
प्रकृति ने धरती को अनगिनत जीवों और रंगों से सजाया है और महासागरों की गहराइयों में अनगिनत राज छिपाए हैं। महासागरों की गहराइयों में पाया जाने वाला ऐसा ही एक अनोखा जीव जेलीफिश है। पारदर्शी शरीर, छतरीनुमा आकृति और लंबे तंतुओं के सहारे तैरने वाली जेलीफिश दिखने में मछली जैसी लगती है, लेकिन वास्तव में यह बिना रीढ़ की हड्डी वाला समुद्री जीव है।
जेलीफिश के शरीर में न दिमाग होता है, न दिल और न ही हड्डियां, फिर भी यह करोड़ों वर्षों से समुद्र में अपना अस्तित्व बनाए हुए है। हर साल 3 नवंबर को विश्व जेलीफिश दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य इस प्राचीन और रहस्यमयी जीव के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा समुद्री जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र में इसकी भूमिका को समझना है। आमतौर पर अपने डंक के लिए पहचानी जाने वाली जेलीफिश समुद्र का प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है।
जेलीफिश के नाम में भले ही फिश यानी मछली जुड़ा हो, लेकिन इसका मछलियों से कोई संबंध नहीं है। मछलियों के विपरीत इसके शरीर में रीढ़ की हड्डी नहीं होती। वैज्ञानिक इसे निडेरिया (Cnidaria) संघ में रखते हैं, जिसमें समुद्री एनीमोन और प्रवाल भी शामिल हैं। इसकी प्रमुख प्रजातियां सिफोजोआ (Scyphozoa) वर्ग की हैं।
इसका शरीर बेहद नरम, पारदर्शी और जेली जैसा होता है, जिसमें लगभग 95 से 98 प्रतिशत पानी होता है। यही वजह है कि पानी से बाहर आने पर यह अपना आकार बनाए नहीं रख पाती। इसकी प्रजातियां समुद्र की सतह से गहराइयों तक, यहां तक कि कुछ मीठे पानी में भी पाई जाती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, जेलीफिश का अस्तित्व धरती पर लगभग 50 से 60 करोड़ वर्षों से है। ये डायनासोर से भी पहले समुद्र में मौजूद थीं। कई बड़े पर्यावरणीय बदलावों और सामूहिक विलुप्ति की घटनाओं के बावजूद अपनी अनुकूलन क्षमता के बल पर इन्होंने अस्तित्व बनाए रखा है।
जेलीफिश के शरीर में दिमाग, दिल, खून और फेफड़े नहीं होते, फिर भी यह वातावरण को महसूस कर भोजन तलाशने और खतरे से बचने में सक्षम है। इसके शरीर में तंत्रिका कोशिकाओं का जाल होता है, जिसे नर्व नेट कहते हैं। यह प्रकाश, स्पर्श और पानी में होने वाले बदलावों को महसूस करने में मदद करता है।
जेलीफिश का शरीर छतरी या घंटी के आकार का होता है। निचले हिस्से में मुंह और भोजन ग्रहण करने वाली संरचना होती है, जबकि किनारों से निकले लंबे तंतु शिकार पकड़ने और आत्मरक्षा में काम आते हैं। छतरीनुमा शरीर को सिकोड़कर और फैलाकर यह पानी में आगे बढ़ती है। शरीर की सतह से पानी में घुली ऑक्सीजन अवशोषित कर सांस लेती है। कुछ प्रजातियों में प्रकाश महसूस करने वाले विशेष अंग होते हैं, जबकि कई अंधेरे में नीली या हरी रोशनी पैदा करती हैं। इस क्षमता को बायोल्यूमिनेसेंस कहते हैं, जो वैज्ञानिकों के शोध का विषय है।
जेलीफिश की दुनिया में ट्यूरीटोप्सिस डोर्नी (Turritopsis dohrnii) नाम की एक खास प्रजाति पाई जाती है, जिसे अमर जेलीफिश कहा जाता है। इसकी विशेषता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों, चोट या उम्र बढ़ने पर यह अपने जीवन चक्र को फिर शुरुआती अवस्था में ले जा सकती है। इस दौरान इसकी विकसित कोशिकाएं अपनी भूमिका बदलकर पहले जैसी अवस्था में लौट आती हैं।
हालांकि, इसे पूरी तरह अमर कहना सही नहीं है, क्योंकि यह दूसरे समुद्री जीवों का शिकार बन सकती है या बीमारी और अन्य कारणों से मर सकती है। फिर भी, जीवन चक्र को पीछे ले जाने की इसकी क्षमता वैज्ञानिकों के लिए बेहद दिलचस्प है। इस पर शोध से कोशिकाओं के विकास, उम्र बढ़ने और शरीर के पुनर्जनन की प्रक्रियाओं को समझने में मदद मिल सकती है।
जेलीफिश समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह छोटे समुद्री जीवों, प्लवकों, मछलियों के अंडों और लार्वा को खाती है, जबकि समुद्री कछुए, विशेषकर लेदरबैक, बड़ी मछलियां और अन्य जीव इसका शिकार करते हैं। इस तरह यह खाद्य शृंखला में शिकारी और शिकार, दोनों की भूमिका निभाती है। इसके मरने पर शरीर में मौजूद जैविक पदार्थ और कार्बन समुद्र की गहराइयों तक पहुंचते हैं, जिससे पोषक तत्वों का प्रवाह और समुद्री खाद्य जाल मजबूत होता है।