
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों ‘चवन्नी से रुपया’ वाला बयान सपा, रालोद और बसपा के बीच नई जुबानी जंग की वजह बन गया है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 17 अगस्त को एक कार्यक्रम में बिना नाम लिए अपने पुराने सहयोगी और राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष जयंत चौधरी पर तंज कसते हुए कहा था कि 'हमने चवन्नी का रुपया बना दिया था, तब भी हमें छोड़कर चले गए।' इस बयान को 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले रालोद के सपा से अलग होकर भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में जाने से जोड़कर देखा गया। अब मायावती के हमले और शिवपाल यादव के बचाव के बाद विवाद और बड़ा हो गया है।
दरअसल, ‘चवन्नी’ शब्द का राजनीतिक इस्तेमाल नया नहीं है। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले जयंत चौधरी ने भाजपा के साथ जाने की अटकलों के बीच कहा था कि वह ऐसी ‘चवन्नी’ नहीं हैं, जिसे आसानी से पलटा जा सके। उस समय जयंत समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में थे। 2026 में अखिलेश यादव ने इसी पुराने संदर्भ को पलटते हुए कहा कि सपा ने ‘चवन्नी का रुपया’ बना दिया, लेकिन इसके बावजूद वह उन्हें छोड़कर चले गए। रालोद ने इसे जयंत चौधरी और चौधरी चरण सिंह की विरासत से जोड़ते हुए आपत्तिजनक बताया।
अखिलेश के बयान के बाद रालोद नेताओं ने कहा कि जयंत चौधरी को किसी एक दल ने नहीं बनाया, बल्कि लोकतंत्र में जनता नेताओं को ताकत देती है। जयंत चौधरी ने भी कहा कि अगर अखिलेश को सस्ती भाषा का इस्तेमाल करना था तो उनका नाम लेकर करते, जाट समाज को इसमें क्यों घसीटा गया। रालोद नेताओं ने समाजवादी पार्टी को उसका राजनीतिक इतिहास याद दिलाते हुए कहा कि मुलायम सिंह यादव को उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगे बढ़ाने में चौधरी चरण सिंह की बड़ी भूमिका थी।
रालोद ने दावा किया कि 2022 में सपा की सीटें बढ़ाने में उसके गठबंधन का योगदान रहा। वहीं सपा समर्थकों की ओर से याद दिलाया जा रहा है कि मुलायम सिंह यादव की सरकार के दौरान अजित सिंह से जुड़े नेताओं को मंत्री बनाया गया और चौधरी चरण सिंह के नाम पर संस्थाओं का नामकरण किया गया। इस तरह ‘चवन्नी’ विवाद अब सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दोनों दल एक-दूसरे को पुराने राजनीतिक सहयोग और एहसान गिनाने लगे हैं।
22 अगस्त को बसपा प्रमुख मायावती ने अखिलेश यादव के बयान पर कड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा कि किसी पुराने सहयोगी और उसके नेता पर ‘चवन्नी से रुपया’ बनाने जैसी टिप्पणी अमर्यादित, अशोभनीय और शर्मनाक है। मायावती ने अखिलेश से न केवल जयंत चौधरी बल्कि चौधरी चरण सिंह के परिवार और पूरे जाट समाज से माफी मांगने की मांग की।
मायावती ने सपा पर गठबंधन की राजनीति में स्वार्थी रवैया अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने 1993 के सपा-बसपा गठबंधन, 1995 के लखनऊ गेस्ट हाउस कांड और 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन का जिक्र करते हुए कहा कि सपा का अपने सहयोगियों के प्रति रवैया भरोसेमंद नहीं रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा जरूरत के मुताबिक सहयोगियों का इस्तेमाल करती है। मायावती ने लोगों से आगामी विधानसभा चुनाव में सपा से सावधान रहने की अपील भी की।
विवाद बढ़ने के बाद सपा के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल यादव ने मोर्चा संभाला। उन्होंने सीधे तौर पर जयंत पर हमला करने के बजाय चौधरी चरण सिंह और मुलायम सिंह यादव के रिश्ते को सामने रखा। शिवपाल ने कहा कि नेताजी ने चौधरी चरण सिंह को शब्दों के साथ संस्थाओं और फैसलों के जरिए भी सम्मान दिया।
शिवपाल ने तीन प्रमुख उदाहरण गिनाए। उन्होंने कहा कि मुलायम सिंह यादव ने मेरठ विश्वविद्यालय का नाम चौधरी चरण सिंह के नाम पर किया, लखनऊ एयरपोर्ट का नाम उनके नाम पर करने का प्रस्ताव रखा और अपने मुख्यमंत्रित्व काल में विधान भवन के सामने चौधरी चरण सिंह की आदमकद प्रतिमा स्थापित कराई। शिवपाल ने कहा कि चौधरी चरण सिंह का सपना किसान, गांव और खेत-खलिहान को मजबूत करना था।
यह विवाद ऐसे समय उठा है जब उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मतदाता लंबे समय से महत्वपूर्ण राजनीतिक भूमिका निभाते हैं। रालोद का प्रभाव भी मुख्य रूप से इसी क्षेत्र में माना जाता है। 2022 में सपा और रालोद साथ लड़े थे, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले रालोद एनडीए में चला गया। अखिलेश का बयान पुराने गठबंधन की नाराजगी के साथ-साथ पश्चिमी यूपी के राजनीतिक समीकरणों पर भी असर डाल सकता है।
सपा के लिए चुनौती यह है कि वह पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को मजबूत करने के साथ पश्चिमी यूपी में जाट मतदाताओं और किसान राजनीति से जुड़े प्रभाव को भी संभाले। दूसरी ओर रालोद भाजपा के साथ रहते हुए अपने पारंपरिक किसान और जाट आधार को मजबूत करना चाहेगा। बसपा की एंट्री ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है, क्योंकि मायावती पश्चिमी यूपी में अपने पुराने सामाजिक आधार को फिर सक्रिय करने की कोशिश कर सकती हैं।
फिलहाल यह विवाद मुख्य रूप से राजनीतिक बयानबाजी है, लेकिन इसके असर को केवल शब्दों तक सीमित नहीं माना जा सकता। चुनावी राजनीति में गठबंधन टूटने के बाद पुराने सहयोगियों के बीच ‘किसने किसे बनाया’ का सवाल अक्सर वोटरों के सामने राजनीतिक संदेश बन जाता है। अखिलेश का संदेश यह है कि सपा ने सहयोगियों को राजनीतिक ताकत दी, जबकि रालोद का जवाब है कि उसकी ताकत जनता और चौधरी चरण सिंह की विरासत से आती है।
आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह विवाद सिर्फ नेताओं के बयानों तक रहता है या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट, किसान और गठबंधन की राजनीति पर वास्तविक असर डालता है। फिलहाल ‘चवन्नी से रुपया’ की लड़ाई ने सपा और रालोद के पुराने रिश्ते, मुलायम-चरण सिंह की राजनीतिक विरासत और 2027 की चुनावी रणनीति- तीनों को एक साथ चर्चा में ला दिया है।