
शारदीय नवरात्रि का आज दूसरा दिन है। आज का दिन शक्ति की देवी मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। देश भर के देवी मंदिरों में सुबह से ही भक्तों का तांता लगा हुआ है। आज का दिन सिर्फ पूजा-पाठ ही नहीं, बल्कि आपकी कुंडली के सबसे भारी दोषों में से एक 'मंगल दोष' को दूर करने के लिए भी साल का सबसे उत्तम दिन माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जो लोग अपनी कुंडली में मंगल की खराब स्थिति, मांगलिक दोष या विवाह में आ रही देरी से परेशान हैं, उनके लिए आज की पूजा किसी वरदान से कम नहीं है।
शास्त्रों में मंगल ग्रह को ऊर्जा, साहस और पराक्रम का कारक माना गया है, लेकिन जब यह अशुभ होता है तो व्यक्ति क्रोधी, जल्दबाज और दुर्घटनाओं का शिकार होता है। मां ब्रह्मचारिणी 'तप' की देवी हैं। उनकी साधना अनियंत्रित ऊर्जा को सही दिशा देती है।
वैदिक ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप मंगल ग्रह का स्वामी है। जिन जातकों की कुंडली में मंगल नीच का है या जो मांगलिक दोष के कारण विवाह में बाधाएं झेल रहे हैं, उन्हें आज लाल रंग के आसन पर बैठकर पूजा करनी चाहिए। माता ने भगवान शिव को पाने के लिए घोर तप किया था। इसलिए वे विवाह संबंधी अड़चनों को तत्काल दूर करती हैं। आज के दिन मंत्रोच्चार के साथ माता को लाल गुड़हल का फूल चढ़ाने से मंगल का दुष्प्रभाव खत्म हो जाता है।
गुड़हल का फूल: मां ब्रह्मचारिणी को लाल रंग का गुड़हल अति प्रिय है। आज 108 गुड़हल के फूलों की माला अर्पित करने से मंगल ग्रह शांत होता है।
शहद और चीनी का भोग: मंगल की शांति के लिए आज माता को दूध, चीनी और थोड़ा सा शहद मिलाकर भोग लगाएं। इससे स्वभाव का क्रोध शांत होता है।
हनुमान जी का स्मरण: देवी पूजा के तुरंत बाद एक बार हनुमान चालीसा का पाठ करें, क्योंकि मंगल के देवता हनुमान जी भी हैं और वे माता के सेवक भी हैं।
ज्योतिषाचार्य का कहना है कि अगर आप भी जीवन में संघर्ष, तनाव या विवाह में देरी का सामना कर रहे हैं, तो आज मां ब्रह्मचारिणी के चरणों में अपना शीश जरूर झुकाएं। माता का आशीर्वाद आपके जीवन से हर बाधा को दूर कर धैर्य और सफलता का प्रकाश लाएगा।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी का जन्म पर्वतराज हिमालय के घर हुआ था। माता ने भगवान शिव को पति रूप में पाने का संकल्प लिया था। नारद मुनि के उपदेश से प्रेरित होकर उन्होंने भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या शुरू की। कथा के अनुसार, माता ने तपस्या के शुरुआती हजार वर्षों तक केवल फल और फूल खाकर जीवन बिताया। इसके बाद उन्होंने कई वर्षों तक जमीन पर रहकर साधना की।
धूप, वर्षा और दूसरी प्राकृतिक परिस्थितियों की परवाह किए बिना माता भगवान शिव की आराधना में लीन रहीं। मान्यता है कि तपस्या के अगले चरण में माता ने केवल बिल्वपत्र खाकर समय बिताया। धीरे-धीरे उन्होंने बिल्वपत्र का सेवन भी छोड़ दिया और निर्जल रहकर तपस्या जारी रखी। पत्तों का त्याग करने के कारण उन्हें अपर्णा नाम से भी जाना जाता है। उनकी कठोर साधना और ब्रह्म में लीन रहने की अवस्था के कारण वे ब्रह्मचारिणी कहलाती हैं।