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तीसरे बच्चे पर 365 दिन की छुट्टी: महिलाओं के लिए राहत या करियर की नई चुनौती? दुनिया के मॉडल से समझिए पूरा मामला

Third Child Maternity Leave: तमिलनाडु में तीसरे बच्चे पर महिला सरकारी कर्मचारियों को 365 दिन की मैटरनिटी लीव देने के ऐलान ने मातृत्व, महिला रोजगार और जनसंख्या नीति पर नई बहस छेड़ दी है। जानिए भारत के इस फैसले की ब्रिटेन, कनाडा, स्वीडन और अमेरिका की व्यवस्था से तुलना।
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 21, 2026

third child maternity leave india

third child maternity leave india: जानिए महिलाओं के लिए आसानी या बड़ी चुनौती (AI Creative)

Third Child Maternity Leave: तमिलनाडु सरकार का 18 अगस्त 2026 का फैसला सिर्फ एक नई सरकारी सुविधा नहीं है। राज्य ने महिला सरकारी कर्मचारियों के तीसरे बच्चे के जन्म पर मिलने वाली मातृत्व छुट्टी को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 365 दिन करने का ऐलान किया है। यानी अब तीसरे बच्चे के लिए भी वही एक साल की छुट्टी मिलेगी, जो पहले दो बच्चों के लिए उपलब्ध थी। सरकार के मुताबिक यह कदम महिला सशक्तीकरण और सामाजिक कल्याण की दिशा में है। लेकिन इस फैसले के साथ एक बड़ा सवाल भी सामने आन खड़ा हुआ है, क्या मातृत्व को ज्यादा समय देना महिला के करियर को भी उतनी ही सुरक्षा देता है?

भारत में तीसरे बच्चे पर क्या बदला?

मौजूदा केंद्रीय मातृत्व लाभ कानून के तहत दो या उससे अधिक जीवित बच्चों वाली महिला के लिए मातृत्व लाभ की अधिकतम अवधि 12 सप्ताह है। 2017 के संशोधन में सामान्य पात्रता के लिए 26 सप्ताह और दो या अधिक जीवित बच्चों वाली महिला के लिए 12 सप्ताह का प्रावधान किया गया था।

तमिलनाडु का नया फैसला राज्य सरकार की महिला कर्मचारियों के लिए है। इसलिए इसे पूरे भारत में सभी कामकाजी महिलाओं के लिए लागू नई व्यवस्था समझना सही नहीं होगा। राज्य सरकार की विस्तृत अधिसूचना आने के बाद इसके लागू होने की प्रक्रिया और शर्तें और स्पष्ट होंगी।

दुनिया में मां को छुट्टी नहीं, 'Parenting Time' मिलता है

भारत की तुलना में कई देशों ने मातृत्व को केवल मां की छुट्टी के रूप में देखने के बजाय पेरेंटिल लीव का मॉडल अपनाया है।

ब्रिटेन: 52 सप्ताह की छुट्टी

ब्रिटेन में पात्र कर्मचारी को 52 सप्ताह तक मेटरनिटी लीव मिल सकती है। हालांकि स्टेचुअरी मैटरनिटी पे अधिकतम 39 सप्ताह तक मिलती है। इसके अलावा माता-पिता अपनी पात्रता के अनुसार 50 सप्ताह तक शेयर्ड पेरेंटल लीव भी साझा कर सकते हैं।

यानी वहां सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मां कितने दिन घर पर रहेगी, बल्कि यह भी है कि बच्चे की देखभाल का समय माता-पिता के बीच कैसे बांटा जाए।

