
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी से जुड़े आपराधिक मानहानि मामले में अंतरिम राहत दी है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार और शिकायतकर्ता भाजपा सदस्य महेश श्रीश्रीमल को नोटिस जारी किया है। इस मामले की अगली सुनवाई 4 हफ्ते बाद के लिए तय की है। कोर्ट ने साफ कहा कि इस दौरान निचली अदालत में आगे की कार्यवाही रुकी रहेगी।
यह आदेश बॉम्बे हाईकोर्ट के 8 सितंबर 2026 के फैसले के खिलाफ राहुल गांधी की याचिका पर आया है। राहुल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए। अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट में दलील दी कि शिकायत सुनवाई योग्य ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल यह तय नहीं किया है कि राहुल की टिप्पणी मानहानि के दायरे में आती है या नहीं। यह केवल अंतरिम राहत है, मामले के गुण-दोष पर फैसला आगे होगा।
शिकायत के मुताबिक, राहुल गांधी ने 20 सितंबर 2018 को राजस्थान में एक सार्वजनिक सभा में प्रधानमंत्री के खिलाफ टिप्पणी की थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि राहुल ने 24 सितंबर 2018 को अपने निजी 'X' अकाउंट पर रैली का वीडियो भी डाला और राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर प्रधानमंत्री को "कमांडर-इन-थीफ" कहा।
राहुल गांधी पर पीएम मोदी के लिए 'चोरों के सरदार' जैसे शब्द इस्तेमाल करने का भी आरोप है। बता दें कि राहुल गांधी ने मुंबई के गिरगांव मजिस्ट्रेट को 28 अगस्त 2019 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनके खिलाफ प्रक्रिया शुरू की गई। उन्हें जुलाई 2021 में समन मिला, जिसके बाद वे हाईकोर्ट पहुंचे।
बॉम्बे हाईकोर्ट की एकल पीठ के जस्टिस NR बोरकर ने 8 सितंबर को राहुल की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है। हाईकोर्ट के अनुसार, टिप्पणी का असल आशय क्या था और पार्टी सदस्यों पर उसका क्या असर पड़ा, यह ट्रायल के दौरान ही देखा जाएगा। महाराष्ट्र के महाधिवक्ता मिलिंद साठे ने अदालत में कहा था कि सामग्री से प्रथम दृष्टया अपराध बनता दिखता है। हाईकोर्ट ने 2021 के उस निर्देश 6 हफ्ते के लिए बढ़ा दिया था, जिसमें मजिस्ट्रेट को सुनवाई टालने को कहा गया था, ताकि राहुल सुप्रीम कोर्ट जा सकें। इसी मोहलत के भीतर राहुल गांधी ने शीर्ष अदालत का रुख किया।
राहुल गांधी का कहना है कि उनकी टिप्पणी में किसी राजनीतिक दल का नाम नहीं था और किसी स्पष्ट रूप से पहचाने जा सकने वाले व्यक्ति या समूह को निशाना नहीं बनाया गया। इसलिए मानहानि का मुकदमा नहीं बनता। हाईकोर्ट ने उनकी इस दलील को खारिज कर दिया था कि भाजपा कोई पहचान योग्य संस्था नहीं है।
दूसरी ओर, श्रीश्रीमल का तर्क है कि वे करीब दो दशक से भाजपा के सक्रिय सदस्य हैं। प्रधानमंत्री के खिलाफ की गई टिप्पणी ने पार्टी सदस्यों को भी चोर के रूप में पेश किया। उनके वकील का यह भी कहना था कि मामले में ट्रायल 2021 से ठप पड़ा है।
इस मामले का केंद्रीय सवाल यही है कि क्या किसी पार्टी का आम सदस्य अपने नेता पर की गई टिप्पणी के लिए मानहानि की शिकायत दर्ज कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट इसी तरह के एक मामले में पहले भी राहुल गांधी को राहत दे चुका है। जनवरी 2025 में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने गृह मंत्री अमित शाह पर टिप्पणी के मामले में झारखंड की निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगाई थी।
उस मामले में भी सिंघवी ने दलील दी थी कि शिकायत तीसरे पक्ष ने की है, जो मानहानि के अपराध में स्वीकार्य नहीं है। मौजूदा मामले में भी बेंच की अगुवाई जस्टिस विक्रम नाथ कर रहे हैं। राहुल गांधी इसके पहले 2019 की 'मोदी सरनेम' टिप्पणी के मामले में भी कानूनी लड़ाई लड़ चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2023 में उस मामले में उनकी दोषसिद्धि पर रोक लगाई थी।
राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से राहत ऐसे समय में मिली है, जब वह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी प्रदर्शनों में सक्रिय हैं। 6 अक्टूबर को इंडिया ब्लॉक के मार्च के दौरान राहुल और प्रियंका गांधी को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। बाद में पुलिस की ओर से दर्ज FIR में दोनों नेताओं के नाम सामने आए।
हालांकि, मानहानि मामले का इन प्रदर्शनों से कोई सीधा संबंध नहीं है। अब महाराष्ट्र सरकार और श्रीश्रीमल को 4 हफ्ते में अपना जवाब दाखिल करना होगा। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि हाईकोर्ट का आदेश कायम रहेगा या नहीं। तब तक गिरगांव मजिस्ट्रेट अदालत में ट्रायल आगे नहीं बढ़ेगा।