
हिंदी साहित्य व आलोचना में डॉ. नामवर सिंह का नाम बहुत बड़ा है। उनका नाम केवल एक आलोचक के रूप में नहीं, बल्कि उस आलोचना-परंपरा के निर्णायक व्यक्तित्व के रूप में लिया जाता है, जिसने स्वतंत्रता के बाद हिंदी साहित्य को नये सवालों, नये प्रतिमानों और नई बहस से जोड़ा। उनकी आलोचना ने स्थापित मान्यताओं को चुनौती दी, लेकिन यह कहना अधिक सही होगा कि उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पूरी आलोचना को खारिज नहीं किया। उन्होंने शुक्ल की कुछ स्थापनाओं और मूल्यांकन-पद्धति के सामने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की अलग परंपरा को रख कर हिंदी आलोचना में वैकल्पिक दृष्टि विकसित की। यही प्रक्रिया आगे चल कर उनकी चर्चित पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ में दिखाई देती है।
नामवर सिंह की आलोचना समझने के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल से उनके संबंध समझना जरूरी है। शुक्ल हिंदी आलोचना के सबसे प्रभावशाली निर्माताओं में थे। उन्होंने साहित्य को इतिहास, समाज और लोकमंगल की कसौटियों से देखने की मजबूत परंपरा बनाई। बाद की हिंदी आलोचना में नामवर सिंह ने इसी परंपरा से संवाद किया और उसके कुछ निष्कर्षों पर सवाल भी उठाए।
उन्होंने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ (1982) में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को केंद्र में रख कर ऐसी साहित्यिक परंपरा की तलाश की, जिसमें कबीर, लोक, मध्यकालीन भक्ति और मनुष्य की स्वतंत्र चेतना को अलग ढंग से समझा जा सके। शोधपरक अध्ययनों में भी यह माना गया है कि नामवर सिंह ने शुक्ल की मान्यताओं के प्रतिपक्ष में द्विवेदी की दृष्टि को रखा। हालांकि विश्वनाथ त्रिपाठी जैसे आलोचकों ने इस स्थापना को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।
इसलिए यह कहना ज्यादा सटीक होगा कि नामवर सिंह ने शुक्ल को खारिज करने के बजाय शुक्ल-केंद्रित आलोचना के सामने एक वैकल्पिक आलोचनात्मक रास्ता खोला। यही उनकी मौलिकता थी।
मैनेजर पांडेय ने नामवर सिंह को अत्यंत बहुपठित आलोचक बताते हुए उनकी तुलना हिंदी में केवल रामचंद्र शुक्ल से की। उन्होंने यह भी माना कि नामवर की आलोचना में मतभेद की पर्याप्त गुंजाइश है, लेकिन उसे खारिज नहीं किया जा सकता।
नामवर सिंह के आलोचक के रूप में स्थापित होने की शुरुआत उनकी शुरुआती पुस्तकों से हुई। ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां’, ‘छायावाद’, ‘इतिहास और आलोचना’, ‘कहानी : नई कहानी’, ‘कविता के नए प्रतिमान’ और ‘दूसरी परंपरा की खोज’ ने उनके आलोचक व्यक्तित्व को लगातार मजबूत किया। विश्वविद्यालयी अध्ययन सामग्री में भी उन्हें स्वतंत्रता के बाद की हिंदी आलोचना के सबसे उल्लेखनीय आलोचकों में गिना गया है।
उनकी पुस्तक ‘छायावाद’ विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी। जिस दौर में नंददुलारे वाजपेयी, नागेंद्र और शांतिप्रिय द्विवेदी जैसे आलोचक छायावाद के प्रमुख व्याख्याकार थे, उस समय अपेक्षाकृत युवा नामवर सिंह ने छायावाद का नए ढंग से मूल्यांकन किया। शोधपरक अध्ययन इसे उनके आलोचना-कर्म की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानते हैं।
इसके बाद ‘कविता के नए प्रतिमान’ ने आधुनिक कविता को समझने के लिए नए आलोचनात्मक औजार सामने रखे। 1971 में इस पुस्तक के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला।
नामवर सिंह की सबसे चर्चित स्थापनाओं में ‘दूसरी परंपरा’ है। इसका अर्थ उन्होंने केवल साहित्य के इतिहास में दूसरी क्रमांक वाली परंपरा नहीं माना। यह एक वैकल्पिक दृष्टि थी-ऐसी दृष्टि जो मुख्यधारा के बाहर या उसके समानांतर मौजूद लोकधर्मी, विद्रोही और मानवीय परंपराओं को साहित्यिक इतिहास में महत्व देती है।
