
Macho Policing Against Women :"पुलिस का डंडा - हाथ महिला के प्राइवेट पार्ट्स पर…", कॉकरोच जनता पार्टी के के जंतर-मंतर धरने की ये तस्वीरें और वीडियो आपने देखी ही होंगी। इस घटना के बाद पुलिसिया बर्बरता के कारण एक बार फिर खाकी पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
हालांकि, यह कोई पहली बार नहीं है। अक्सर हम अपने आसपास की महिलाओं को देखते हैं कि वे पुलिस को देखकर सहम सी जाती हैं और थाने जाने से कतराती हैं। इसकी वजह यह है कि 'माचो' पुलिसिंग के मामले में हमारी पुलिस थानों से लेकर सड़कों तक हमेशा 'हाई जोश' में नज़र आती है।
'Citizens and the State' रिपोर्ट में केरल के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) एन.सी. अस्थाना ने कहा था, "पुलिस संस्कृति में टॉर्चर को अक्सर 'माचो' (Macho) यानी पुरुषत्व के प्रदर्शन के रूप में देखा जाता है, जबकि कानूनी, मानवीय और गैर-हिंसक प्रक्रियाओं को 'जनाना' (effeminate) मानकर कमजोर समझा जाता है।"
अक्सर किसी भी आंदोलन में पुलिस का यह 'माचो' अवतार देखने को मिल ही जाता है।
जंतर-मंतर के मामले पर मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बयान जारी कर कहा, "आंसू गैस और लाठीचार्ज। मेट्रो सेवाएं निलंबित, मोबाइल इंटरनेट बंद। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ गैर-जरूरी और अत्यधिक बल प्रयोग की खबरें सामने आई हैं। भारत में प्रदर्शनकारी संसद की ओर मार्च कर रहे थे, जिस दौरान पुलिस ने हिंसक कार्रवाई की।"
पूर्व आईपीएस अधिकारी से लेकर मानवाधिकार संगठन तक यही बात कह रहे हैं। अब जरा आंकड़ों के नजरिए से अपनी पुलिस को देखिए-
जब पुलिस बर्बरता और अपराधों का वर्गीकरण किया जाता है, तो आंकड़े स्पष्ट रूप से साबित करते हैं कि महिलाएं इस हिंसा के केंद्र में हैं:
Citizens and the State: Policing, Impunity, and the Rule of Law in India के मुताबिक, एससी/एसटी अत्याचारों में महिलाओं पर हमला: हाशिए के समुदायों पर होने वाले अत्याचारों में पुलिस का रवैया और पीड़ितों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। वर्ष 2018 में SC/ST समुदायों के खिलाफ दर्ज कुल 43,000 अपराधों में से आधे से अधिक मामले केवल महिलाओं के विरुद्ध दर्ज (बलात्कार, अपहरण और शारीरिक हमले) थे।
गुजरात केस स्टडी - 0.7% सजा दर: गुजरात के तीन जिलों में दलित महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर किए गए एक अध्ययन ने चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए। इनमें से 29% मामलों को केवल 'दुर्घटना या अस्वाभाविक मृत्यु' बताकर दर्ज ही नहीं किया गया। अदालती प्रक्रिया में सजा की दर मात्र 0.7% रही, केवल 17% मामले कोर्ट तक पहुँच सके और सभी आरोपी गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों बाद ज़मानत पर बाहर आ गए (स्रोत: "Citizens and the State")।
अंडर-रिपोर्टिंग और अमानवीयता का चक्र: देश में बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों की रिपोर्टिंग बेहद कम है; 2019 में दर्ज 33,000 मामले उस जमीनी सच्चाई का एक छोटा सा हिस्सा भर हैं।
इसके अलावा, सामूहिक बलात्कार, घरेलू हिंसा, एसिड अटैक और महिलाओं को नग्न घुमाने जैसी स्थानिक (Endemic) अमानवीय हिंसा आज भी जारी है।
Global Torture Index 2025 के अनुसार NHRC द्वारा 2,739 हिरासत में मौतों की रिपोर्ट दी गई। यह रैंकिंग भी दर्शाती है कि हमारे देश में पुलिसिया अत्याचार किस कदर खुलेआम हो रहा है:
जब पुलिसकर्मियों को यह विश्वास हो जाता है कि उन पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, तो महिलाओं और आम नागरिकों के खिलाफ उनकी हिंसा और भी निरंकुश हो जाती है:
'Status of Policing in India Report 2025' के अनुसार, 71% पुलिसकर्मी मानते हैं कि उन्हें बिना किसी सजा के डर के बल प्रयोग करने की पूरी छूट होनी चाहिए।
इसके साथ ही, गुजरात में 63% पुलिसकर्मियों ने माना कि अपराध सुलझाने के लिए टॉर्चर पूरी तरह से स्वीकार्य और आवश्यक है, जबकि केरल में ऐसा मानने वाले सिर्फ़ 3% थे (स्रोत: "Status of Policing in India Report 2025")।
भारत में न तो कोई विशिष्ट यातना-विरोधी (Anti-torture) कानून मौजूद है और न ही हिरासत में हिंसा को स्पष्ट रूप से अपराध घोषित किया गया है; वहीं दूसरी ओर, दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की स्थिति भी बेहद निराशाजनक है।
जब आप अपने सामने ऐसी सहमा देने वाली घटनाओं और हैरान करने वाले आंकड़ों (हिरासत में मौत, आंदोलन में बदसलूकी आदि) को देखते हैं, तो यह कहना पूरी तरह प्रासंगिक हो जाता है - "तस्वीरें और आंकड़े गवाह, फिर भी वर्दी बेगुनाह!"