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अब कोबरा के काटने से नहीं होगी मृत्यु; भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजा सर्पदंश का ‘नेक्स्ट-जनरेशन’ इलाज

भारत में हर साल सर्पदंश से 50,000 से अधिक लोग जान गंवाते हैं। अब भारतीय वैज्ञानिकों ने इस चुनौती से निपटने के लिए बड़ी कामयाबी हासिल की है। वैज्ञानिकों ने लैब में प्रायोगिक ‘नेक्स्ट-जनरेशन’ एंटीवेनम तैयार किया है।
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भारत

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Vinay Shakya

Sep 13, 2026

snakebite cases in india

सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)

भारत में हर साल सर्पदंश से लगभग 50,000 लोगों की मौत हो जाती है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के पारिस्थितिकी विज्ञान केंद्र (CES) और डेनमार्क की टेक्निकल यूनिवर्सिटी (DTU) के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक बड़ी कामयाबी हासिल की है।

शोध पत्रिका साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक टीम ने एक प्रायोगिक 'नेक्स्ट-जनरेशन' रिकॉम्बिनेंट एंटीवेनम तैयार किया है, जिसने चूहों को स्पेक्टेकल्ड कोबरा, मोनोकल्ड कोबरा और भारत की दोनों किंग कोबरा प्रजातियों के जहर से बचाया। यह शोध IISc के सहायक प्रोफेसर कार्तिक सुनगर और DTU के प्रोफेसर आंद्रेयास लॉस्टसेन के नेतृत्व में हुआ, और इसके मुख्य लेखक अर्पण सामंत हैं। हालांकि, इंसानों पर इसके क्लीनिकल ट्रायल अभी बाकी हैं, इसलिए यह अभी बाजार में उपलब्ध इलाज नहीं है।

पुरानी और महंगी है मौजूदा प्रक्रिया

प्रचलित एंटीवेनम बनाने की विधि करीब 100 साल से लगभग अपरिवर्तित है। इसमें सांप का जहर घोड़े या भेड़ जैसे जानवरों के शरीर में डाला जाता है, और फिर उनके खून से बनने वाली एंटीबॉडी निकालकर एंटीवेनम तैयार किया जाता है। यह प्रक्रिया न सिर्फ महंगी और समय लेने वाली है, बल्कि इसमें बैच-दर-बैच गुणवत्ता में अंतर, कम सक्रिय एंटीबॉडी उपज और एलर्जी जैसे दुष्प्रभावों की समस्याएं भी सामने आती हैं। इसके अलावा हर सांप प्रजाति के जहर में तंत्रिका, रक्त या ऊतकों पर अलग-अलग तरह से हमला करने वाले विषों का अलग मिश्रण होता है, जिससे एक ही इलाज सभी प्रजातियों पर असरदार बनाना मुश्किल होता है।

नैनोबॉडी क्या है?

नई तकनीक में वैज्ञानिकों ने 'नैनोबॉडी' नाम के एंटीबॉडी के बेहद छोटे टुकड़ों का इस्तेमाल किया। यहां एक अहम वैज्ञानिक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है: नैनोबॉडी सामान्य एंटीबॉडी के 'लाइट-चेन' हिस्से से नहीं, बल्कि ऊंट-वर्गीय जानवरों (जैसे लामा और अल्पाका) में स्वाभाविक रूप से पाई जाने वाली 'हैवी-चेन-ओनली' एंटीबॉडी के वैरिएबल डोमेन (जिसे VHH कहा जाता है) से बनते हैं। इनमें लाइट चेन होती ही नहीं।

यही खासियत इन्हें बेहद छोटा (करीब 12-15 किलोडाल्टन), स्थिर और बैक्टीरिया जैसी प्रणालियों में सस्ते में बड़ी मात्रा में तैयार करने लायक बनाती है। शोधकर्ताओं ने पहले लामा जैसे ऊंट-वर्गीय जानवरों को अफ्रीकी सांपों के जहर से प्रतिरक्षित (इम्यूनाइज़) कर उनसे एंटीबॉडी निकाली थी, फिर बैक्टीरियोफेज तकनीक की मदद से उन टुकड़ों की छंटाई कर पांच ऐसे नैनोबॉडी चुने, जो भारतीय कोबरा प्रजातियों के जहर में मौजूद खतरनाक विषों को पहचानकर उनसे मजबूती से जुड़ जाते हैं और विष को उसके तंत्रिका-लक्षित रिसेप्टर से जुड़ने से रोक देते हैं।

चूहों पर परीक्षण के नतीजे

पांच-नैनोबॉडी कॉकटेल को चूहों में परखा गया, जिन्हें पहले सांप का जहर दिया गया था। नतीजों में यह कॉकटेल स्पेक्टेकल्ड कोबरा, मोनोकल्ड कोबरा और भारत की दोनों किंग कोबरा प्रजातियों, यानी कुल 4 प्रजातियों के जहर से चूहों को बचाने में कामयाब रहा। खास बात यह रही कि जहर देने के 30 मिनट बाद इलाज देने पर भी चूहे बच गए, जो असल जिंदगी की देरी से इलाज मिलने वाली परिस्थितियों में इसकी उपयोगिता का संकेत देता है।

पहले भी हो चुका है ऐसा प्रयास

DTU की इसी टीम ने अक्टूबर 2025 में नेचर पत्रिका में एक अलग अध्ययन प्रकाशित किया था, जिसमें 8 नैनोबॉडी के मिश्रण से अफ्रीकी कोबरा, मांबा और रिंकल्स सांपों के खिलाफ व्यापक असर वाला एंटीवेनम बनाया गया था। ताजा अध्ययन उसी तकनीक को आगे बढ़ाते हुए खासतौर पर भारत में पाई जाने वाली सांप प्रजातियों पर केंद्रित है, जो इसे भारत के सर्पदंश संकट के लिहाज से खास बनाता है।

क्या कहते हैं वैज्ञानिक?

वैज्ञानिकों के मुताबिक, नई खोज अभी शुरुआती चरण का प्रायोगिक शोध है। इंसानों पर सुरक्षा व असर को परखने के लिए क्लीनिकल ट्रायल की लंबी प्रक्रिया बाकी है। लेकिन अगर यह तकनीक सफल रहती है, तो यह घोड़ों या भेड़ों पर निर्भर सदियों पुरानी उत्पादन प्रक्रिया को बदलकर सस्ता, अधिक शुद्ध और एकसमान गुणवत्ता वाला एंटीवेनम तैयार करने का रास्ता खोल सकती है। यह भारत जैसे देश के लिए बड़ी राहत साबित हो सकता है, जहां सर्पदंश से मौतों का बोझ दुनिया में सबसे ज्यादा है।