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राजस्थान में ‘सोना मोती’ गेहूं की बयार: कम पानी और शून्य रसायन से बंपर कमाई का फॉर्मूला

राजस्थान में सोना मोती गेहूं की जैविक खेती करके तीन गुना से अधिक मुनाफा हासिल कर सकते हैं। जानिए हड़प्पा कालीन इस शुगर-फ्री सुपरफूड के फायदे, बुवाई की तकनीक और कितना चल रहा है बाजार भाव।
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Aug 26, 2026
WHEAT
'सोना मोती' गेहूं (AI)

राजस्थान के कृषि परिदृश्य में पारंपरिक और विलुप्तप्राय देसी फसलों (Endangered native crops) की वापसी एक नए आर्थिक व पोषण क्रांति का सूत्रपात कर रही है। हाइब्रिड बीजों और अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के दौर में 'सोना मोती' (Sona Moti) गेहूं ने किसानों और स्वास्थ्य-सचेत उपभोक्ताओं दोनों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। मोती जैसे गोल, सुनहरे दानों वाली यह प्राचीन किस्म न केवल बेहतरीन पोषण मूल्य प्रदान करती है, बल्कि कम लागत और ऊंचे बाजार भाव के कारण किसानों की आमदनी को दोगुना करने का ठोस जरिया बन रही है।

हड़प्पाकालीन विरासत और अद्वितीय पोषण

सोना मोती गेहूं को भारत की प्राचीन कृषि संस्कृति का हिस्सा माना जाता है, जिसके ऐतिहासिक तार सिंधु-घाटी व हड़प्पा सभ्यता से जुड़े हैं। आधुनिक गेहूं की तुलना में इसके दाने चपटे और लंबे न होकर गोल, चमकदार और मोती के समान ठोस होते हैं।

कम ग्लूटन इंडेक्स: इसमें ग्लूटन की मात्रा सामान्य गेहूं से काफी कम होती है, जिससे यह पाचन में बेहद हल्का और सीलिएक सेंसिटिविटी वाले लोगों के लिए अनुकूल माना जाता है।

मधुमेह एवं हृदय रोगियों के लिए उपयुक्त: इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) कम होता है। यह रक्त में शर्करा के स्तर को तेजी से नहीं बढ़ाता।

सूक्ष्म पोषक तत्वों का भंडार: यह फोलिक एसिड, जिंक, आयरन, मैग्नीशियम और प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर है, जो महिलाओं और बच्चों में पोषण की कमी दूर करने में सहायक है।

उच्च फाइबर और प्रोटीन: इसमें पाचक रेशा (डाइटरी फाइबर) और प्राकृतिक प्रोटीन प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है।

खेत की तैयारी एवं वैज्ञानिक बुवाई तकनीक

सोना मोती गेहूं मुख्य रूप से प्राकृतिक और जैविक खाद पर सबसे बेहतर परिणाम देता है। रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से इसकी मूल गुणवत्ता और स्वाद प्रभावित हो सकता है। राजस्थान की दोमट, बलुई दोमट और कछारी मिट्टी इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।

खेत की तैयारी के प्रमुख चरण:

  • मिट्टी शोधन: खेत की पहली जुताई के समय प्रति एकड़ 100 किलोग्राम चूना पाउडर और 50 किलोग्राम नीम की खली/पाउडर डालकर मिट्टी में मिला दें। इसके बाद खेत को 8 से 10 दिनों के लिए धूप लगने हेतु खुला छोड़ दें। इससे मिट्टी के हानिकारक कीट और फंगस समाप्त होते हैं।
  • जैविक पोषण: इसके बाद प्रति एकड़ 2 टन फास्फो-कम्पोस्ट या वर्मीकम्पोस्ट के साथ 4 से 5 ट्रॉली अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद समान रूप से फैलाकर गहरी जुताई करें।
  • बीज शोधन: बुवाई से पूर्व बीजों को बीजामृत या ट्राइकोडर्मा (5 ग्राम प्रति किलो बीज) से उपचारित करें ताकि अंकुरण के समय बीज जनित रोगों से सुरक्षा मिल सके। साधारण गेहूं बनाम सोना मोती: आर्थिक तुलनापारंपरिक गेहूं की तुलना में सोना मोती का प्रति एकड़ कुल वजन (क्विंटल में) थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन इसकी बाजार मांग और मिलने वाला प्रीमियम भाव इसे अधिक लाभदायक बनाता है।
मापदंडसामान्य हाइब्रिड गेहूंसोना मोती गेहूं
खेती का तरीकारासायनिक (DAP, यूरिया निर्भर)मुख्य रूप से पूर्ण जैविक / प्राकृतिक
लागत प्रति एकड़₹12,000 – ₹15,000₹6,000 – ₹8,000 (देसी खाद आधारित)
औसत उपज18 – 22 क्विंटल/एकड़12 – 15 क्विंटल/एकड़
मंडी / बाजार भाव₹2,275 – ₹2,600 प्रति क्विंटल₹7,000 – ₹10,000 प्रति क्विंटल
आटा खुदरा मूल्य₹30 – ₹40 प्रति किलो₹90 – ₹120 प्रति किलो

राजस्थान के भरतपुर जिले में किसानों द्वारा जैविक विधि से की गई खेती में इसके भाव ₹8,000 प्रति क्विंटल तक प्राप्त हुए हैं। वहीं महिला स्वयं सहायता समूहों और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) द्वारा इसका पारंपरिक चक्की से पिसा हुआ आटा ₹100 प्रति किलो के प्रीमियम भाव पर सीधे शहरी उपभोक्ताओं को बेचा जा रहा है।

चुनौतियां एवं किसानों के लिए आगे का रास्ता

सोना मोती गेहूं की खेती में अपार संभावनाएं हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर सफलता के लिए कुछ सावधानियां आवश्यक हैं।

  • प्रमाणित बीज का चयन: वर्तमान में खुले बाजार में अशुद्ध बीजों की भरमार है। किसानों को कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), राज्य बीज निगम या प्रमाणित जैविक किसानों से ही शुद्ध बीज प्राप्त करने चाहिए।
  • सीधा विपणन (Direct Marketing): सामान्य कृषि मंडियों में इस गेहूं को कई बार साधारण भाव पर आंका जा सकता है। इसलिए किसानों को सोशल मीडिया, एग्री-स्टार्टअप्स, जैविक मेलों और ई-नाम (e-NAM) पोर्टल के माध्यम से सीधे स्वास्थ्य-जागरूक उपभोक्ताओं और सुपरस्टोर्स तक पहुंच बनानी चाहिए।
  • जैविक प्रमाणीकरण: यदि फसल का जैविक प्रमाणीकरण (Organic Certification / PGS-India) करवा लिया जाए, तो महानगरों और निर्यात बाजार में इसका मूल्य और भी अधिक मिल सकता है।

कम पानी और शून्य रासायनिक निर्भरता के साथ राजस्थान के किसान सोना मोती गेहूं को अपनाकर बंजर और सीमित संसाधनों वाली भूमि से भी उच्च गुणवत्ता वाली नकदी फसल हासिल कर सकते हैं। सही योजना, मिट्टी के जैविक सुधार और लक्षित मार्केटिंग के साथ यह फसल पारंपरिक खेती को लाभप्रद व्यवसाय में बदलने की पूरी क्षमता रखती है।

Updated on:
26 Aug 2026 05:41 pm
Published on:
26 Aug 2026 05:41 pm