
स्वदेशी खेल 'कबड्डी' राजस्थान के मिट्टी से निकलकर अब अंतरराष्ट्रीय स्टेज तक पहुंच गया है। इस खेल का रोमांचक सफर केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कृति और पहचान का प्रतीक बन चुका है। इस लेख में हम जानेंगे कि कबड्डी की जड़ें राजस्थान के ग्रामीण जीवन में कैसे गहराई से जुड़ी हैं और कैसे यह खेल आधुनिक समय में अंतरराष्ट्रीय पहचान बना पाया है?
कबड्डी का इतिहास भारत में प्राचीन काल से जुड़ा है। महाभारत में अभिमन्यु का वर्णन, जहां वह दुश्मन के शिविर में प्रवेश करता है। वह कबड्डी की रणनीतिक भावना से मेल खाता है। यह खेल संभवतः पारंपरिक खेलों से विकसित हुआ। यह ग्रामीण जीवन का हिस्सा रहा, जहां गांवों में यह खेल मनोरंजन और शारीरिक प्रशिक्षण का साधन था। इस खेल का समृद्ध और मजबूत इतिहास भारत से जुड़ा है।
कबड्डी खेल हमेशा से ही भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है। पुराणों और शास्त्रों में भी कबड्डी की चर्चा इसकी समृद्ध इतिहास की गवाही देती है। धार्मिक ग्रंथों में इस बात का स्पष्ट प्रमाण मिलता है कि भगवान श्रीकृष्ण अपने बचपन में कबड्डी खेला करते थे। एक मान्यता यह भी है कि गौतम बुद्ध बचपन में मनोरंजन के लिए कबड्डी खेला करते थे। भारतीय संस्कृति की जड़ से जुड़े होने के कारण, कबड्डी हमेशा भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में एक लोकप्रिय खेल रहा है।
राजस्थान के गांवों में कबड्डी आज भी जीवंत है। स्थानीय स्कूलों और खेल संगठनों द्वारा नियमित टूर्नामेंट आयोजित किए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर, 2024 में रावलामंडी में राज्य स्तरीय स्कूल गर्ल्स कबड्डी टूर्नामेंट आयोजित किया गया। इसके अलावा राजस्थान राज्य कबड्डी संघ ने विभिन्न जिलों में जिला स्तर पर संगठन बनाए हैं, जो जमीनी स्तर पर खेल को मजबूत करने में सक्रिय हैं।
कबड्डी का आधुनिक स्वरूप 20वीं सदी में आकार लेने लगा। महाराष्ट्र में 1921 में इसके नियमों का प्रारंभिक ढांचा तैयार हुआ और 1923 में इन्हें संशोधित किया गया। जिससे पहला अखिल भारतीय कबड्डी टूर्नामेंट संभव हुआ। साल 1950 में ऑल इंडिया कबड्डी फेडरेशन की स्थापना हुई और 1952 में सीनियर नेशनल चैंपियनशिप शुरू हुई। 1973 में अमेच्योर कबड्डी फेडरेशन ऑफ इंडिया (AKFI) बना, जिसने खेल को और संगठित रूप दिया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कबड्डी को पहचान 1936 में मिली। उस दौरान कबड्डी को बर्लिन ओलंपिक में एक प्रदर्शन खेल के रूप में दिखाया गया था। 1990 में बीजिंग एशियाई खेलों में कबड्डी को मुख्य खेल के रूप में शामिल किया गया, जहां भारत ने स्वर्ण पदक जीता। 1993 में दूसरा एशियाई चैम्पियनशिप भारत (जयपुर- राजस्थान) में आयोजित हुआ, जिसमें मलेशिया और जापान ने पहली बार भाग लिया।
राजस्थान ने कबड्डी के विकास में संस्थागत योगदान भी दिया है। AKFI का मुख्यालय जयपुर में स्थित है, जो खेल के प्रशासन और विकास में राज्य की भूमिका को दर्शाता है। इसके अलावा राजस्थान कबड्डी लीग (रियल कबड्डी लीग) जैसी पहल ने स्थानीय प्रतिभाओं को मंच दिया और खेल को लोकप्रिय बनाया।
राजस्थान के खिलाड़ियों की कहानी प्रेरणादायक है। उदाहरण के लिए, झुंझुनूं जिले के बधबर गांव से आने वाले सचिन तंवर ने प्रो कबड्डी लीग (PKL) में अपनी पहचान बनाई। PKL सीजन 11 में उन्हें तमिल थलाइवाज ने 2.15 करोड़ रुपये में खरीदा, जिससे वे सबसे महंगे खिलाड़ियों में शामिल हुए। अब वे राजस्थान पुलिस में सब-इंस्पेक्टर हैं। उनकी कहानी ग्रामीण जीवन से ऊंचाइयों तक पहुंचने का प्रतीक है।
कबड्डी सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि ग्रामीण युवाओं के लिए अवसर का द्वार है। यह खेल उन्हें अनुशासन, टीम भावना और आत्मविश्वास सिखाता है। सचिन तंवर की कहानी इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे खेल जीवन बदल सकता है। इसके अलावा, कबड्डी ने राजस्थान में खेल संस्कृति को मजबूत किया है। स्थानीय टूर्नामेंट, स्कूलों में खेल का समावेश और राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर खिलाड़ियों की पहचान, ये सब मिलकर एक सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं।