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स्मार्ट मीटर ने बदली बिजली की तस्वीर: चोरी पर लगाम, फिर भी बिल और रिचार्ज को लेकर क्यों परेशान उपभोक्ता?

Smart Meter Electricity Bill Problem : क्या स्मार्ट मीटर लगने से बिजली चोरी कम हुई और बिल विवाद खत्म हुए? जानें बिहार, गुजरात, यूपी के आंकड़े, AT&C लॉस में सुधार और उपभोक्ताओं की असली समस्याएं।
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Aug 16, 2026
Smart Meter Electricity Bill Problem
Smart Meter Electricity Bill Problem : क्या स्मार्ट मीटर लगने से बिजली चोरी कम हुई?

घर में बिजली का मीटर बदलकर स्मार्ट मीटर लगाने का मकसद सिर्फ मीटर की रीडिंग को डिजिटल करना नहीं है। सरकार का लक्ष्य स्मार्ट मीटर के जरिए बिजली चोरी रोकना, बिलिंग को ज्यादा सटीक बनाना, बिजली कंपनियों के घाटे को कम करना और उपभोक्ताओं को अपनी खपत की जानकारी देना है।

देश में करोड़ों स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं, लेकिन इनके साथ विवाद भी सामने आए हैं। कुछ राज्यों में उपभोक्ताओं ने अचानक बढ़े बिल, प्रीपेड बैलेंस तेजी से खत्म होने, रिचार्ज के बावजूद बिजली कटने और मोबाइल ऐप पर सही जानकारी नहीं दिखने की शिकायत की है।

तो सवाल है स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिजली चोरी कितनी कम हुई? क्या बिजली कंपनियों का घाटा घटा? और क्या उपभोक्ताओं के बिल विवाद भी कम हुए? इसका जवाब राज्यों के आंकड़ों से समझा जा सकता है।

पहले समझिए बिजली चोरी का आंकड़ा कैसे मापा जाता है

बिजली चोरी का पूरे देश में एक जैसा और सीधे तुलना करने वाला आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। बिजली मंत्रालय आम तौर पर AT&C यानी Aggregate Technical and Commercial Loss का आंकड़ा जारी करता है।

इसमें बिजली वितरण के दौरान होने वाले तकनीकी नुकसान के साथ बिजली चोरी, मीटरिंग की कमी, बिलिंग और वसूली से जुड़े नुकसान भी शामिल होते हैं।

इसलिए किसी राज्य का AT&C लॉस कम होने का मतलब यह जरूर है कि वहां बिजली वितरण व्यवस्था बेहतर हुई है, लेकिन पूरी कमी को सिर्फ बिजली चोरी में कमी नहीं कहा जा सकता। यह अंतर स्मार्ट मीटर के असर को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

बिहार में सबसे बड़ा बदलाव

बिहार स्मार्ट मीटर के मामले में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा है। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, बिहार का AT&C लॉस 2020-21 में 35.33 प्रतिशत था, जो 2023-24 में घटकर 20.32 प्रतिशत रह गया। यानी करीब तीन साल में इसमें लगभग 15 प्रतिशत अंक की कमी आई।

असम में भी सुधार हुआ। वहां AT&C लॉस 18.73 प्रतिशत से घटकर 14.03 प्रतिशत हो गया। ये आंकड़े बताते हैं कि स्मार्ट मीटरिंग और बिजली वितरण व्यवस्था में किए गए दूसरे सुधारों के बाद बिजली कंपनियों को नुकसान कम करने में सफलता मिली है।

लेकिन यहां यह दावा करना सही नहीं होगा कि बिहार में 15 प्रतिशत की कमी सिर्फ स्मार्ट मीटर की वजह से आई। स्मार्ट मीटर के साथ फीडर मॉनिटरिंग, ट्रांसफॉर्मर मीटरिंग, लाइन सुधार, बिलिंग और वसूली जैसे कई कदम भी उठाए गए हैं।

असम में उपभोक्ताओं को भी दिखा फायदा

सरकार ने असम का उदाहरण देते हुए बताया था कि स्मार्ट मीटर लगाने के बाद करीब 44 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने अपनी बिजली खपत पर बेहतर नजर रखने और सटीक बिलिंग के कारण औसतन करीब 50 यूनिट प्रति माह की बचत की।

स्मार्ट मीटर का एक फायदा यह है कि उपभोक्ता अपनी बिजली खपत को ज्यादा नियमित रूप से देख सकता है। इससे यह पता लगाना आसान होता है कि किस महीने या किस समय बिजली की खपत बढ़ी।

अगर किसी घर में एयर कंडीशनर, गीजर, हीटर या दूसरे ज्यादा बिजली खपत करने वाले उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ता है तो उसका असर खपत में दिखाई दे सकता है। इस तरह स्मार्ट मीटर उपभोक्ता को भी बिजली बचाने के लिए ज्यादा जानकारी देता है।

देश में कितने स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं?

