
रात में बार-बार पसीना आने से नींद खुलना, बिना वजह गर्मी लगना, थकान या चिड़चिड़ापन जैसे लक्षण कई महिलाएं इन्हें बढ़ती उम्र का असर मानकर टाल देती हैं, जबकि ये मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) के आसपास के हार्मोनल बदलावों के संकेत हो सकते हैं। यह बीमारी नहीं, जीवन का स्वाभाविक पड़ाव है। सही जानकारी और जरूरत पर इलाज से यह दौर आसान हो सकता है।
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) के अनुसार हर साल करीब 4.7 करोड़ महिलाएं मेनोपॉज में प्रवेश करती हैं और 2030 तक एक अरब से अधिक महिलाएं मेनोपॉज के बाद के दौर में होंगी। मेनोपॉज और उसके बाद के चरण को साथ गिनें तो 2030 तक यह संख्या करीब 1.2 अरब पहुंचने का अनुमान है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक ज्यादातर महिलाओं में मेनोपॉज 45 से 55 वर्ष के बीच होता है और लगातार 12 महीने मासिक धर्म न आने पर इसे माना जाता है। इससे पहले के दौर को पेरिमेनोपॉज कहते हैं, जो कई साल चल सकता है और शारीरिक, भावनात्मक व सामाजिक सेहत पर असर डाल सकता है। इसमें पीरियड्स अनियमित होना, अचानक गर्मी लगना, रात में पसीना, नींद की परेशानी, मूड में बदलाव, जोड़ों में दर्द और योनि में सूखापन हो सकता है। एस्ट्रोजन घटने का असर हड्डियों और हृदय पर भी पड़ सकता है।
एक जरूरी बात यह है कि पेरिमेनोपॉज में गर्भधारण संभव है। इसलिए 12 महीने तक पीरियड न आने तक गर्भनिरोध की सलाह दी जाती है। भारत में स्थिति थोड़ी अलग है। भारतीय महिलाओं में मेनोपॉज औसतन करीब 46 वर्ष में होता है। यानी की यह अवस्था पश्चिमी देशों से पहले होती है। मेनोपॉज के लक्षण रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित करें तो महिलाओं को डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
क्लाइमेक्टेरिक जर्नल में 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में वंचित समुदायों की 32,518 महिलाओं में से 50% को मेनोपॉज के स्वास्थ्य प्रभावों की और 62% को उपलब्ध इलाज की जानकारी नहीं थी। यह अध्ययन हमें स्वतंत्र रूप से नहीं मिल सका, इसलिए इसे जर्नल से मिलान के बाद ही प्रकाशित करें। ब्रिटेन में भी यूसीएल की 2025 की एक रिसर्च के अनुसार ज्यादातर महिलाएं खुद को मेनोपॉज के बारे में कम जानकार मानती हैं।
भारतीय मेनोपॉज सोसाइटी ने 2026 की क्लिनिकल प्रैक्टिस गाइडलाइन जारी की है, जो जर्नल ऑफ मिड-लाइफ हेल्थ में प्रकाशित हुई। मेडिकल शिक्षा में मेनोपॉज को अधिक जगह देने, स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण और 40 से 60 वर्ष की महिलाओं पर ध्यान देने की बात गाइडलाइन के हवाले से कही गई है। इन विशिष्ट बिंदुओं की पुष्टि पूरा दस्तावेज देखकर करें।
फ्री प्रेस जर्नल के अनुसार इन गाइडलाइंस का अनुमान है कि 2024 में भारत में 45-49 वर्ष की करीब 4.6 करोड़ महिलाएं थीं, जबकि 2011 में यह संख्या 3 करोड़ थी। उसी रिपोर्ट में महाराष्ट्र के 580 समर्पित मेनोपॉज क्लिनिकों में 14 जनवरी से 11 फरवरी 2026 के बीच 31,288 महिलाओं की जांच हुई।
UNFPA के अनुसार लगभग हर 5 में से एक महिला ने मेनोपॉज के लक्षणों के कारण नौकरी छोड़ी या छोड़ने पर विचार किया। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को सालाना करीब 150 अरब डॉलर का नुकसान होता है। वहीं, रिप्रोडक्टिव हेल्थ जर्नल (30 मई 2026) में जापान में मासिक धर्म और मेनोपॉज का अध्यन किया गया।
रिप्रोडक्टिव हेल्थ जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार मासिक धर्म और मेनोपॉज के लक्षणों से सालाना करीब 2,296.30 अरब येन (14.65 अरब डॉलर) की उत्पादकता प्रभावित होती है, जिसमें 323.95 अरब येन अनुपस्थिति और 1,972.35 अरब येन कम कार्यक्षमता के कारण हैं। यह सर्वे सितंबर 2022 में 3,046 कामकाजी महिलाओं पर हुआ था और आंकड़ा दोनों स्थितियों का संयुक्त है। विशेषज्ञ मानते हैं कि मेनोपॉज पर खुलकर बात, समय पर जांच और कार्यस्थलों पर सहयोग से महिलाओं की सेहत और अर्थव्यवस्था, दोनों को फायदा हो सकता है।