
Onam 2026 Real Story: 26 अगस्त 2026 को भारत में थिरुवोनम मनाया जाएगा। जानिए क्यों ओणम सिर्फ महाबली के स्वागत या फसल उत्सव का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में समानता, समृद्धि, प्रकृति, अतिथि-सत्कार और मिल-बांटकर खुशियां मनाने की अनूठी परंपरा का प्रतीक है। आज अकेला केरल नहीं देश दुनिया में पहुंचे केरल के लोग इस पर्व को धूमधाम से मनाते हैं।
26 अगस्त 2026 को केरल के घरों के आंगन में फूलों की रंगोली होगी, केले के पत्ते पर सजी सद्या होगी और लोकगीतों से वातावरण गूंजेगा। यह थिरुवोनम का दिन होगा, ओणम उत्सव का सबसे महत्वपूर्ण दिन। दस दिवसीय उत्सव की शुरुआत 17 अगस्त (सोमवार) को अथम से हो चुकी है, और केरल सरकार ने इस बार ओणम के लिए चार सार्वजनिक अवकाश भी घोषित किए हैं, जो सीधे वीकेंड से जुड़कर एक लंबी छुट्टी का मौका बना रहे हैं। लेकिन ओणम को अगर सिर्फ फूल, पकवान और नाव की दौड़ वाला त्योहार समझ लिया जाए तो इसकी सबसे महत्वपूर्ण कहानी छूट जाती है। ओणम दरअसल उस राजा की स्मृति का उत्सव है, जिसकी प्रजा उसके लौटने का इंतजार आज भी उसी उत्साह से करती है।
लोक-परंपरा के अनुसार महाबली एक ऐसे राजा थे, जिनके शासन में समृद्धि और समानता की कल्पना की जाती है। भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर उनसे तीन पग भूमि मांगी। दो पग में पृथ्वी और आकाश नाप लेने के बाद तीसरे पग के लिए महाबली ने अपना सिर प्रस्तुत कर दिया।
कथा के अनुसार महाबली को पाताल लोक जाना पड़ा, लेकिन उन्हें वर्ष में एक बार अपनी प्रजा से मिलने की अनुमति मिली। इसी वार्षिक आगमन की स्मृति में ओणम मनाया जाता है।
यही कारण है कि ओणम में राजा की पूजा से ज्यादा राजा और प्रजा के रिश्ते की स्मृति दिखाई देती है। केरल की सांस्कृतिक परंपरा में महाबली का आदर्श शासन एक ऐसे समाज की कल्पना से जुड़ा है जहां, समृद्धि और बराबरी हो। केरल सरकार के प्रकाशनों में भी ओणम को समानता, सामुदायिक भावना और समृद्धि की आकांक्षा से जोड़ा गया है।
ओणम के दौरान घरों के सामने बनने वाला पुक्कलम (पूक्कलम) इसकी सबसे खूबसूरत पहचान है। अलग-अलग रंगों के फूलों से बनने वाली यह फूलों की कालीन दस दिन तक धीरे-धीरे बड़ी होती जाती है और थिरुवोनम के दिन अपने सबसे भव्य रूप में पहुंचती है।
केरल पर्यटन के अनुसार उत्सव अथम से शुरू होकर हर दिन नए चरण से गुजरता है। जैसे पूरादम के दिन पारंपरिक रूप से ओणथप्पन (महाबली की प्रतीकात्मक मूर्ति) घर लाई जाती है। घरों, होटलों, मंदिरों और सार्वजनिक जगहों पर पुक्कलम बनाने की प्रतिस्पर्धा भी इस मौसम की सबसे फोटोजेनिक झलक बन जाती है।
इसे भारतीय संस्कृति की उस व्यापक परंपरा से जोड़कर देखा जा सकता है, जिसमें घर की चौखट पर प्रकृति का स्वागत शुभ माना जाता रहा है। यहां फूल सिर्फ सुंदरता नहीं हैं। वे प्रकृति, ऋतु और समृद्धि के प्रतीक बन जाते हैं।