उनकी आलोचना में हजारी प्रसाद द्विवेदी का प्रभाव स्पष्ट था, लेकिन उन्होंने अपने गुरु की छाया मात्र बनकर नहीं लिखा। शोध आलेखों में भी यह बात सामने आती है कि द्विवेदी की इतिहास-दृष्टि से गहरे प्रभावित होने के बावजूद नामवर सिंह ने अपनी स्वतंत्र आलोचनात्मक दृष्टि विकसित की।
आलोचक नंदकिशोर नवल ने नामवर सिंह के बारे में लिखा कि वे हिंदी की दूसरी परंपरा के अन्वेषक थे और उनके आलोचना-कर्म में लोक की ओर लगातार लौटने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। उन्होंने नामवर की आलोचना को गैर-अकादमिक आलोचना का श्रेष्ठ उदाहरण भी माना।
नामवर सिंह के जीवन से जुड़ा एक तथ्य अक्सर गलत ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने सागर विश्वविद्यालय में अध्यापन किया था। उनकी उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हुई थी। वहीं से उन्होंने हिंदी में एमए और पीएचडी की। उनकी पीएचडी का विषय ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’ था और उनके शोध निर्देशक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी थे।
सागर विश्वविद्यालय में वे 1959-60 के दौरान हिंदी विभाग में सहायक प्रोफेसर रहे। उपलब्ध जीवन-वृत्तों में यही तथ्य मिलता है।
सागर में उनकी नियुक्ति भी संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में हुई। स्वयं नामवर सिंह के संस्मरण के अनुसार, नंददुलारे वाजपेयी उनके पक्ष में नहीं थे। चयन समिति में वाजपेयी के विरोध के बावजूद तत्कालीन कुलपति द्वारिका प्रसाद मिश्र और धीरेंद्र वर्मा ने उनका चयन किया। बाद में सागर में भी उनके और विभागीय नेतृत्व के बीच मतभेद हुए और उनका अध्यापन वहां लंबे समय तक नहीं चल सका।
राजस्थान में नामवर सिंह का प्रभाव केवल विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहा। राजस्थान के लेखक-आलोचक नंद भारद्वाज ने उनके आलोचना-कर्म को हिंदी की प्रगतिशील साहित्यिक परंपरा के पुनर्मूल्यांकन और समकालीन रचनाकर्म के वस्तुपरक मूल्यांकन से जोड़ा। उनके अनुसार नामवर सिंह की पहचान उनकी वस्तुनिष्ठ और वैज्ञानिक दृष्टि तथा विशिष्ट व्याख्या-विवेचन शैली के कारण बनी।
जोधपुर में नामवर सिंह के साथ काम करने वाले मैनेजर पांडेय भी बाद में हिंदी के महत्वपूर्ण आलोचक बने। पांडेय ने बताया कि 1971 में जोधपुर विश्वविद्यालय पहुंचने पर नामवर सिंह से साहित्यिक प्रश्नों पर बातचीत ने उनकी आलोचना में रुचि बढ़ाई और ‘आलोचना’ में उनके लेख प्रकाशित हुए।
इस अर्थ में राजस्थान का जोधपुर केवल नामवर सिंह की नौकरी का पड़ाव नहीं था; वह उनकी आलोचना और हिंदी अध्यापन की प्रयोगशाला भी बना।
नामवर सिंह की प्रतिष्ठा केवल उनके समर्थकों के कारण नहीं बनी। उनके आलोचनात्मक व्यक्तित्व को उनके विरोधियों ने भी गंभीरता से लिया।
साहित्य अकादेमी के तत्कालीन अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने नामवर सिंह की आलोचना को ‘जीवंत आलोचना’ कहा और माना कि लोग उनसे सहमत हों या असहमत, उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते।
मैनेजर पांडेय ने उन्हें हिंदी के अत्यंत पढ़े-लिखे आलोचकों में रखा और कहा कि समकालीन आलोचना में मतभेद के बावजूद उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता।
स्वयं अलग साहित्यिक सौंदर्यबोध के लिए जाने जाने वाले प्रख्यात साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने नामवर सिंह की आलोचना में संवादधर्मिता को महत्वपूर्ण माना। उनके अनुसार नामवर ने आलोचना में संवाद को केंद्रीय महत्व दिया और साहित्य को उसकी ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि में रखकर देखने का काम किया।
