
साइंस की दुनिया में एक ऐसा रहस्य सुलझ गया है जिसे दशकों से नामुमकिन माना जा रहा था। जर्मनी की मशहूर गोटिंगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने क्वांटम दुनिया के सबसे बड़े राज़ पर से पर्दा उठा दिया है। भौतिक वैज्ञानिकों की इस टीम ने नैनोमीटर आकार के एक कार्बनिक अणु (ऑर्गेनिक मॉलिक्यूल) की आंतरिक क्वांटम संरचना यानी उसके वेवफंक्शन की पहली मुकम्मल और बेहद साफ़ 3D तस्वीर तैयार करने में ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की है।
यह अभूतपूर्व रिसर्च प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हुई है। इस पूरी रिसर्च की कमान मुख्य शोधकर्ता डॉ. विबके बेनेके, सह-अध्ययन प्रमुख डॉ. मथिज्स जानसेन और वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर स्टीफन मैथियास के हाथों में थी।
| क्रम | रिसर्च आयाम | मुख्य वैज्ञानिक तथ्य |
| 01 | प्रमुख शोध संस्थान | गोटिंगन यूनिवर्सिटी (University of Göttingen), जर्मनी |
| 02 | मुख्य वैज्ञानिक | डॉ. विबके बेनेके, डॉ. मथिज्स जानसेन, प्रो. स्टीफन मैथियास |
| 03 | शोध पत्र प्रकाशन | नेचर कम्युनिकेशंस (Nature Communications) |
| 04 | मुख्य तकनीक | फ़ोटोइलेक्ट्रॉन टोमोग्राफी एवं एडवांस्ड एल्गोरिद्म |
| 05 | प्रकाश स्रोत | लैब-आधारित सॉफ़्ट-एक्स-रे पल्स (अल्ट्राशॉर्ट) |
| 06 | सैंपल अणु | नैनोमीटर आकार का ऑर्गेनिक (कार्बनिक) मॉलिक्यूल |
| 07 | मापन रिज़ॉल्यूशन | कार्बन परमाणुओं की दूरी से भी अधिक सूक्ष्म |
| 08 | समय सीमा क्षमता | फेम्टोसेकंड (Femtosecond / $10^{-15}$ सेकंड) |
| 09 | मुख्य उपलब्धि | वेवफंक्शन का संपूर्ण 3D पुनर्निर्माण |
| 10 | भविष्य का अनुप्रयोग | मॉलिक्यूल्स के बदलावों की रियल-टाइम 3D वीडियो |
रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हम मानते हैं कि कोई भी ठोस वस्तु एक समय में किसी एक तय जगह पर ही मौजूद होती है। लेकिन परमाणुओं और इलेक्ट्रॉनों की सूक्ष्म क्वांटम दुनिया हमारे इस सीधे नियम को सिरे से खारिज कर देती है।
क्वांटम यांत्रिकी के मुताबिक, इलेक्ट्रॉन किसी एक निश्चित बिंदु पर टिक कर नहीं रहते। वे एक साथ कई जगहों पर पाए जाने की संभावना के रूप में मौजूद होते हैं। विज्ञान की भाषा में इस गणितीय फैलाव को 'वेवफंक्शन' कहा जाता है।
जब कई परमाणु मिलकर एक मॉलिक्यूल (अणु) बनाते हैं, तो उनके इलेक्ट्रॉनों का यह वेवफंक्शन आपस में मिलकर 'मॉलिक्यूलर ऑर्बिटल' (Molecular Orbital) कहलाता है। यही ऑर्बिटल तय करता है कि:
कोई पदार्थ रोशनी को कैसे सोखेगा या परावर्तित करेगा।
दो अलग-अलग मॉलिक्यूल आपस में मिलकर कौन सी रासायनिक क्रिया (Chemical Reaction) करेंगे।
पदार्थ के भीतर बिजली का प्रवाह (Conductivity) कैसा रहेगा।
समस्या यह थी कि क्वांटम नियमों के चलते वेवफंक्शन को सीधे कैमरे से खींचना या किसी यंत्र से मापना असंभव था, क्योंकि उसे छूते ही या देखते ही उसकी मूल अवस्था बदल जाती थी।
गोटिंगन यूनिवर्सिटी की टीम ने सीधे देखने के बजाय एक बेहद चतुर और परोक्ष (Indirect) तरीका चुना। वैज्ञानिकों ने दो आधुनिक तकनीकों का ऐसा तालमेल बिठाया जिसने दशकों पुरानी बाधा को तोड़ दिया:
पहले ऐसे प्रयोगों के लिए फुटबॉल मैदान जितनी बड़ी और अरबों रुपये की लागत वाली सिन्क्रोट्रॉन (Synchrotron) मशीनों की ज़रूरत पड़ती थी। गोटिंगन के वैज्ञानिकों ने अपनी प्रयोगशाला में ही बेहद ताक़तवर 'सॉफ़्ट-एक्स-रे' (Soft X-ray) लाइट सोर्स तैयार किया। इस प्रकाश स्रोत से रोशनी की बेहद छोटी और तीव्र किरणें (अल्ट्राशॉर्ट पल्स) मॉलिक्यूल पर डाली गईं।