केंद्र सरकार ने Revamped Distribution Sector Scheme यानी RDSS के तहत बड़े पैमाने पर स्मार्ट मीटर लगाने की योजना बनाई है। फरवरी 2026 में बिजली मंत्रालय के अनुसार, 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 45 बिजली वितरण कंपनियों के लिए 19.79 करोड़ स्मार्ट मीटर स्वीकृत किए गए थे।

31 दिसंबर 2025 तक RDSS के तहत करीब 3.90 करोड़ स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके थे। राज्य की दूसरी योजनाओं को जोड़ने पर देश में कुल स्मार्ट मीटरों की संख्या करीब 5.28 करोड़ हो गई थी।

इसका मतलब है कि देश में स्मार्ट मीटरिंग अभी संक्रमण के दौर में है। करोड़ों मीटर लग चुके हैं, लेकिन करोड़ों उपभोक्ता अभी भी पुराने मीटर पर हैं। इसलिए पूरे देश के स्तर पर स्मार्ट मीटर लगाने से पहले और बाद की शिकायतों की सीधी तुलना करना अभी मुश्किल है।

गुजरात में क्यों हुआ विरोध?

गुजरात उन राज्यों में है जहां स्मार्ट मीटर का विस्तार काफी तेजी से हुआ। लेकिन यहां उपभोक्ताओं की तरफ से विरोध भी देखने को मिला।

2024 में गुजरात के कई शहरों में उपभोक्ताओं ने शिकायत की कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद उनके खाते से पहले की तुलना में ज्यादा रकम कट रही है। कुछ मामलों में बैलेंस तेजी से खत्म होने और नकारात्मक बैलेंस दिखने की शिकायत भी हुई। यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी जरूरी है। बिल बढ़ने का मतलब हमेशा मीटर खराब होना नहीं है।

पुराने मीटर में कम रीडिंग, अनुमानित बिल या रीडिंग में देरी जैसी समस्या हो सकती है। स्मार्ट मीटर वास्तविक खपत को ज्यादा नियमित रूप से रिकॉर्ड करता है। ऐसे में अगर पहले वास्तविक खपत के मुकाबले कम बिल आ रहा था तो स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिल ज्यादा दिखाई दे सकता है। लेकिन अगर मीटर या बिलिंग प्रणाली में तकनीकी गड़बड़ी है तो उपभोक्ता के लिए इसे समझना मुश्किल हो जाता है।

उत्तर प्रदेश में बिलिंग और ऐप की समस्या

उत्तर प्रदेश में भी स्मार्ट मीटरों का तेजी से विस्तार हुआ है। लेकिन यहां उपभोक्ताओं ने बिल और ऑनलाइन डेटा से जुड़ी शिकायतें की हैं। कुछ मामलों में उपभोक्ताओं ने शिकायत की कि स्मार्ट मीटर का डेटा ऑनलाइन समय पर अपडेट नहीं हो रहा था या बिल से जुड़ी जानकारी उपलब्ध नहीं थी।

2025 में लखनऊ में ऐसे मामले सामने आए जहां उपभोक्ताओं ने स्मार्ट मीटर की बिलिंग व्यवस्था में दिक्कत की शिकायत की। यह समस्या सिर्फ मीटर की नहीं है। स्मार्ट मीटर एक पूरे डिजिटल सिस्टम का हिस्सा है।

मीटर → नेटवर्क → सर्वर → बिलिंग सिस्टम → मोबाइल ऐप

इनमें से किसी एक स्तर पर गड़बड़ी होने पर उपभोक्ता को गलत या अधूरी जानकारी मिल सकती है। यही वजह है कि स्मार्ट मीटर लगाना पहला कदम है, पूरी व्यवस्था को डिजिटल और भरोसेमंद बनाना दूसरा।

बिहार में भी बिल विवाद खत्म नहीं हुए

बिहार में स्मार्ट मीटर के कारण AT&C लॉस में बड़ी कमी जरूर आई, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उपभोक्ता शिकायतें खत्म हो गईं। 2026 में पूर्वी चंपारण के एक मामले में उपभोक्ता आयोग ने करीब 73 हजार रुपये के बिजली बिल को रद्द किया और बिजली कंपनी को उपभोक्ता को मुआवजा देने का आदेश दिया। यह मामला बताता है कि स्मार्ट मीटर होने के बावजूद बिल विवाद हो सकते हैं। पहले उपभोक्ता का सवाल होता था- 'मीटर की रीडिंग सही ली गई या नहीं?'

