
भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापक कानूनी व्यवस्था मौजूद है। इसका उद्देश्य समानता, सम्मान, भेदभाव से सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार और सुगम पहुंच सुनिश्चित करना है। लेकिन इन अधिकारों का लाभ लेने के लिए यह जानना जरूरी है कि कानून क्या कहता है और उसके लिए आवेदन या शिकायत कहां करनी है।
दिव्यांगजनों के अधिकारों का प्रमुख कानून दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) है। यह कानून 28 दिसंबर 2016 को अधिनियमित हुआ और 19 अप्रैल 2017 से लागू हुआ। इसके अलावा राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999 और भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992 भी दिव्यांगता क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण कानून हैं, लेकिन इनका उद्देश्य और दायरा अलग-अलग है।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र के Convention on the Rights of Persons with Disabilities (UNCRPD) को 1 अक्टूबर 2007 को अनुमोदित किया। यह कन्वेंशन 3 मई 2008 को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू हुआ।
RPwD Act दिव्यांग व्यक्तियों को समानता और सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। कानून दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा और उचित अनुकूलन की आवश्यकता पर जोर देता है।
इसका मतलब है कि शिक्षा, रोजगार, सार्वजनिक सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में दिव्यांग व्यक्ति को समान अवसर देने के लिए आवश्यक सुविधाएं और उचित व्यवस्था उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
बेंचमार्क दिव्यांगता वाले 6 से 18 वर्ष के बच्चों को कानून के तहत मुफ्त शिक्षा का अधिकार है। सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त उच्च शिक्षण संस्थानों में बेंचमार्क दिव्यांग व्यक्तियों के लिए कम से कम 5% सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है। उच्च शिक्षा में प्रवेश के लिए पांच वर्ष की ऊपरी आयु सीमा में छूट का भी प्रावधान है।
हालांकि, आरक्षण का लाभ लेने के लिए संबंधित संस्थान की पात्रता और लागू नियमों को पूरा करना जरूरी है।
RPwD Act के तहत सरकारी प्रतिष्ठानों में बेंचमार्क दिव्यांग व्यक्तियों के लिए कम से कम 4% रिक्तियां आरक्षित करने का प्रावधान है। यह आरक्षण कानून में निर्धारित दिव्यांगता की श्रेणियों के अनुसार लागू होता है।
इसलिए नौकरी के आवेदन के समय यह देखना जरूरी है कि संबंधित पद दिव्यांग व्यक्तियों की संबंधित श्रेणी के लिए चिन्हित है या नहीं और भर्ती की अन्य शर्तें क्या हैं।
दिव्यांग अधिकार कानून में सार्वजनिक भवनों, परिवहन, सूचना और संचार तकनीक जैसी सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य दिव्यांग व्यक्तियों को सार्वजनिक सुविधाओं और सेवाओं तक समान रूप से पहुंच उपलब्ध कराना है।
यदि किसी सार्वजनिक सेवा या संस्थान में पहुंच से जुड़ी समस्या आती है, तो संबंधित शिकायत निवारण व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा सकता है।
दिव्यांग व्यक्ति को केवल दिव्यांगता के आधार पर उसकी कानूनी क्षमता से वंचित नहीं किया जा सकता। कानून में जरूरत की स्थिति में limited guardianship यानी सीमित अभिभावकता की व्यवस्था है।
यह व्यवस्था किसी व्यक्ति की इच्छा और सहभागिता को ध्यान में रखते हुए विशिष्ट निर्णय या निश्चित अवधि के लिए हो सकती है। कानून में इसे व्यक्ति और अभिभावक के बीच संयुक्त निर्णय की व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया गया है।
इसलिए यह मानना सही नहीं है कि दिव्यांग व्यक्ति के सभी फैसले स्वतः अभिभावक के हाथ में चले जाते हैं।
सरकारी योजनाओं और कई अधिकारों का लाभ लेने के लिए दिव्यांगता प्रमाणपत्र महत्वपूर्ण दस्तावेज है। UDID यानी Unique Disability ID परियोजना के तहत दिव्यांगता प्रमाणपत्र और विशिष्ट पहचान पत्र जारी किए जाते हैं।
UDID पोर्टल पर आवेदन, प्रमाणपत्र और कार्ड की स्थिति की जानकारी, नवीनीकरण तथा अन्य सुविधाएं उपलब्ध हैं। मेडिकल अथॉरिटी या मेडिकल बोर्ड दिव्यांगता का आकलन और प्रमाणन करते हैं।
यदि किसी दिव्यांग व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन होता है या उसे कानूनी विवाद में सहायता चाहिए, तो राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और राज्य/जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों से कानूनी सहायता ली जा सकती है।
Legal Services Authorities Act, 1987 की धारा 12 में दिव्यांग व्यक्तियों को मुफ्त कानूनी सेवाओं के लिए पात्र श्रेणी में रखा गया है। इसमें कानूनी सलाह और पात्र मामलों में अदालत या अन्य कानूनी कार्यवाही में प्रतिनिधित्व जैसी सहायता शामिल हो सकती है।
| अधिकार/सुविधा | प्रमुख प्रावधान |
|---|---|
| समानता और गैर-भेदभाव | RPwD Act के तहत संरक्षण |
| स्कूल शिक्षा | बेंचमार्क दिव्यांग बच्चों के लिए 6–18 वर्ष तक मुफ्त शिक्षा |
| उच्च शिक्षा | कम से कम 5% सीटों का आरक्षण |
| सरकारी नौकरी | कम से कम 4% रिक्तियों का आरक्षण |
| सुगम्यता | भवन, परिवहन, सूचना व सेवाओं तक पहुंच |
| कानूनी क्षमता | समान कानूनी मान्यता और सीमित अभिभावकता की व्यवस्था |
| UDID | दिव्यांगता प्रमाणपत्र और विशिष्ट पहचान |
| कानूनी सहायता | NALSA/राज्य/जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों से सहायता |
दिव्यांगता प्रमाणपत्र बन जाने का अर्थ यह नहीं है कि हर सरकारी योजना या आरक्षण का लाभ स्वतः मिल जाएगा। अलग-अलग योजनाओं और सेवाओं में अपनी पात्रता, प्रमाणपत्र और अन्य शर्तें हो सकती हैं।
इसी तरह UDID कार्ड महत्वपूर्ण पहचान दस्तावेज है, लेकिन किसी विशेष लाभ की पात्रता संबंधित योजना या कानून के नियमों पर निर्भर करती है।
दिव्यांग व्यक्तियों के लिए कानून केवल आरक्षण तक सीमित नहीं है। समानता, शिक्षा, रोजगार, सुगम्यता, कानूनी क्षमता और न्याय तक पहुंच भी इसके महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
सबसे पहला कदम है अपने दिव्यांगता प्रमाणपत्र और UDID से जुड़े दस्तावेज व्यवस्थित रखना और जिस लाभ की जरूरत है, उसकी पात्रता समझना। यदि किसी अधिकार से वंचित किया जाता है, तो संबंधित शिकायत निवारण तंत्र या विधिक सेवा प्राधिकरण की मदद लेने में संकोच नहीं करना चाहिए।
यह सामान्य कानूनी जानकारी है। किसी विशेष मामले में लागू नियमों और परिस्थितियों के अनुसार योग्य कानूनी विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित रहेगा।