भारत यायावर ने नामवर सिंह को महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचंद्र शुक्ल, नंददुलारे वाजपेयी, हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा के बाद हिंदी आलोचना की गौरवशाली परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी माना है।
यही वजह है कि नामवर सिंह का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने किस आलोचक से असहमति जताई। उनका बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने आलोचना को बहस, संवाद, इतिहास, समाज और समकालीन रचनाशीलता से जोड़ा।
नामवर सिंह का साहित्य में स्थापित होना किसी एक किताब या एक विश्वविद्यालय की नौकरी का परिणाम नहीं था। इसके पीछे कई स्तरों पर बना उनका व्यक्तित्व था-गहरा अध्ययन, भारतीय साहित्यिक परंपरा का ज्ञान, मार्क्सवादी वैचारिक प्रशिक्षण, समकालीन साहित्य से लगातार संपर्क, प्रभावशाली वाचिक शैली और स्थापित मान्यताओं से बहस करने का साहस।
आलोचना उनका सबसे बड़ा क्षेत्र बनी
उन्होंने कविता से साहित्यिक यात्रा शुरू की, लेकिन आलोचना उनका सबसे बड़ा क्षेत्र बनी। सन 1950 के दशक में ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां’, ‘छायावाद’ और ‘इतिहास और आलोचना’ जैसी पुस्तकों ने उन्हें गंभीर आलोचक के रूप में पहचान दिलाई। 1960 के दशक में ‘कहानी : नई कहानी’ और ‘कविता के नए प्रतिमान’ ने समकालीन साहित्य के मूल्यांकन में उनकी भूमिका मजबूत की। फिर 1982 में ‘दूसरी परंपरा की खोज’ ने उन्हें हिंदी आलोचना की केंद्रीय बहसों में स्थायी जगह दे दी।
उनका संपादन भी उतना ही प्रभावशाली था। ‘जनयुग’ (1965-67) और खासकर ‘आलोचना’ के लंबे संपादकीय दौर ने उन्हें केवल पुस्तक लिखने वाला आलोचक नहीं रहने दिया, बल्कि समकालीन हिंदी साहित्य में बहस का मंच बनाने वाला व्यक्तित्व बना दिया। साहित्यिक अध्ययनों में ‘आलोचना’ को हिंदी के बौद्धिक विमर्श को दिशा देने वाली महत्वपूर्ण पत्रिका माना गया है।
डॉ. नामवर सिंह की साहित्यिक प्रतिष्ठा को एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है—उन्होंने हिंदी आलोचना में किसी एक परंपरा को मिटाकर अपनी जगह नहीं बनाई; उन्होंने स्थापित परंपरा से टकराकर, उससे संवाद करते हुए और उसके समानांतर नये प्रश्न खड़े कर के अपनी आलोचनात्मक परंपरा निर्मित की। यही कारण है कि आज भी हिंदी आलोचना के इतिहास में नामवर सिंह से होकर गुजरना अनिवार्य माना जाता है।
नामवर सिंह के अकादमिक जीवन में राजस्थान का जोधपुर अध्याय बहुत महत्वपूर्ण है। उपलब्ध प्रामाणिक जीवन-वृत्तों के अनुसार 1970 में उन्हें तत्कालीन कुलपति प्रोफेसर वी वी जॉन ने उन्हें जोधपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग का प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष नियुक्त किया गया।
इस नियुक्ति की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने जोधपुर की नौकरी के लिए आवेदन तक नहीं किया था। स्वयं नामवर सिंह ने एक साक्षात्कार में बताया कि जोधपुर ने उन्हें पहली बार प्रोफेसर बनाया और वह भी बिना इंटरव्यू के।
उनके अनुसार इस नियुक्ति में तत्कालीन कुलपति प्रो. वी.वी. जॉन की निर्णायक भूमिका थी। वी.वी. जॉन ने चयन के लिए विशेषज्ञ के रूप में विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के तत्कालीन कुलपति शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ को बुलाया था। जॉन ने सुमन से नामवर के बारे में राय ली। सुमन ने उनकी कम्युनिस्ट विचारधारा और विवादास्पद सार्वजनिक छवि का उल्लेख करते हुए सावधानी बरतने को कहा, लेकिन अंततः चयन नामवर सिंह के पक्ष में हुआ।
