
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को 2017 में सजा हुई थी। अब राम रहीम एक बार फिर जेल से बाहर आ गया है। हरियाणा के रोहतक स्थित सुनारिया हाई सिक्योरिटी जेल से 25 अगस्त 2026 को उसे 21 दिन की फरलो मिली, जिसके बाद कड़ी सुरक्षा के बीच वह सिरसा स्थित डेरा मुख्यालय के लिए रवाना हुआ। 2017 में सजा होने के बाद से यह उसकी 17वीं अस्थायी रिहाई बताई जा रही है। दिलचस्प बात यह है कि कुछ मीडिया रिपोर्टों में इस रिहाई को 'फरलो' तो कुछ में 'पैरोल' कहा गया है। यह भ्रम खुद बताता है कि आम बोलचाल में दोनों शब्दों को अक्सर एक जैसा समझ लिया जाता है, जबकि कानूनी तौर पर दोनों में साफ फर्क है।
गुरमीत राम रहीम को 25 अगस्त 2017 को दो साध्वियों के यौन शोषण के मामले में दोषी ठहराया गया था, जिसके बाद 28 अगस्त 2017 को उसे 20 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। इसके अलावा वह पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में 2019 में और डेरा प्रबंधक रणजीत सिंह की हत्या की साजिश रचने के मामले में 2021 में भी दोषी करार दिया जा चुका है। इस मामले में राम रहीम को उम्रकैद की सजा मिली है। यानी वह एक साथ कई सजाएं काट रहा है और पैरोल-फरलो को लेकर उसका मामला बार-बार अदालतों में भी चर्चा में रहा है।
पैरोल किसी खास और जरूरी कारण के चलते दी जाने वाली अस्थायी रिहाई है। जैसे- परिवार में किसी की गंभीर बीमारी, मृत्यु, घर में शादी या खेती-बाड़ी जैसा कोई अपरिहार्य काम आदि। यह किसी कैदी का मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि सशर्त और विवेकाधीन राहत है, जो तय शर्तें पूरी करने पर सक्षम अधिकारी की मंजूरी से मिलती है। पैरोल की अवधि को कैदी की कुल सजा में नहीं जोड़ा जाता। इसका मतलब है कि पैरोल के दौरान कैदी अपनी सजा नहीं काट रहा होता है।
फरलो भी जेल से बाहर रहने की अस्थायी अनुमति है, लेकिन इसका मकसद अलग है। यह लंबी सजा काट रहे कैदी को जेल के तनाव और एकरसता से राहत देने के लिए दी जाती है। इसके लिए किसी विशेष परिस्थिति या आपातस्थिति की जरूरत नहीं होती, बल्कि अच्छे आचरण और तय नियमों के आधार पर एक निश्चित अंतराल पर यह मिलती रहती है। सबसे बड़ा फर्क यह है कि फरलो की अवधि को कैदी की सजा का ही हिस्सा माना जाता है, यानी सजा की गिनती के दौरान यह जुड़ती है। यह पैरोल की अवधि में नहीं जुड़ती है।
भारत में जेल राज्य सूची का विषय है, यानी इससे जुड़े नियम बनाने का अधिकार मुख्यतः राज्यों के पास है। ऐतिहासिक रूप से प्रिजन एक्ट 1894 की धारा 59 राज्यों को इस बारे में नियम बनाने की शक्ति देती है, लेकिन मौजूदा दौर में ज्यादातर राज्यों ने अपने अलग विशेष कानून बना लिए हैं। राम रहीम के मामले में जो कानून लागू होता है। वह हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्परेरी रिलीज) एक्ट 2022 है जो 11 अप्रैल 2022 से प्रभाव में आया। इससे पहले पंजाब में लागू पंजाब गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्परेरी रिलीज) एक्ट, 1962 जैसे कानून वर्षों से पैरोल-फरलो की समयसीमा व शर्तें तय करते आए हैं।
राम रहीम को बार-बार मिल रही पैरोल-फरलो को लेकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कमेटी ने यह कहते हुए चुनौती दी थी कि दो हत्या मामलों में दोषी होने के चलते वह 2022 के कानून के तहत हार्डकोर प्रिजनर की श्रेणी में आता है, जिन्हें यह सुविधा नहीं मिलनी चाहिए। इस पर हरियाणा सरकार ने अदालत में तर्क दिया कि राम रहीम को हत्या की साजिश रचने (धारा 120-बी के साथ) का दोषी पाया गया था, न कि सीधे हत्या करने का। इसलिए इसे सीरियल किलिंग नहीं कहा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने इस साल SGPC की याचिका खारिज कर दी, जबकि हाईकोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका था कि किसी भी आवेदन पर बिना मनमानी या पक्षपात के, कानून के तहत ही फैसला लिया जाना चाहिए। राज्य सरकार ने अदालत को यह भी बताया था कि अकेले हरियाणा में 3 या अधिक मामलों में उम्रकैद व निश्चित अवधि की सजा काट रहे करीब 89 अन्य कैदियों को भी पैरोल-फरलो का लाभ मिल चुका है, यानी यह सुविधा सिर्फ राम रहीम तक सीमित नहीं है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि 2015 में देशभर में हजारों कैदियों को पैरोल-फरलो पर रिहा किया गया था, जिनमें से कुछ तय समय पर वापस जेल नहीं लौटे और फरार हो गए। जिससे यह सवाल भी उठता रहा है कि क्या स्वीकृति प्रक्रिया में स्थानीय पुलिस व प्रशासन की रिपोर्टिंग और निगरानी को और सख्त किया जाना चाहिए। हाई-प्रोफाइल मामलों में पैरोल-फरलो के इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता और निगरानी की मांग लगातार उठती रहती है।