
देश के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में शुमार टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी 'टाटा संस' को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से बड़ा झटका लगा है। 11 सितंबर 2026 को भेजे गए एक पत्र में RBI ने टाटा संस के उस आवेदन को खारिज कर दिया है, जिसमें कंपनी ने खुद को कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के तौर पर अनरजिस्टर्ड बनाए रखने की मांग की थी। इस फैसले के साथ ही टाटा संस के लिए शेयर बाजार में लिस्ट होना अब लगभग तय माना जा रहा है। अगर ऐसा होता है तो यह देश के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा IPO हो सकता है।
RBI ने सितंबर 2022 में टाटा संस को अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC-UL) की श्रेणी में रखा था। इस वर्गीकरण के तहत तीन साल के भीतर यानी 30 सितंबर 2025 तक शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य था। इस डेडलाइन से बचने के लिए टाटा संस ने मार्च 2024 में RBI के पास अपना CIC रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने और खुद को अनरजिस्टर्ड CIC बनाए रखने की अर्जी दी थी। इसके लिए कंपनी ने वित्त वर्ष 2024 में करीब 21,813 करोड़ रुपये का कर्ज भी चुका दिया, ताकि डी-क्लासिफिकेशन की शर्तें पूरी हो सकें। अब RBI ने साफ कर दिया है कि कंपनी जरूरी मानदंडों पर खरी नहीं उतरती। इसलिए कंपनी की अर्जी स्वीकार नहीं की जा सकती।
टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर कंपनी के भीतर ही गहरे मतभेद हैं। रतन टाटा के सौतेले भाई नोएल टाटा के नेतृत्व वाला टाटा ट्रस्ट्स, जिसके पास कंपनी की करीब 65.9 प्रतिशत हिस्सेदारी है। कंपनी को निजी और अनलिस्टेड बनाए रखने के पक्ष में है। रिपोर्टों के मुताबिक नोएल टाटा ने चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन से यह आश्वासन मांगा था कि टाटा संस को जबरन लिस्ट होने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा, जिस पर चंद्रशेखरन ने कहा था कि किसी नियामकीय या कानूनी मामले के नतीजे की गारंटी नहीं दी जा सकती। नोएल टाटा ने टाटा डिजिटल और एयर इंडिया जैसे कारोबारों में हो रहे घाटे को लेकर भी चिंता जताई है।
दूसरी ओर करीब 18.4 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला शापूरजी पलोनजी (मिस्त्री परिवार) समूह लंबे समय से लिस्टिंग की मांग कर रहा है। अप्रैल 2026 में SP ग्रुप के चेयरमैन शापूरजी पलोनजी मिस्त्री ने इसे सिर्फ नियामकीय अनुपालन नहीं बल्कि जनहित का मुद्दा बताते हुए लिस्टिंग का खुला समर्थन किया था। दोनों परिवारों के बीच यह तनाव 2016 में साइरस मिस्त्री की टाटा संस चेयरमैन पद से विदाई के बाद से चले आ रहे विवाद की अगली कड़ी माना जा रहा है। बाकी करीब 13 प्रतिशत हिस्सेदारी टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा केमिकल्स और टाटा पावर जैसी टाटा ग्रुप कंपनियों के पास है।
RBI ने सबसे पहले सितंबर 2022 में 16 NBFC को अपर-लेयर श्रेणी में रखा था, जिसे बाद में संशोधित कर 15 कर दिया गया। सूची में शामिल कंपनियों के लिए तीन साल के भीतर लिस्टिंग अनिवार्य है। टाटा कैपिटल सहित बाकी सभी कंपनियां या तो लिस्ट हो चुकी हैं या प्रक्रिया में हैं।
सिर्फ टाटा संस का मामला लंबित था। इस साल RBI ने नियमों का दायरा और बढ़ाते हुए सरकारी एनबीएफसी को भी इसमें शामिल कर लिया। यह भी तय किया कि 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक एसेट वाली कोई भी NBFC खुद-ब-खुद अपर-लेयर श्रेणी में आ जाएगी।
टाटा संस की मौजूदा वैल्यूएशन पर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है, लेकिन पिछले ब्रोकरेज विश्लेषणों में अनुमान लगाया गया था कि लिस्टिंग पर कंपनी की वैल्यूएशन 7-8 लाख करोड़ रुपये से लेकर 11 लाख करोड़ रुपये तक हो सकती है। अगर कंपनी करीब 5 प्रतिशत हिस्सेदारी सार्वजनिक करती है, तो IPO का आकार करीब 55,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है, जो इसे देश का अब तक का सबसे बड़ा सार्वजनिक निर्गम बना सकता है। हालांकि, ये आंकड़े अनुमान भर हैं और अंतिम वैल्यूएशन कई कारकों पर निर्भर करेगी।
गौरतलब है कि RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा इस मुद्दे पर सीधा जवाब देने से बचते रहे हैं। संजय मल्होत्रा ने पहले कहा था कि किसी भी रजिस्टर्ड इकाई का रजिस्ट्रेशन तब तक वैध रहता है जब तक उसे रद्द न किया जाए। इसके साथ ही संकेत दिया था कि टाइप-1 NBFC से जुड़ी नीतियों की समीक्षा जारी है, क्योंकि नियम समय के साथ बदलते रहने चाहिए।
सवाल यह है कि टाटा संस RBI के इस फैसले को स्वीकार करती है या इसे चुनौती देने का कोई रास्ता तलाशती है। अगर कंपनी लिस्टिंग की दिशा में बढ़ती है, तो उसे सेबी के पास ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल करना होगा। वैसे ही जैसे टाटा ग्रुप की ही टाटा कैपिटल इसी नियम के तहत पहले लिस्ट हो चुकी है। टाटा संस की लिस्टिंग का असर TCS, टाटा मोटर्स और टाटा स्टील जैसी दिग्गज कंपनियों में उसकी हिस्सेदारी के जरिए बाजार पर सीधे तौर पर पड़ सकता है, और निवेशकों की नजर अब कंपनी के अगले कदम पर टिकी है।