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भारत में सिर्फ 15% कामकाजी लोग इस्तेमाल करते हैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट, 43% कर्मचारी टू-व्हीलर पर निर्भर

भारत सरकार के NSO के पहले 'नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे' के अनुसार, केवल 15% कर्मचारी सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करते हैं, जबकि 46% लोग टू-व्हीलर या कार पर निर्भर हैं। कर्मचारियों के आने-जाने में टू-व्हीलर की हिस्सेदारी 43% और कार की 3% है।
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Oct 06, 2026
Public transport use status in india
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)

भारत सरकार की केंद्रीय नोडल एजेंसी नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (NSO) के पहले 'नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे' (NHTS) के अनुसार, केवल 15 प्रतिशत कामगार बस, ट्रेन, ट्राम या ऑटो-रिक्शा जैसे सार्वजनिक परिवहन से काम पर जाते हैं। इसके मुकाबले 46 प्रतिशत टू-व्हीलर या कार पर निर्भर हैं। सांख्यिकी मंत्रालय (MoSPI) के तहत NSO ने 5 अक्टूबर 2026 को फैक्टशीट जारी कर सर्वे के मुख्य संकेतक सामने रखे।

NSO के सर्वे का दायरा

NSO के अनुसार, यह सर्वे जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच हुआ। इसमें 14,274 गांवों और 10,377 शहरी ब्लॉकों के 4,92,023 परिवार और 20,34,371 लोग शामिल थे। सर्वे में एक किलोमीटर से अधिक दूरी की यात्राएं गिनी गईं। सर्वे में आने और जाने को 2 अलग यात्राएं माना गया। NSO ने इसका मकसद क्षेत्रीय परिवहन योजना, बुनियादी ढांचे के विकास और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण में मदद करना बताया है। यह घरेलू यात्रा पर देश का पहला अखिल भारतीय सर्वे है।

टू-व्हीलर का दबदबा

सर्वे के मुताबिक, कामगारों के आवागमन में टू-व्हीलर की हिस्सेदारी 42.6 प्रतिशत (मोटे तौर पर 43%) है। कार की हिस्सेदारी करीब 3 प्रतिशत है। ग्रामीण इलाकों में 37.1 प्रतिशत कामगार टू-व्हीलर इस्तेमाल करते हैं, जबकि शहरों में यह आंकड़ा 52.3 प्रतिशत है। रिपोर्ट के अनुसार, शहरी इलाकों में कार से चलने वाले कामगार 5.7 प्रतिशत हैं। यानी शहरों में भी कार से दफ्तर जाने वाले कम हैं और ज्यादातर लोग दोपहिया पर निर्भर हैं।

पैदल और साइकिल वालों की स्थिति

करीब 28.3 प्रतिशत कामगार लोग पैदल काम पर जाते हैं, जो देश में दूसरा सबसे आम तरीका है। साइकिल का इस्तेमाल 10.7 प्रतिशत करते हैं। गांवों में पैदल चलने वालों का हिस्सा 36.6 प्रतिशत है, जबकि शहरों में 13.5 प्रतिशत। सार्वजनिक परिवहन में शहरी जन-परिवहन का राष्ट्रीय हिस्सा 5 प्रतिशत है। राज्यों में महाराष्ट्र (20.7%), पश्चिम बंगाल (16.5%) और दिल्ली (14.4%) में यह हिस्सेदारी ज्यादा दिखी।

25 मिनट का सफर, ₹785 का खर्च

सर्वे के अनुसार काम की जगह तक पहुंचने में औसतन 25 मिनट लगते हैं। करीब 95 प्रतिशत कामगार सुबह 10 बजे से पहले घर से निकल जाते हैं। निश्चित कार्यस्थल पर जाने वाले कामगार औसतन हर महीने ₹785 आने-जाने पर खर्च करते हैं। शहरों में यह खर्च ₹1,044 और गांवों में ₹612 है। पुरुषों का औसत खर्च ₹835 और महिलाओं का ₹533 रहा।

छात्रों और परिवारों का पैटर्न

NHTS के अनुसार 15 से 29 साल के छात्रों में रोजाना यात्रा की भागीदारी सबसे ज्यादा है। ग्रामीण इलाकों में यह 79.1 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 73.3 प्रतिशत है। छात्रों का सबसे आम तरीका पैदल चलना (करीब 37%) है। रात भर की पारिवारिक यात्राओं में बस (55.8%) और रेलवे (17.7%) सबसे आगे हैं, इसके बाद कार (15.1%) और टू-व्हीलर (8.8%) आते हैं।

क्या कहते हैं आंकड़े?

ये आंकड़े बताते हैं कि भारत के कामगारों के बड़े हिस्से के लिए निजी या पैदल यात्रा ही मुख्य साधन है। सार्वजनिक परिवहन की कम हिस्सेदारी का असर सड़कों पर भीड़, ईंधन खपत और खर्च पर पड़ सकता है, जैसा कि कुछ रिपोर्टों में संकेत दिया गया। नीति निर्माताओं के लिए यह सर्वे पहला राष्ट्रीय बेंचमार्क है, जिससे शहरों और राज्यों की परिवहन योजना को आधार मिलेगा।

Updated on:
06 Oct 2026 07:57 pm
Published on:
06 Oct 2026 07:57 pm