाएं और अगली फसल की तैयारी पर भी प्रभाव पड़ता है।
किसानों को दोबारा बुवाई, अतिरिक्त सिंचाई या फसल बदलने जैसे विकल्प अपनाने पड़ सकते हैं, जिससे लागत बढ़ती है और ऋण चुकाने में कठिनाई होती है।
इसके अतिरिक्त, वर्षा की असमानता के कारण खाद्य आपूर्ति में भी अस्थिरता आ सकती है — कुछ क्षेत्रों में उत्पादन कम होगा, जबकि अन्य में अधिक, जिससे बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव संभव है।
किसान और समुदाय क्या कर सकते हैं?
यहां कुछ व्यावहारिक सुझाव दिए जा रहे हैं, जो किसानों और स्थानीय समुदायों के लिए सहायक हो सकते हैं:
सितंबर में वर्षा की दिशा और मात्रा तय करेगी कि खरीफ फसलें कैसी रहेंगी। यदि वर्षा समय पर और पर्याप्त हुई, तो बुवाई और फसल विकास में सुधार संभव है। लेकिन यदि वर्षा कमजोर और असमान रही, तो उत्पादन में गिरावट और आर्थिक तनाव बढ़ सकता है।