
स्मार्टफोन पर चैटिंग हो या लैपटॉप पर ऑफिस का काम, हमारी उंगलियां बिना देखे कीबोर्ड पर तेजी से चलने लगती हैं। ऊपर की सबसे पहली लाइन में बाईं तरफ नजर डालें तो छह अक्षर दिखते हैं Q-W-E-R-T-Y। कभी सोचा है कि जब बचपन में हमें भाषा की शुरुआत 'A, B, C, D' से सिखाई जाती है, तो कीबोर्ड पर अक्षर इतने बिखरे हुए और बेतरतीब क्यों होते हैं?
यह कोई इत्तेफाक या कंप्यूटर युग का मॉडर्न डिजाइन नहीं है। कीबोर्ड के इस लेआउट की कहानी लगभग 150 साल पुरानी है, जो मैकेनिकल इंजीनियरिंग की एक बड़ी मजबूरी, व्यावसायिक सौदे और इंसानी आदत से जुड़ी हुई है।
शुरुआत में कीबोर्ड वर्णमाला क्रम में ही था
1860 के दशक के उत्तरार्ध में अमेरिका के मिल्वौकी शहर में एक अखबार के संपादक और प्रिंटर क्रिस्टोफर लैथम शोल्स (Christopher Latham Sholes) अपने साथियों कार्लोस ग्लिडन और सैमुअल डब्ल्यू. सोल के साथ मिलकर लिखने की एक मशीन बना रहे थे।
1868 में शोल्स ने पहले व्यावहारिक टाइपराइटर का पेटेंट कराया। उस शुरुआती मॉडल में कुंजियों (Keys) को पियानो के बटनों की तरह दो पंक्तियों में सजाया गया था और अक्षर वर्णमाला यानी A, B, C, D… के सीधे क्रम में ही व्यवस्थित थे। उस समय तक किसी को अंदाजा नहीं था कि यह सीधा-सादा क्रम टाइपिंग के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट बनने वाला है।
19वीं सदी के टाइपराइटर पूरी तरह से मैकेनिकल थे। उनके काम करने का तरीका कुछ ऐसा था:
हर बटन के पीछे धातु की एक पतली छड़ (Typebar) लगी होती थी।
इस तकनीकी खामी को दूर करने के लिए शोल्स ने एक गणितीय और भाषाई अध्ययन किया। उन्होंने अमेरिकी शिक्षक अमोस डेन्समोर की मदद से अंग्रेजी भाषा में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले अक्षरों और उनके संयोजनों (Digraphs) का विश्लेषण किया।
शोल्स का मुख्य उद्देश्य था: अक्सर साथ आने वाले अक्षरों की टाइपबार्स को मशीन के अंदर एक-दूसरे से दूर रखना।
1870 के दशक की शुरुआत में शोल्स ने कई प्रयोग किए और धीरे-धीरे अक्षरों की जगह बदली:
1873 में शोल्स और उनके साझेदारों ने इस डिजाइन को बंदूक और सिलाई मशीन बनाने वाली मशहूर अमेरिकी कंपनी ई. रेमिंगटन एंड संस (E. Remington and Sons) को बेच दिया।
रेमिंगटन ने इसमें कुछ छोटे बदलाव किए और 1874 में 'Shols and Glidden Type-Writer' नाम से पहला कमर्शियल टाइपराइटर बाजार में उतारा।
कहा जाता है कि रेमिंगटन के सेल्स एजेंट्स के कहने पर QWERTY कीबोर्ड की सबसे ऊपरी पंक्ति (Top Row) में कुछ अक्षरों को इस तरह सेट किया गया था कि सेल्समैन ग्राहकों के सामने डेमो देते समय केवल ऊपरी पंक्ति की कुंजियों का इस्तेमाल करके तेजी से "TYPEWRITER" शब्द टाइप करके दिखा सकें। अगर आप आज भी अपने कीबोर्ड की पहली लाइन देखें, तो उसमें T-Y-P-E-W-R-I-T-E-R के सारे अक्षर मौजूद हैं।
QWERTY अकेला लेआउट नहीं था। जैसे-जैसे तकनीक बदली, कई वैज्ञानिकों और डिजाइनरों ने अधिक तार्किक और तेज लेआउट बनाए:
टापराइटर से टचस्क्रीन तक का सफर
1870 के दशक में लोहे के तारों को उलझने से बचाने के लिए बनाया गया एक मैकेनिकल जुगाड़ आज 21वीं सदी के डिजिटल दौर में स्मार्टफोन, टैबलेट और वर्चुअल रियलिटी (VR) हेडसेट्स का वैश्विक मानक बन चुका है।
हर बार जब आप अपने फोन पर कोई टेक्स्ट मैसेज भेजते हैं या लैपटॉप पर कोई दस्तावेज तैयार करते हैं, तो जाने-अनजाने आप 150 साल पुरानी 19वीं सदी की एक मैकेनिकल मजबूरी का इस्तेमाल कर रहे होते हैं।