
भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानी संसद का सत्र जब भी शुरू होता है, पूरे देश की निगाहें दोनों सदनों पर टिक जाती हैं। जनता को उम्मीद होती है कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि देशहित की नीतियों, महंगाई, रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों पर सार्थक बहस करेंगे, लेकिन अक्सर राजनीतिक गतिरोध और हंगामे के चलते कार्यवाही स्थगित हो जाती है। क्या आपने कभी सोचा है कि जिस संसद को हम टीवी पर देखते हैं, उसे सुचारू रूप से चलाने में देश का कितना पैसा खर्च होता है? आंकड़े बताते हैं कि संसद के एक दिन के संचालन पर करीब ₹9 करोड़ का खर्च आता है। यानी संसद के हर एक मिनट की कीमत लगभग ₹2.5 लाख बैठती है।
यह भारी भरकम खर्च लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों का संयुक्त व्यय होता है। जब भी सदन हंगामे की भेंट चढ़ता है, तो समय और देश के ईमानदार टैक्सपेयर्स के पैसों का सीधा नुकसान होता है।
संसद के संचालन खर्च का यह विश्लेषण दोनों सदनों के संयुक्त वार्षिक बजट और सत्र के कार्यदिवसों पर आधारित होता है। संसदीय कार्य मंत्रालय और पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अध्ययनों के अनुसार, संसद के एक सामान्य कार्यदिवस में दोनों सदनों की लगभग 6-6 घंटे की कार्यवाही तय होती है।
इस समय सारिणी के अनुसार खर्च का विभाजन इस प्रकार समझा जा सकता है:
यदि संसद का कोई सत्र (जैसे मानसून या शीतकालीन सत्र) 15 से 20 कार्यदिवसों का है, तो उस पूरे सत्र को आयोजित करने का कुल वित्तीय भार लगभग ₹135 करोड़ से ₹180 करोड़ के बीच आता है। यदि किसी सत्र में हंगामे और स्थगन के कारण 50 घंटे का समय बर्बाद होता है, तो देश को सीधे तौर पर करीब ₹75 करोड़ का सीधा वित्तीय नुकसान झेलना पड़ता है।
संसद चलाना सांसदों का एक हॉल में बैठना भर नहीं है। इसके पीछे एक विशाल प्रशासनिक, तकनीकी और सुरक्षा तंत्र चौबीसों घंटे काम करता है। ₹9 करोड़ के दैनिक खर्च में मुख्य रूप से निम्नलिखित मदें (खर्च) शामिल होती हैं:
संसद का काम कानून बनाने के अलावा सरकार की जवाबदेही तय करना भी है। जब सदन हंगामे के कारण ठप होता है, तो वित्तीय बर्बादी से भी बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पहुंचता है:
संसद देश की संप्रभुता और जन आकांक्षाओं का प्रतीक है। इसलिए जब संसद का एक भी घंटा बिना काम के बीतता है, तो वह जनता के हितों और लोकतंत्र के सबसे कीमती समय का नुकसान होता है।