ओणम की सद्या भी अपने आप में एक सांस्कृतिक कहानी है। केले के पत्ते पर परोसा जाने वाला यह पारंपरिक शाकाहारी भोजन कई अलग-अलग व्यंजनों से मिलकर बनता है। थिरुवोनम की सद्या में आमतौर पर करीब 24 से 26 तक अलग-अलग पकवान परोसे जाते हैं, जिन्हें एक तय क्रम में केले के पत्ते पर सजाया जाता है।
इसमें खास बात केवल पकवानों की संख्या नहीं, बल्कि एक साथ बैठकर भोजन करने की परंपरा है। केरल सरकार के सांस्कृतिक प्रकाशनों में सद्या को परिवार और समुदाय के साथ साझा किए जाने वाले उत्सव से जोड़ा गया है।
भारतीय संस्कृति में भोजन सिर्फ पेट भरने का माध्यम नहीं रहा। अतिथि को भोजन कराना, साथ बैठकर खाना और अपनी खुशियां बांटना सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का माध्यम रहा है। ओणम इसी भावना को बेहद खूबसूरत तरीके से सामने रखता है।
ओणम की एक विशेषता यह भी है कि इसकी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति सिर्फ धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहती। पुक्कलम, सद्या, लोकनृत्य, संगीत, पारंपरिक खेल, नाव दौड़ और विभिन्न लोककलाएं मिलकर इसे व्यापक सामुदायिक उत्सव बनाती हैं।
केरल पर्यटन के अनुसार ओणम के दौरान कथकली, मोहिनीअट्टम, पुलिकली (बाघ-नृत्य, जो आमतौर पर 29 अगस्त के आसपास निकलता है), थिरुवातिरा और वल्लमकली (सर्प-नाव दौड़) जैसी परंपराएं भी उत्सव का हिस्सा बनती हैं। इसी कड़ी में मशहूर नेहरू ट्रॉफी वल्लमकली (बोट रेस) भी 22 अगस्त के आसपास आलप्पुझा में आयोजित होती है, जो ओणम सीजन का एक बड़ा आकर्षण बन चुकी है। यानी यह ऐसा पर्व है जिसमें धर्म, लोककला, प्रकृति, भोजन और समुदाय एक ही सांस्कृतिक धागे में जुड़ जाते हैं।
इस साल ओणम की खास बात यह भी है कि केरल इसे अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक अनुभव के रूप में प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहा है। ओणम पर्यटन सप्ताह के दौरान तिरुवनंतपुरम में पारंपरिक कलाओं, पुक्कलम, सद्या और सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिए आगंतुकों को इस परंपरा से जोड़ने की योजना है, जो 30 अगस्त को एक भव्य शोभायात्रा के साथ अपने चरम पर पहुंचेगी।
लेकिन दुनिया के सामने ओणम की सबसे बड़ी पहचान सिर्फ इसकी रंगीन तस्वीरें नहीं होनी चाहिए। इसके पीछे छिपा विचार ज्यादा महत्वपूर्ण है। एक ऐसा राजा जिसकी प्रजा उसे इसलिए याद करती है क्योंकि उसके शासन की कल्पना सुख, समानता और समृद्धि से जुड़ी है। शायद यही वजह है कि सदियों पुरानी यह कथा आज भी जीवित है।
ओणम हमें याद दिलाता है कि भारतीय त्योहार केवल पूजा और परंपराओं का नाम नहीं हैं। इनके भीतर समाज के सपने, प्रकृति के प्रति सम्मान, भोजन साझा करने की संस्कृति और बेहतर जीवन की कल्पना भी छिपी होती है। इसलिए 26 अगस्त 2026 को जब केरल के घरों में पुक्कलम सजेगा और सद्या परोसी जाएगी, तो वह सिर्फ एक त्योहार नहीं होगा। वह उस भारत की लोक-स्मृति भी होगी, जहां समृद्धि का अर्थ अकेले खुश होना नहीं, बल्कि सबके साथ खुश होना था।