
भारत में सुपर अल नीनो के असर से इस साल मानसून में सामान्य से करीब 13 प्रतिशत कम बारिश हुई है। आगामी समय में इसके और अधिक परिणाम होंगे। मौसम वैज्ञानिकों ने भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो के मजबूत होने की आशंका से चिंता बढ़ा दी है। इसके प्रभाव से सर्दियों में तापमान सामान्य से अधिक रहने, पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फबारी कम होने और अगले साल गर्मी के दौरान लू का प्रकोप बढ़ने की आशंका है। इसका असर खेती, पेयजल आपूर्ति और खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
इस साल मानसून में सामान्य से करीब 13 प्रतिशत कम बारिश के बाद भारत में सर्दियों के मौसम में तापमान बढ़ने का खतरा है। इसके साथ ही 2027 में भीषण गर्मी का खतरा मंडरा रहा है। भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो के मजबूत होने की आशंका ने मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। इसके प्रभाव से सर्दियों में तापमान सामान्य से अधिक रहने, पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फबारी कम होने और अगले साल गर्मी के दौरान लू का प्रकोप बढ़ने की आशंका है। इसका असर खेती, पेयजल आपूर्ति और खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अक्टूबर के पूर्वानुमान के अनुसार, प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक हो सकता है। यदि यह स्थिति असाधारण रूप से मजबूत होती है, तो इसे सुपर अल नीनो कहा जा सकता है। हालांकि, यह कोई आधिकारिक मौसम श्रेणी नहीं है और इसकी तीव्रता को लेकर अंतिम निष्कर्ष अभी नहीं निकाला जा सकता। अल नीनो प्रशांत महासागर के सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ी जलवायु घटना है। इससे वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है और दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में बारिश तथा तापमान का स्वरूप बदल सकता है। भारत में इसका असर मानसून और सर्दियों के मौसम पर भी पड़ सकता है।
कम बारिश के कारण जलाशयों, भूजल और मिट्टी में नमी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। महाराष्ट्र में जल भंडारों की स्थिति को देखते हुए स्थानीय निकायों के लिए पानी की कटौती संबंधी कदम उठाए जाने की खबरें भी सामने आई हैं। अन्य राज्य की सरकारें भी संभावित जल संकट पर नजर बनाए हुए हैं। यदि सर्दियों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई और तापमान अधिक रहा, तो आगामी महीनों में पेयजल आपूर्ति और सिंचाई की चुनौती बढ़ सकती है।
सर्दियों में तापमान सामान्य से अधिक रहने पर गेहूं सहित रबी की फसलों की बढ़वार और पैदावार प्रभावित हो सकती है। अधिक तापमान से फसलों को सिंचाई की जरूरत बढ़ सकती है, जबकि जल उपलब्धता सीमित रहने पर किसानों की मुश्किलें बढ़ेंगी। पहाड़ी क्षेत्रों में कम बर्फबारी होने से बर्फ पिघलने पर निर्भर नदियों और जल स्रोतों पर भी असर पड़ सकता है।
अल नीनो का प्रभाव 2027 की गर्मियों तक बना रहा, तो तापमान और लू का खतरा बढ़ सकता है। इससे बिजली की मांग, स्वास्थ्य और खाद्य आपूर्ति पर दबाव पड़ने की आशंका है। अगले मानसून में भी कम बारिश की संभावना पर नजर रखी जा रही है, लेकिन केवल अल नीनो के आधार पर बारिश में कमी की निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। हिंद महासागर की परिस्थितियां और अन्य मौसमी प्रणालियां भी मानसून को प्रभावित करती हैं। ऐसे में जल संरक्षण, सिंचाई प्रबंधन और गर्मी से बचाव की तैयारी समय रहते करना जरूरी होगा।