इस तरह उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि जोधपुर विश्वविद्यालय में नामवर सिंह की नियुक्ति में कुलपति वी.वी. जॉन की निर्णायक भूमिका थी और चयन-प्रक्रिया में विशेषज्ञ शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ महत्वपूर्ण व्यक्ति थे।
राजस्थान विधानसभा की कार्यवाही में भी बाद के वर्षों में जोधपुर विश्वविद्यालय के उन प्रमुख विद्वानों का उल्लेख हुआ है, जिनमें अज्ञेय और डॉ. नामवर सिंह शामिल हैं।
जोधपुर में नामवर सिंह केवल अध्यापक बनकर नहीं रहे। उन्होंने हिंदी विभाग के पाठ्यक्रम को आधुनिक बनाने की कोशिश की। प्रगतिशील और समकालीन साहित्य को पाठ्यक्रम में स्थान देना उनके काम का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
यही प्रयास बाद में विवाद का कारण भी बना। विशेष रूप से राही मासूम रज़ा के उपन्यास ‘आधा गाँव’ को पाठ्यक्रम में शामिल करने को लेकर विरोध हुआ। इस विरोध की तीव्रता इतनी बढ़ी कि उनकी नौकरी पर भी संकट आया।
उन्होंने सन 1974 में जोधपुर छोड़ा और उसी वर्ष जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र से जुड़े। बाद में वे जेएनयू में भारतीय भाषा केंद्र के संस्थापक अध्यक्ष बने और कई पीढ़ियों के विद्यार्थियों को तैयार किया।
डॉ. नामवरसिंह के साथ जोधपुर का गहरा रिश्ता रहा है। यह बात वे शिद्दत से महसूस भी करते थे और खुद कहते भी थे। जोधपुर में होने वाले सेमिनारों और यूनिवर्सिटी के पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों में भी जरूर आते थे। उन्होंने पत्रकार प्रभाष जोशी के साथ जोधपुर के डॉ. मदन डागा भवन का उद्घाटन समारोह में भी शिरकत की थी।
जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी के तत्कालीन कुलपति प्रो. एल एस राठौड़ ने एक लाख रुपए की एफडी करवा कर डॉ. नामवरसिंह व्याख्यानमाला शुरू की थी। उसमें नामवरसिंह ही मुख्य वक्ता होते थे। यह सिलसिला दो साल चला और फिर बंद हो गया।
शीर्ष पत्रकार प्रभाष जोशी ने देश के कई शहरों में 'नामवर के निमित्त' नाम से कार्यक्रम करवाए थे, उनमें से एक कार्यक्रम जोधपुर में भी हुआ था। जोधपुर के शीन काफ निजाम, सावित्री डागा, डॉ रमाकांत शर्मा, आईदानसिंह भाटी, डॅा. रामबक्ष और छोटाराम कुम्हार सहित कई साहित्यकार इसके गवाह रहे। वे प्रो एमजीके मेनन, प्रोफेसर मोहनस्वरूप माहेश्वरी और डॉ नंदलाल कल्ला की यादों में भी बसे रहे।
नामवरसिंह ने जोधपुर की जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय और महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश के संयुक्त तत्वावधान में सन 2001 में आयोजित अंतरराष्ट्रीय मीरा संगोष्ठी में शिरकत की थी।
डॉ. नामवरसिंह ने सुमन केसरी को दिए एक साक्षात्कार में कहा था-भले ही जोधपुर विश्वविद्यालय में आधा गांव उपन्यास को कोर्स में लगाने का विरोध हुआ हो और उसका अप्रिय अनुभव रहा हो, लेकिन जोधपुर का मेरे ऊपर ऋण है। क्यों कि जोधपुर ने ही मुझे पहली बार प्रोफेसर बनाया,वह भी बिना साक्षात्कार के। मेरी अनुपिस्थिति में मैं वहां चुना गया था। मुझे ऑफर देने में निर्णायक भूमिका थी विषय विशेषज्ञ के रूप में बुलाए गए शिवमंगलसिंह सुमन की तथा प्रो. वी वी जॉन की।
जोधपुर में आयोजित एक व्याख्यान-माला के दौरान, डॉ. नामवर सिंह ने अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में बात की थी। उन्होंने हिंदी उपन्यास की आत्मकथा 'शीर्षक से एक किताब लिखने और वह जोधपुर को समर्पित करने की अपनी इच्छा का ज़िक्र किया था। हालांकि वे अंततः इस किताब का प्रोजेक्ट पूरा नहीं कर पाए, लेकिन जोधपुर के प्रति उनके मन में गहरी कृतज्ञता की भावना थी-एक ऐसी भावना, जिसे उन्होंने कई मौकों पर व्यक्त किया।
-डॉ ओमप्रकाश टाक, साहित्यकार, जोधपुर।