एक्स-रे की किरणें टकराते ही अणु से इलेक्ट्रॉन बाहर छिटक गए। वैज्ञानिकों ने एक विशेष डिटेक्टर से इन उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की दिशा, गति और उनके संवेग (Momentum) को पूरी सटीकता से नाप लिया। इससे वैज्ञानिकों को वेवफंक्शन के आधे हिस्से की जानकारी मिल गई, वह भी अणु की आंतरिक संरचना को बिना नष्ट किए।
प्रयोग से सिर्फ़ आधा डेटा मिला था, बाकी आधा हिस्सा नदारद था। इसके लिए वैज्ञानिकों ने स्क्रैच से एक नया कंप्यूटर एल्गोरिद्म तैयार किया। इस एल्गोरिद्म ने उपलब्ध डेटा का विश्लेषण कर गायब जानकारी को पूरी सटीकता से जोड़ दिया और मॉलिक्यूलर ऑर्बिटल का पूरा 3D ढांचा स्क्रीन पर उभार दिया।
यह 3D तस्वीर सिर्फ़ एक धुंधला खाका नहीं है, बल्कि इसका रिज़ॉल्यूशन इतना ज़बरदस्त है कि यह अणु के भीतर मौजूद कार्बन परमाणुओं (Carbon Atoms) के बीच की बेहद बारीक दूरी से भी छोटे हिस्सों को साफ़-साफ़ दिखाती है। वैज्ञानिकों ने न केवल पूरे ऑर्बिटल का आयतन (Volume) और फैलाव देखा, बल्कि उसके हर कोने के सूक्ष्म घुमावों को भी सटीकता से दर्ज किया।
इसके अलावा, नए एल्गोरिद्म का सबसे बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि बहुत कम प्रायोगिक डेटा (Experimental Data) से भी पूरी और सटीक 3D तस्वीर बन गई। इससे प्रयोग में लगने वाला समय महीनों से घटकर कुछ ही घंटों का रह गया।
इस खोज का सबसे रोमांचक पहलू है समय की रफ़्तार। यह पूरी प्रक्रिया फेम्टोसेकंड (Femtosecond) के पैमाने पर काम करने में सक्षम है।
एक फेम्टोसेकंड एक सेकंड का $10^{-15}$वां हिस्सा (यानी एक सेकंड का दस लाखवां-अरबवां हिस्सा) होता है।
मुख्य लेखक डॉ. विबके बेनेके के अनुसार, इस तकनीक से अब विज्ञान की दुनिया में 'स्ट्रोबोस्कोपिक वीडियोग्राफी' का सपना सच होने जा रहा है। अब तक वैज्ञानिक सिर्फ़ रासायनिक क्रिया शुरू होने से पहले और खत्म होने के बाद की स्थिति देख पाते थे, बीच में क्या हुआ वह हमेशा एक रहस्य रहता था।
रोशनी पड़ने पर अणु के इलेक्ट्रॉन किस तरह अपनी जगह बदलते हैं।
दो अणुओं के टकराने पर उनके बीच रासायनिक बंधन (Chemical Bonds) कैसे टूटते और जुड़ते हैं।
एक फेम्टोसेकंड के अंदर अणु अपनी ऊर्जा को कैसे संतुलित करता है।
यह रिसर्च सिर्फ़ किताबी भौतिकी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यावहारिक उपयोग आने वाले कल की तकनीक को पूरी तरह बदल देंगे:
सुपरफास्ट क्वांटम कंप्यूटिंग: क्वांटम चिप्स में जानकारी को प्रोसेस करने के लिए इलेक्ट्रॉनों की चाल को नियंत्रित करना सबसे अहम होता है। 3D मैपिंग से नए और अधिक स्थिर क्वांटम पदार्थ डिज़ाइन किए जा सकेंगे।
सटीक और असरदार दवाइयां: दवाओं का असर इस बात पर निर्भर करता है कि दवा का मॉलिक्यूल शरीर के प्रोटीन से कैसे जुड़ता है। इस तकनीक से रासायनिक बंधों को लाइव देखकर कैंसर और गंभीर बीमारियों के लिए बेहद सटीक दवाएं तैयार की जा सकेंगी।
अगली पीढ़ी के सोलर सेल और इलेक्ट्रॉनिक्स: सौर ऊर्जा को बिजली में बदलते वक्त अणु किस तरह ऊर्जा सोखते हैं, इसे देखकर 100% कार्यक्षमता वाले सोलर पैनल और अल्ट्रा-फ़ास्ट नैनो-चिप्स बनाए जा सकेंगे।
ग्रीन केमिस्ट्री और नए ईंधन: रासायनिक प्रतिक्रियाओं को परमाणु स्तर पर नियंत्रित करके कम ऊर्जा में बेहतर उत्पाद और प्रदूषण-मुक्त सिंथेटिक ईंधन बनाना संभव होगा।
बहरहाल,गोटिंगन यूनिवर्सिटी का यह शोध क्वांटम भौतिकी के इतिहास में एक मील का पत्थर है। अदृश्य वेवफंक्शन को प्रयोगशाला की टेबल पर 3D रूप में उतारकर वैज्ञानिकों ने साबित कर दिया है कि जो कभी सिर्फ़ गणित के पन्नों पर समीकरण (Equations) हुआ करता था, अब उसे साफ़-साफ़ देखा और समझा जा सकता है। यह खोज आने वाले वर्षों में आणविक विज्ञान और नैनो टेक्नोलॉजी की दिशा हमेशा के लिए बदल देगी।