
भारत में नदियां केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन की धड़कन हैं। आज वे सूख रही हैं, प्रदूषित हो रही हैं और भूजल का स्तर गिर रहा है। यह बात सिर्फ यमुना नदी की नहीं, बल्कि देश के 38 प्रतिशत नदी खंड प्रदूषण की चपेट में हैं।
हालांकि, यह संकट अचानक नहीं आया - हमारी गलत नीतियां, लापरवाही और जल संसाधनों की अनदेखी ने इसे जन्म दिया है।
भारत में भूजल पर निर्भरता अत्यधिक है - करीब 62% सिंचाई, 85% ग्रामीण पेयजल और 45% शहरी जल आपूर्ति इसी पर निर्भर है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2024 के आकलन के अनुसार, देश में वार्षिक भूजल पुनर्भरण 446.90 अरब घन मीटर (BCM) है, जबकि निकासी 245.64 BCM है, यानी लगभग 60.5% भूजल उपयोग हो रहा है।
हालांकि, स्थिति में कुछ सुधार हुआ है - 2017 में सुरक्षित श्रेणी वाले क्षेत्र 62.6% थे, जो 2024 में बढ़कर 73.4% हो गए; वहीं अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्र 17.24% से घटकर 11.13% हो गए। लेकिन यह सुधार सतत नहीं है और कई जगहों पर भूजल गिरावट जारी है।
नदियों की हालत भी चिंताजनक है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, 2022–23 में 2,116 नदी खंडों में से 804 (38%) प्रदूषित पाए गए, जिनमें जैविक ऑक्सीजन मांग (BOD) मानक से अधिक था।
जल गुणवत्ता के अन्य मानदंडों में भी गिरावट है - 26% स्थानों पर घुलित ऑक्सीजन, 17% पर pH, 39% पर BOD और 23% पर फेकल कोलिफॉर्म मानक से नीचे हैं। दिल्ली में यमुना नदी की हालत और भी खराब है - लगभग 35% सीवेज, औद्योगिक और ठोस अपशिष्ट बिना उपचार के नदी में छोड़ा जाता है।
सबसे बड़ी वजह है जल संसाधनों की लापरवाही और नियोजन की कमी। बिना उपचार के सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट का नदी में प्रवाह, नदी तटों का अतिक्रमण, जलाशयों का अवैध दोहन और नदी के प्राकृतिक प्रवाह का अवरोध - इन सबने मिलकर नदियों को कमजोर किया है। भूजल पर अत्यधिक निर्भरता, बिजली सब्सिडी और सिंचाई में जल-बचत तकनीकों का अभाव भी भूजल गिरावट का कारण हैं।
खेती पर असर साफ है - भूजल गिरने से खेतों में नमी कम होती है, जिससे फसल की पैदावार घटती है। स्वास्थ्य पर भी असर गहरा है - प्रदूषित जल से जलजनित बीमारियां बढ़ रही हैं, खासकर बच्चों में। पर्यावरण को भी भारी नुकसान हुआ है - जलीय जीवन और पक्षियों की आबादी घट रही है।
समाधान के लिए कई रास्ते हैं, जिन पर ध्यान देना जरूरी है:
हमें चाहिए कि जल नीति में दीर्घकालिक सोच हो - जल संरक्षण को प्राथमिकता मिले, तकनीकी और संस्थागत सुधार हों, और जनता को जागरूक किया जाए। स्कूल, समाज और किसान - हर स्तर पर जल संरक्षण की शिक्षा और व्यवहार को बढ़ावा देना होगा।
यदि हम समय रहते जागरूक हों और ठोस कदम उठाएं, तो नदियों को बचाया जा सकता है, भूजल को स्थिर किया जा सकता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। नदियां हमारी गलतियों का नतीजा हैं, लेकिन हमारी समझदारी और प्रयास उन्हें फिर से जीवनदान दे सकते हैं।