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बिना बोले दिमाग देगा कमांड, बोलने और चलने में असमर्थ लोगों के लिए नई तकनीक हो सकती है वरदान!

Brain Computer Interface Inner Speech: वैज्ञानिकों ने एक ऐसा ईईजी डेटा सेट तैयार किया है, जिसमें बिना बोले मन में दोहराए गए दिशा-संबंधी शब्दों की मस्तिष्क गतिविधि दर्ज की गई। जानिए यह तकनीक भविष्य में बोलने में असमर्थ लोगों के लिए कैसे बन सकती है संचार का नया माध्यम?
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 19, 2026

brain computer interface inner speech

brain computer interface inner speech: बिना बोले दिमाग देगा कमांड, जानिए क्या है यह नई तकनीक, बोलने और चलने में असमर्थ लोगों के लिए कैसे बन सकती है वरदान (AI Creative)

Brain computer interface inner speech: रूस और स्पेन के 22 स्वस्थ लोगों पर किए प्रयोग में वैज्ञानिकों ने दिमाग की विद्युत गतिविधि में उन संकेतों को दर्ज किया, जो व्यक्ति के मन में दिशा के शब्द दोहराने के दौरान पैदा हुए। अब यही तकनीक बोलने और चलने में असमर्थ लोगों के लिए नई संचार तकनीक की नींव बन सकती है।

कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति बोल नहीं सकता, हाथ-पैर नहीं हिला सकता, लेकिन उसके सामने रखा उपकरण उसके मन में बने एक छोटे से शब्द को पहचान ले। वह मन ही मन 'आगे' सोचे और मशीन आगे बढ़ जाए, 'बाएं' सोचे तो दिशा बदल जाए। अभी यह कल्पना पूरी तरह हकीकत नहीं बनी है, लेकिन मस्तिष्क-कंप्यूटर इंटरफेस यानी बीसीआई की दुनिया में हालिया शोध इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम जरूर दिखाता है।

प्रमुख वैज्ञानिक पत्रिका साइंटिफिक डेटा में 17 अगस्त 2026 को प्रकाशित एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ऐसा ईईजी डेटा सेट तैयार किया है, जिसमें लोगों के बिना आवाज निकाले शब्दों को मन में दोहराने के दौरान मस्तिष्क की गतिविधि दर्ज की गई। अध्ययन में 22 स्वस्थ स्वयंसेवक शामिल थे, 12 रूसी और 10 स्पेनिश भाषी। उनके सिर पर 38 इलेक्ट्रोड लगाए गए और दिमाग की विद्युत गतिविधि रिकॉर्ड की गई।

असली प्रयोग शब्द नहीं, दिमाग का इरादा पकड़ने पर था

शोध में प्रतिभागियों को छह दिशाओं से जुड़े शब्द दिए गए, आगे, पीछे, दाएं, बाएं, ऊपर और नीचे। रूसी प्रतिभागियों के लिए एक अतिरिक्त 'अगला' कमांड भी शामिल था। खास बात यह रही कि प्रतिभागियों ने हर शब्द को दो तरह से इस्तेमाल किया।

पहले उन्होंने शब्द को सामान्य रूप से बोलकर दोहराया। इसके बाद उसी शब्द को बिना बोले केवल मन में दोहराया। इस दौरान ईईजी मशीन लगातार मस्तिष्क की गतिविधि रिकॉर्ड करती रही।

यहीं इस शोध का सबसे दिलचस्प पहलू सामने आता है। वैज्ञानिकों का उद्देश्य केवल यह देखना नहीं था कि कोई व्यक्ति क्या बोल रहा है, बल्कि यह समझना था कि जब आवाज पैदा नहीं होती, तब भी क्या उस शब्द से जुड़ी मस्तिष्क गतिविधि मशीन से अलग पहचानी जा सकती है?

शोधकर्ताओं ने इसके लिए मशीन लर्निंग के कई सामान्य तरीकों का इस्तेमाल किया। अध्ययन में सबसे अच्छी वर्गीकरण सटीकता लगभग 78±4 प्रतिशत रही। इसका अर्थ यह नहीं है कि मशीन किसी व्यक्ति के हर विचार को 78 प्रतिशत सटीकता से पढ़ सकती है। यह प्रयोग में तय किए गए सीमित दिशा-संबंधी शब्दों की श्रेणियों में मस्तिष्क संकेतों को अलग पहचानने की क्षमता का परिणाम है।

'मन पढ़ना' नहीं, सीमित कमांड पहचानना

यहीं इस शोध को समझने में सबसे बड़ी सावधानी जरूरी है। यह तकनीक अभी किसी व्यक्ति के पूरे विचार, निजी यादें या मन में चल रही बातचीत पढ़ने वाली मशीन नहीं है। प्रयोग में पहले से तय शब्दों का एक सीमित सेट था और प्रतिभागियों को निर्देश दिया गया था कि वे उन्हीं शब्दों को मन में दोहराएं।

इसलिए इसे 'दिमाग पढ़ने वाली मशीन' कहना वैज्ञानिक रूप से अतिशयोक्ति होगी। ज्यादा सही तरीके से कहें तो यह शोध यह दिखाता है कि मस्तिष्क में बनने वाली आंतरिक भाषा से जुड़े संकेतों को सीमित परिस्थितियों में कंप्यूटर एल्गोरिदम से वर्गीकृत किया जा सकता है।

सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को हो सकता है जो बोल नहीं सकते

इस तकनीक का महत्व सामान्य व्यक्ति के लिए मोबाइल या कंप्यूटर चलाने से कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार बीसीआई तकनीक गंभीर मोटर और भाषण संबंधी अक्षमता वाले लोगों के लिए संचार का नया माध्यम बन सकती है। लॉक्ड-इन सिंड्रोम, एएलएस या कुछ गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थितियों में व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता काफी हद तक बनी रह सकती है, लेकिन बोलने या शरीर को नियंत्रित करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

ऐसे मामलों में यदि मस्तिष्क के संकेतों से सीमित कमांड पहचानी जा सके, तो भविष्य में व्हीलचेयर, कंप्यूटर, संचार उपकरण या अन्य सहायक तकनीकों को नियंत्रित करने के नए रास्ते खुल सकते हैं।

भाषा बदलने पर भी क्या मशीन समझ पाएगी?

इस शोध की एक और खासियत यह है कि इसमें दो अलग भाषाओं, रूसी और स्पेनिश का इस्तेमाल हुआ। शोधकर्ताओं ने दोनों भाषाओं में समान अर्थ वाले दिशासूचक शब्दों का प्रयोग किया। इससे भविष्य के लिए एक बड़ा सवाल सामने आता है, क्या मशीन केवल किसी खास भाषा के शब्दों को पहचानेगी या वह शब्द के पीछे मौजूद इरादे और अर्थ से जुड़े मस्तिष्क संकेतों को भी पहचान सकती है?

अभी इसका जवाब नहीं मिला है। अध्ययन में केवल 22 स्वस्थ लोगों का डेटा था और प्रतिभागियों की उम्र 18 से 34 वर्ष के बीच थी। इसलिए वास्तविक मरीजों, अलग उम्र के लोगों और अलग-अलग भाषाओं में इसके प्रदर्शन की जांच अभी जरूरी होगी।

फिर भी यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण दिशा दिखाता है, भविष्य के कंप्यूटर को हमेशा हमारी आवाज की जरूरत नहीं होगी। हो सकता है कि किसी दिन कुछ बेहद सरल कमांड बोलने के बजाय सिर्फ मन में दोहराना ही पर्याप्त हो।