अब सवाल बदल गया है

  • “मीटर का डेटा सर्वर तक सही पहुंचा या नहीं?”
  • “पुराना बकाया नए सिस्टम में कैसे जुड़ा?”
  • “रिचार्ज की रकम सही तरीके से दिखाई गई या नहीं?”
  • यानी तकनीक ने समस्या खत्म करने के साथ-साथ विवाद का स्वरूप भी बदल दिया है।
  • स्मार्ट मीटर बिजली चोरी कैसे पकड़ सकता है?
  • स्मार्ट मीटर का सबसे बड़ा फायदा डेटा है।

मान लीजिए किसी ट्रांसफॉर्मर से 1000 यूनिट बिजली गई। अगर उससे जुड़े सभी उपभोक्ताओं के मीटरों में कुल 700 यूनिट ही दर्ज हुईं तो बाकी 300 यूनिट के अंतर की जांच की जा सकती है।

यह अंतर तकनीकी नुकसान भी हो सकता है और चोरी भी। स्मार्ट मीटर इस तरह संदिग्ध खपत पैटर्न और असामान्य अंतर की पहचान आसान बनाता है। लेकिन स्मार्ट मीटर खुद चोरी पकड़कर उसे साबित नहीं करता। इसके बाद बिजली कंपनी को जांच करनी होती है।

क्या बिल विवाद कम हुए?

यहां सबसे सावधान रहने की जरूरत है। अभी पूरे देश के लिए ऐसा एक समान सार्वजनिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि स्मार्ट मीटर लगाने के बाद बिल शिकायतें इतने प्रतिशत कम हो गईं।

अलग-अलग राज्यों और बिजली कंपनियों के पास शिकायतों के आंकड़े हैं, लेकिन उनकी श्रेणियां और रिपोर्टिंग का तरीका अलग है।

इसके उलट कुछ राज्यों में स्मार्ट मीटर के बाद नई तरह की शिकायतें सामने आई हैं प्रीपेड बैलेंस, रिचार्ज, ऐप में डेटा अपडेट, अचानक बिजली कटना और ज्यादा बिल जैसी।

इसलिए अभी यह कहना ज्यादा सही होगा कि स्मार्ट मीटर बिलिंग को ज्यादा डेटा आधारित बना रहा है, लेकिन बिल विवाद खत्म नहीं कर रहा।

राज्यों की तस्वीर

राज्यAT&C लॉस / स्थितिप्रमुख मुद्दा
बिहार35.33% → 20.32%बिल और रिचार्ज विवाद
असम18.73% → 14.03%ऐप और डेटा शिकायतें
गुजरातबड़े पैमाने पर स्मार्ट मीटरज्यादा राशि कटने की शिकायत
उत्तर प्रदेशतेजी से विस्तारबिल और ऑनलाइन डेटा की समस्या
हरियाणास्मार्ट मीटर विस्तारडेटा और रीडिंग विवाद
महाराष्ट्रविस्तार जारीमीटर और औसत बिलिंग शिकायतें

असली फायदा किसे?

स्मार्ट मीटर से बिजली कंपनियों को सबसे बड़ा फायदा बिजली की खपत और वितरण का ज्यादा सटीक डेटा मिलने के रूप में दिखाई देता है। जहां पहले मीटर रीडिंग के लिए कर्मचारी को घर जाना पड़ता था, वहां स्मार्ट मीटर से रीडिंग और खपत का डेटा डिजिटल तरीके से उपलब्ध हो सकता है।

इससे बिजली चोरी की पहचान, बिलिंग, वसूली और नेटवर्क की निगरानी बेहतर हो सकती है। उपभोक्ता के लिए फायदा तभी बड़ा होगा जब उसे भी वही डेटा आसानी से उपलब्ध हो और अगर बिल गलत हो तो शिकायत का तेजी से समाधान हो।

Updated on:
16 Aug 2026 01:45 pm
Published on:
16 Aug 2026 01:45 pm