
Ancient Human Diet Snakes Lizards: पश्चिमी एशिया के लेवांत क्षेत्र की पुरातात्विक खुदाई ने बताया कि प्राचीन शिकारी-संग्रहकर्ता सिर्फ बड़े जानवरों पर निर्भर नहीं थे, बल्कि सांप और छिपकलियां भी उनकी भोजन व्यवस्था का हिस्सा थीं।
आज सांप को देखकर ज्यादातर लोग उससे दूरी बनाते हैं, लेकिन हजारों साल पहले इंसान और सांप का रिश्ता सिर्फ डर या शिकार का नहीं था। पुरातत्व से सामने आए सबूत बताते हैं कि पश्चिम एशिया के लेवांत क्षेत्र में रहने वाले प्राचीन मानव समुदायों ने सांप और छिपकलियों को भी भोजन के रूप में इस्तेमाल किया था।
यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यह सिर्फ यह नहीं बताती कि उस समय लोग क्या खाते थे, बल्कि यह भी संकेत देती है कि इंसान अपने आसपास मौजूद छोटे से छोटे जीव-जंतु को भोजन के संभावित स्रोत के रूप में देखने लगा था। यानी आज की तरह भोजन कुछ चुनिंदा पशुओं तक सीमित नहीं था, बल्कि उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों की पूरी दुनिया थाली का हिस्सा बन सकती थी।
इसका महत्वपूर्ण प्रमाण इजराइल के माउंट कार्मेल क्षेत्र स्थित एल-वाड टेरेस से मिला। यह जगह नाटुफियन संस्कृति से जुड़ी मानी जाती है। यहां रहने वाले समुदाय लगभग 11,500 से 15,000 साल पहले के दौर में शिकारी-संग्रहकर्ता जीवन जी रहे थे।
खुदाई में सांपों और छिपकलियों की लगभग 3,000 हड्डियां मिलीं। ये अवशेष वहां मिले कुल पशु अवशेषों का करीब एक-तिहाई हिस्सा थे। इतनी बड़ी संख्या ने पुरातत्वविदों के सामने एक सवाल खड़ा किया, क्या ये जीव प्राकृतिक रूप से यहां पहुंचे थे या इंसानों ने इन्हें पकड़कर खाया था?
सिर्फ हड्डियां मिलना पर्याप्त प्रमाण नहीं था। सांप और छिपकली की छोटी और नाजुक हड्डियों पर इंसानों द्वारा काटने या मांस निकालने के निशान पहचानना बड़े जानवरों की तुलना में कहीं मुश्किल होता है।
इस पहेली को सुलझाने के लिए शोधकर्ताओं ने आधुनिक सांपों और छिपकलियों की हड्डियों पर प्रयोग किए। उन्होंने देखा कि प्राकृतिक मौसम, मिट्टी, आग, पैरों से कुचलने और शिकारी पक्षियों के पाचन के बाद हड्डियों की सतह पर किस तरह के निशान बनते हैं। इसके बाद इन आधुनिक नमूनों की तुलना पुरातात्विक स्थल से मिली हड्डियों से की गई।
नतीजा दिलचस्प था। कुछ बड़ी सांप प्रजातियों की कशेरुकाओं पर ऐसे कटने के निशान मिले जो इंसानी गतिविधि से मेल खाते थे। कई हड्डियों पर शिकारी पक्षियों के पाचन से बनने वाले निशान भी नहीं थे। इससे वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि कम से कम कुछ सांप और छिपकलियां वहां रहने वाले लोगों ने भोजन के लिए इस्तेमाल की थीं।
पुरातात्विक विश्लेषण में जिन जीवों की पहचान हुई, उनमें बिना पैरों वाली यूरोपीय ग्लास छिपकली, बड़ी व्हिप स्नेक, ईस्टर्न मोंटपेलियर स्नेक और सामान्य वाइपर जैसी प्रजातियां शामिल थीं।
हालांकि हर सांप की हड्डी को भोजन का प्रमाण मानना सही नहीं होगा। कुछ अवशेष शिकारी पक्षियों के शिकार या प्राकृतिक मृत्यु से भी वहां पहुंचे हो सकते हैं। यही वजह है कि शोधकर्ताओं ने हड्डियों पर बने अलग-अलग निशानों को बेहद सावधानी से जांचा।
इस खोज का सबसे बड़ा महत्व शायद सांप खाने से भी आगे है। नाटुफियन समुदाय उस समय के उन मानव समूहों में थे, जिनमें घूमते रहने के बजाय किसी स्थान पर लंबे समय तक रहने की प्रवृत्ति बढ़ रही थी। यही वह व्यापक ऐतिहासिक दौर था, जब मानव समाज धीरे-धीरे अधिक स्थायी बस्तियों, पौधों के गहन संग्रह और बाद में कृषि की दिशा में बढ़ रहा था।
ऐसे में सांप और छिपकली जैसे छोटे जीवों का इस्तेमाल बताता है कि इंसान अपने पर्यावरण के संसाधनों का अधिक व्यापक तरीके से उपयोग कर रहा था। छोटे शिकारों को भोजन में शामिल करना बदलते पर्यावरण में उपलब्ध संसाधनों का फायदा उठाने की रणनीति भी हो सकती थी।
दरअसल आज कई समाजों में सांप भोजन नहीं, बल्कि डर और खतरे का प्रतीक हैं। लेकिन भोजन की पसंद प्राकृतिक नियम से ज्यादा संस्कृति पर निर्भर करती है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इंसानों ने सदियों से ऐसे जीव खाए हैं, जिन्हें दूसरे समाज भोजन योग्य नहीं मानते। इसलिए प्राचीन लेवांत में सांप खाना किसी असामान्य व्यवहार का प्रमाण नहीं, बल्कि उस समय के पर्यावरण और उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप जीवन जीने की एक रणनीति हो सकता है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि एक छोटी-सी सांप की हड्डी आज हजारों साल पुरानी इंसानी जिंदगी की कहानी खोल सकती है, कहां रहते थे, क्या पकड़ते थे और प्रकृति में उपलब्ध किस चीज को भोजन समझते थे। यानी पुरातत्व में कभी-कभी इतिहास किसी राजमहल, हथियार या शिलालेख से नहीं, एक छोटी-सी हड्डी से बाहर आता है।