
Rural women employment India: भारत के गांवों में एक चुपचाप, पर गहरी आर्थिक क्रांति चल रही है और इसकी अगुवाई कर रही हैं वहां की महिलाएं। सरकारी आंकड़े साफ बताते हैं कि पिछले सात-आठ सालों में ग्रामीण महिलाओं की कामकाजी भागीदारी में जितनी तेजी आई है, उतनी शायद ही किसी और सामाजिक-आर्थिक बदलाव में देखने को मिली हो।
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2023-24 के मुताबिक, देश की कुल महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) बढ़कर 41.7 प्रतिशत हो गई है, जो 2017-18 में सिर्फ 23.3 प्रतिशत थी, यानी करीब सात साल में इसमें दोगुने के करीब की वृद्धि। और सबसे अहम बात यह है कि यह उछाल मुख्य तौर पर शहरी नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं की वजह से आया है।
श्रम मंत्रालय का कहना है कि, इसी अवधि में ग्रामीण भारत में महिलाओं का रोजगार करीब 96 प्रतिशत तक बढ़ा, जबकि शहरी इलाकों में यह वृद्धि 43 प्रतिशत तक सीमित रही।
यानी गांवों में यह बदलाव शहरों के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा तेजी से हुआ। एक अन्य आंकड़े के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर अब 47.6 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, जबकि इसी दौर में ग्रामीण पुरुषों की भागीदारी दर 80.2 प्रतिशत पर रही। यानी अंतर अब भी बड़ा है, लेकिन तेजी से घट रहा है।
गांव की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव आया है काम के तरीके में। आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं में स्वरोजगार यानी खुद का काम-धंधा करने की दर 2017-18 के 51.9 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 67.4 प्रतिशत तक पहुंच गई। यानी करीब 30 प्रतिशत की बढ़त।
इसका सीधा मतलब है कि अब गांव की ज्यादातर कामकाजी महिलाएं नौकरी की तलाश में भटकने के बजाय खुद का छोटा व्यवसाय, दुकान, पशुपालन, बुनाई-कढ़ाई या कृषि से जुड़ा काम शुरू कर रही हैं। इसके साथ ही महिला बेरोजगारी दर में भी गिरावट दर्ज की गई है। यह 2017-18 के 5.6 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 3.2 प्रतिशत पर आ गई।
इस बदलाव के पीछे सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि जमीनी कोशिशें भी हैं। बीते सात सालों में करीब 1.56 करोड़ महिलाएं औपचारिक कार्यबल से जुड़ी हैं और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए बनाए गए ई-श्रम पोर्टल पर अब तक 16 करोड़ से अधिक महिला श्रमिकों का पंजीकरण हो चुका है।
इससे उन्हें सरकार की विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुंच मिल रही है। महिला-नेतृत्व वाले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) की संख्या भी 2010-11 से 2023-24 के बीच दोगुनी हो चुकी है।
इतनी तेज प्रगति के बावजूद विशेषज्ञ इसे सिर्फ जश्न मनाने वाला आंकड़ा नहीं मानते। कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भागीदारी की यह बढ़त अक्सर आर्थिक मजबूरी और लचीलेपन को दिखाती है, न कि पूर्ण सशक्तिकरण को। असली प्रगति तभी मानी जाएगी जब यह संख्या गुणवत्तापूर्ण रोजगार, उचित वेतन और बराबरी के अवसरों में तब्दील होगी।
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार महिलाओं का अवैतनिक देखभाल कार्य (unpaid care work) अब भी देश की जीडीपी में करीब 3.1 प्रतिशत का अनदेखा योगदान देता है, जबकि पुरुषों के लिए यह आंकड़ा सिर्फ 0.4 प्रतिशत है। यानी घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ अब भी असंतुलित है।
जब गांव की आधी आबादी कमाई की प्रक्रिया में सीधे तौर पर शामिल होने लगती है, तो इसका सीधा असर घरेलू आय, बचत की आदतों और स्थानीय बाजार पर पड़ता है। पशुपालन, हस्तशिल्प, छोटे खुदरा व्यवसाय और कृषि-आधारित कामों में बढ़ती महिला भागीदारी गांव की अर्थव्यवस्था को सिर्फ खेती पर निर्भर रहने से आगे बढ़ाकर विविधतापूर्ण बना रही है।
गांव की अर्थव्यवस्था में यह बदलाव अचानक नहीं आया है। यह वर्षों की धीमी लेकिन लगातार प्रगति का नतीजा है। आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि ग्रामीण महिलाएं अब सिर्फ घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं, बल्कि खेत, बाजार और अपने खुद के छोटे उद्यमों के जरिए अर्थव्यवस्था की धुरी बनती जा रही हैं। असली सवाल अब यह नहीं कि भागीदारी बढ़ी है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या यह भागीदारी उन्हें बेहतर आय, सम्मान और आर्थिक आजादी तक पहुंचा पाएगी।