
इंटरनेट पर जानकारी खोजने का तरीका तेजी से बदल रहा है। पहले किसी सवाल का जवाब जानने के लिए लोग गूगल जैसे सर्च इंजन पर खोज करते थे और नतीजों में दिख रही वेबसाइटों पर क्लिक करते थे। अब बड़ी संख्या में लोग सीधे चैटजीपीटी, जेमिनी या गूगल के एआइ ओवरव्यू जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल से सवाल पूछ रहे हैं, जो कुछ ही सेकंड में जवाब तैयार कर देते हैं और कई बार यूजर को किसी वेबसाइट पर जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। यह सुविधा यूजर के लिए आसान जरूर है, लेकिन यह इंटरनेट की उस व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर रही है, जिस पर पिछले करीब तीन दशकों से वेबसाइटें, सर्च इंजन और डिजिटल विज्ञापन आधारित कारोबार टिका रहा है।
रिसर्च फर्म बेन एंड कंपनी के फरवरी 2025 के उपभोक्ता सर्वेक्षण के अनुसार 80% उपभोक्ता कम-से-कम 40% खोजों में एआइ जनित नतीजों पर ही निर्भर हो चुके हैं, जिसके चलते कई क्षेत्रों में समग्र वेबसाइट ट्रैफिक करीब 15 से 25% तक गिर चुका है। यह गिरावट कहीं ज्यादा तीखी तब दिखती है, जब बात क्लिक-थ्रू रेट (CTR) यानी नतीजा देखने के बाद असल में क्लिक करने वालों के अनुपात की हो। सीयर इंटरैक्टिव के 2.5 करोड़ इंप्रेशन के अध्ययन में जब भी गूगल का AI ओवरव्यू सामने दिखा, ऑर्गेनिक सीटीआर 1.62% से गिरकर 0.61% तक आ गया, यानी करीब 61% की गिरावट, वहीं प्यू रिसर्च सेंटर के 68,879 वास्तविक सर्च के व्यवहारगत अध्ययन में यह गिरावट करीब 47% आंकी गई।
मौजूदा अनुमानों के मुताबिक करीब 58 से 60% गूगल सर्च अब बिना किसी वेबसाइट पर क्लिक हुए ही खत्म हो जाते हैं, यानी सर्च नतीजों के पन्ने पर ही यूजर को पूरा जवाब मिल जाता है। टेक रिसर्च फर्म गार्टनर ने फरवरी 2024 में ही अनुमान लगाया था कि एआइ चैटबॉट और वर्चुअल एजेंटों के कारण पारंपरिक सर्च इंजन का ट्रैफिक 2026 तक करीब 25% घट सकता है। यह अनुमान अब काफी हद तक सही साबित होता दिख रहा है। हालांकि गिरावट की सटीक मात्रा को लेकर अलग-अलग अध्ययनों में मतभेद बना हुआ है, क्योंकि कोई सीटीआर मापता है तो कोई कुल ट्रैफिक मापता है।
AI के इस्तेमाल का असर अब साफ दिखने लगा है। कई वेबसाइट संचालक एआइ कंपनियों के क्रॉलर्स यानी जानकारी बटोरने वाले सॉफ्टवेयर को अपनी साइट से डेटा उठाने से रोक रहे हैं। उनकी चिंता वाजिब है: अगर एआइ उनकी सामग्री के आधार पर जवाब बनाएगा, लेकिन बदले में यूजर को वेबसाइट पर नहीं भेजेगा, तो भरोसेमंद और गुणवत्तापूर्ण कंटेंट तैयार करने में होने वाला खर्च निकालना मुश्किल हो जाएगा। अमेरिकी प्रकाशकों के लिए गूगल से मिलने वाला रेफरल ट्रैफिक साल-दर-साल करीब 38% तक गिर चुका है, और स्वास्थ्य, यात्रा व वित्त जैसे क्षेत्रों की वेबसाइटें सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं।
एक दूसरी समस्या भी है, अगर बड़ी और भरोसेमंद वेबसाइटें अपनी सामग्री तक पहुंच सीमित करने लगेंगी, तो AI मॉडलों को मिलने वाली विश्वसनीय जानकारी का ही अभाव हो जाएगा। जिसका सीधा असर AI के जवाबों की गुणवत्ता पर पड़ेगा। यानी यह एक ऐसा चक्र है, जिसमें अंततः नुकसान यूजर का भी हो सकता है।
एसई रैंकिंग के 1,01,574 से अधिक वेबसाइटों के विश्लेषण के अनुसार सभी AI प्लेटफॉर्मों से मिलने वाला संयुक्त रेफरल ट्रैफिक वास्तव में तेजी से बढ़ रहा है। जनवरी 2026 तक यह वैश्विक इंटरनेट ट्रैफिक का करीब 0.24% हो गया, जो एक साल पहले महज 0.15% था। इसमें चैटजीपीटी की हिस्सेदारी सबसे बड़ी (करीब 80%) बनी हुई है, भले ही उसका ट्रैफिक अक्टूबर 2025 के शिखर के बाद नवंबर-दिसंबर में अस्थायी तौर पर घटा और जनवरी में आंशिक रूप से फिर बढ़ा।
इसके उलट गूगल जेमिनी का रेफरल ट्रैफिक इसी दौरान करीब दोगुना हो गया। बहरहाल, यह वृद्धि दर भले ही तेज हो, पर आधार छोटा है। पारंपरिक ऑर्गेनिक सर्च आज भी एआइ प्लेटफॉर्मों के मुकाबले सैकड़ों गुना ज्यादा ट्रैफिक वेबसाइटों को भेजता है। इसलिए असली तस्वीर यह है कि एआइ प्लेटफॉर्मों से मिलने वाला ट्रैफिक भले ही तेजी से बढ़ रहा हो, लेकिन पारंपरिक सर्च से मिलने वाले कुल ट्रैफिक की भरपाई फिलहाल नहीं कर पा रहा है।