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खेत में मखाना की खेती, कैसे बन रही है धान का लाभदायक विकल्प?

Makhana Ki Kheti Field System : जानिए कैसे खेतों में मखाना उगाने की फील्ड सिस्टम तकनीक धान का लाभदायक विकल्प बन रही है। समझें उन्नत किस्में, पैदावार, जीआई टैग और सरकारी सब्सिडी का गणित।
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Makhana Cultivation

Makhana Cultivation : तालाब से खेतों तक पहुंची मखाना की खेती, PC- Chatgpt

मखाना की खेती अब सिर्फ तालाबों तक सीमित नहीं रह गई है। नई तकनीकों, उन्नत किस्मों और सरकारी प्रोत्साहन के चलते किसान खेतों में भी मखाना उगा रहे हैं। खासकर जलभराव वाले क्षेत्रों में यह मॉडल तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, क्योंकि इससे पारंपरिक फसलों की तुलना में बेहतर आय की संभावना बनती है।

तालाब से खेत तक पहुंची मखाना खेती

पारंपरिक रूप से मखाना की खेती 4 से 6 फीट गहरे तालाबों और जलाशयों में की जाती थी। लेकिन अब फील्ड सिस्टम (Field System) के जरिए इसे सामान्य कृषि भूमि में भी उगाया जा रहा है। इस तकनीक में खेत में लगभग 1 से 2 फीट पानी बनाए रखा जाता है, जिससे खेती का प्रबंधन आसान हो जाता है।

फील्ड सिस्टम का एक बड़ा फायदा यह है कि इसमें बीज की आवश्यकता काफी कम होती है। जहां पारंपरिक तालाब प्रणाली में 80–90 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर तक लग सकता है, वहीं खेत प्रणाली में लगभग 20 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है।

उत्पादन और लाभ में बढ़त

विशेषज्ञों के अनुसार फील्ड सिस्टम में फसल अवधि कम होती है और उत्पादन अधिक मिलता है। पारंपरिक तालाब प्रणाली में औसत उपज 1.8–2.0 टन प्रति हेक्टेयर रहती है, जबकि खेत प्रणाली में यह 2.6–3.0 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है। इसके अलावा एक ही खेत में बाद में धान, गेहूं या अन्य फसलें लेने की संभावना भी बढ़ जाती है।

उन्नत किस्मों से बढ़ी संभावनाएं

मखाना उत्पादन में सुधार के लिए स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1 जैसी उन्नत किस्मों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इन किस्मों से बेहतर उत्पादकता और गुणवत्ता प्राप्त होने की जानकारी विभिन्न शोध और सरकारी दस्तावेजों में दी गई है।

इसके साथ ही पॉपिंग, ग्रेडिंग और पैकेजिंग जैसी प्रक्रियाओं में मशीनों के उपयोग से प्रसंस्करण आसान हुआ है, जिससे मूल्य संवर्धन और आय बढ़ाने के अवसर पैदा हुए हैं।

GI टैग से मिली नई पहचान

मखाना को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई पहचान तब मिली जब ‘मिथिला मखाना’ को जीआई (Geographical Indication) टैग प्रदान किया गया। इससे उत्पाद की ब्रांड वैल्यू बढ़ी और बाजार में अलग पहचान बनाने में मदद मिली।

बिहार में मखाना का रकबा भी तेजी से बढ़ा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2012-13 में जहां लगभग 13,000 हेक्टेयर क्षेत्र में मखाना की खेती होती थी, वहीं 2021-22 तक यह बढ़कर 35,224 हेक्टेयर हो गई।

सरकारी योजनाओं का सहारा

कई राज्यों में मखाना खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं चलाई जा रही हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में मखाना विकास कार्यक्रम के तहत खेत प्रणाली के लिए लगभग ₹52,800 प्रति हेक्टेयर और तालाब आधारित खेती के लिए लगभग ₹71,600 प्रति हेक्टेयर तक अनुदान का प्रावधान बताया गया है।

इसके अलावा किसानों को प्रशिक्षण, गुणवत्तायुक्त बीज और प्रसंस्करण सुविधाओं से जोड़ने पर भी जोर दिया जा रहा है।

मखाना और मछली पालन का मॉडल

विशेषज्ञ मखाना के साथ मछली पालन को भी लाभदायक मॉडल मानते हैं। जल संसाधनों का बेहतर उपयोग होने के साथ किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलता है। कुछ क्षेत्रों में यह मॉडल सफलतापूर्वक अपनाया जा रहा है।

खेती शुरू करने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

  • खेत में पानी बनाए रखने की व्यवस्था हो।
  • चिकनी या दोमट मिट्टी बेहतर मानी जाती है।
  • प्रमाणित बीज और उन्नत किस्मों का चयन करें।
  • सरकारी अनुदान और प्रशिक्षण योजनाओं की जानकारी लें।
  • कटाई के बाद प्रसंस्करण और विपणन की व्यवस्था पर भी ध्यान दें।

मखाना अब केवल तालाबों की फसल नहीं रह गया है। फील्ड सिस्टम, उन्नत किस्मों और सरकारी समर्थन ने इसे किसानों के लिए एक आकर्षक विकल्प बना दिया है। विशेष रूप से जलभराव वाले क्षेत्रों में यह खेती आय बढ़ाने और फसल विविधीकरण का प्रभावी माध्यम बन सकती है। सही तकनीक, बाजार की समझ और सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर किसान मखाना को लाभदायक व्यवसाय में बदल सकते हैं।