कनाडा: मां के साथ पिता की भी हिस्सेदारी

कनाडा में जन्म देने वाले माता-पिता को 15 सप्ताह तक मैटरनिटी बेनेफिट मिल सकते हैं। इसके बाद स्टेंडर्ड पेरेंटल बेनेफिट माता-पिता के बीच साझा किए जा सकते हैं। कुल 40 सप्ताह तक, जबकि एक पेरेंट अधिकतम 35 सप्ताह ले सकता है। एक्सटेंड ऑप्शन में शेयर्ड पेरेंटल बेनेफिट्स 69 सप्ताह तक जा सकते हैं। यह मॉडल महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें बच्चे की जिम्मेदारी सिर्फ महिला की नौकरी से जोड़कर नहीं देखी जाती।

स्वीडन: 480 दिन की साझा पेरेंटल बेनेफिट्स

स्वीडन का मॉडल इससे भी आगे जाता है। एक बच्चे के लिए माता-पिता के पास कुल 480 दिन की पेरेंटल बेनेफिट होती है। इनमें 390 दिन आय के आधार पर और 90 दिन न्यूनतम दर पर भुगतान वाले हैं। दोनों माता-पिता इन दिनों को साझा कर सकते हैं।

स्वीडन ने 1974 में ही ऐसी सार्वभौमिक पेरेंटल इंश्योरेंस व्यवस्था शुरू की थी, जिसका एक उद्देश्य महिलाओं को रोजगार और परिवार दोनों के साथ आगे बढ़ने में मदद करना था।

अमेरिका: छुट्टी है, लेकिन तस्वीर अलग

अमेरिका में Federal FMLA पात्र कर्मचारियों को बच्चे के जन्म और देखभाल के लिए 12 सप्ताह तक जॉब प्रोटेक्टेड लीव देता है, लेकिन यह सामान्यतः अनपेड होता है। वहीं कुछ फेडरल एम्प्लॉयज के लिए पेड पेरेंटल लीव का अलग प्रावधान है। यानी दुनिया में कोई एक मॉडल नहीं है, कहीं लंबी पेड लीव है, तो कहीं शेयर्ड पेरेंटल लीव और कहीं मुख्य रूप से जॉब प्रोटेक्शन लीव का नियम है।

365 दिन की छुट्टी के बाद सबसे बड़ा सवाल

तमिलनाडु का फैसला महिलाओं के लिए निश्चित तौर पर बड़ी राहत है। प्रसव के बाद स्वास्थ्य, नवजात की देखभाल और परिवार के साथ समय के लिहाज से एक साल महत्वपूर्ण हो सकता है।

लेकिन महिला रोजगार के नजरिए से दूसरी बहस भी जरूरी है। अगर चाइवल्ड केयर की जिम्मेदारी मुख्य रूप से महिलाओं पर रहे और लंबी छुट्टी का बोझ रोजगार व्यवस्था पर पड़े, तो क्या प्राइवेट एम्प्लॉयर्स महिलाओं को नौकरी देने में ज्यादा हिचकेंगे? यही कारण है कि दुनिया के कई बेहतर मॉडल मैटरनिटी लीव के साथ पैटरनिटी/पेरेंटल लीव, सोशल-सिक्योरिटी फंडिंग और शेयर्ड चाइल्डकेयर पर भी जोर देते हैं।

असल में बहस छुट्टी की लंबाई नहीं, जिम्मेदारी की बराबरी है

तमिलनाडु का फैसला एक महत्वपूर्ण बहस खोलता है, क्या भारत को सिर्फ मैटरिनिटी लीव बढ़ानी चाहिए या पेरेंटल लीव का ऐसा मॉडल बनाना चाहिए, जिसमें मां और पिता दोनों बच्चे की जिम्मेदारी शेयर करें?

365 दिन की छुट्टी महिला को समय दे सकती है, लेकिन समान अवसर तभी मिलेगा, जब मातृत्व को महिला के करियर की कमजोरी नहीं, परिवार और समाज की साझा जिम्मेदारी माना जाए। यही वह बिंदु है, जहां तमिलनाडु का फैसला एक राज्य की सरकारी नीति से आगे निकलकर भारत में महिला रोजगार और मातृत्व नीति की बड़ी बहस बन जाता है।