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अमेरिका के स्पेस दबदबे को तोड़ ‘ऑर्बिटल सुपरपॉवर’ बनने की राह पर चीन, ISRO किस स्थान पर है?

क्या आप जानते हैं कि चीन की नई रॉकेट तकनीक न केवल अंतरिक्ष में उसकी ताकत बढ़ा रही है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा को भी चुनौती दे रही है? आइए जानें, कैसे ये तकनीकी सफलताएं युद्ध के मैदान को बदल सकती हैं और इस दौड़ में भारत कहां खड़ा है।
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भारत

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Ravi Gupta

Aug 22, 2026

china in space

प्रतीकात्मक तस्वीर | Gemini AI

चीन ने हाल ही में अंतरिक्ष में अपनी ताकत को एक नए मुकाम पर पहुंचाया है। उसकी 'किल चेन' क्षमता - यानी दुश्मन को ढूंढ़ने, ट्रैक करने, निशाना साधने और तबाह करने की पूरी प्रक्रिया - रक्षा विश्लेषकों की चिंता का विषय बनती जा रही है। यह स्टोरी उसी बदलाव को समझने का प्रयास है: क्या हुआ, यह क्यों अहम है, भारत सहित बाकी दुनिया पर इसका क्या असर हो सकता है, और वैश्विक अंतरिक्ष दौड़ में भारत की मौजूदा स्थिति क्या है।

चीन की पुन: उपयोग योग्य रॉकेट तकनीक एक नई ऊंचाई पर

चीन ने जुलाई और अगस्त 2026 में दो बड़े मील के पत्थर पार किए।

10 जुलाई 2026 को, राज्य की कंपनी CASC ने हैनान कमर्शियल स्पेस लॉन्च साइट से Long March‑10B रॉकेट लॉन्च किया और स्टेज सेपरेशन के करीब 11 मिनट बाद इसके पहले चरण को समुद्र में एक नेट कैप्चर सिस्टम से लैस "लिंगहांगज़े" (Linghang Zhe) नामक रिकवरी जहाज पर सफलतापूर्वक पकड़ा। यह दुनिया का पहला मौका था जब किसी ऑर्बिटल‑क्लास रॉकेट बूस्टर को नेट के जरिए समुद्र में रिकवर किया गया, और इसके साथ चीन अमेरिका के बाद ऑर्बिटल-क्लास बूस्टर को नियंत्रित तरीके से वापस लाने वाला दुनिया का दूसरा देश बन गया। CASC ने इसी रिकवर किए गए स्टेज को 2026 के अंत तक दोबारा उड़ाने की योजना बताई है।

19 अगस्त 2026 को (स्थानीय समय; 18 अगस्त को अमेरिकी पूर्वी समय अनुसार), निजी कंपनी LandSpace ने अपने Zhuque‑3 (ZQ‑3) रॉकेट की दूसरी उड़ान में पहले चरण को गांसु प्रांत के मिनकिन काउंटी में लैंडिंग लेग्स की मदद से सफलतापूर्वक जमीन पर उतारा। कंपनी के अनुसार, यह लैंडिंग लेग्स के जरिए किसी ऑर्बिटल‑क्लास चीनी रॉकेट की पहली सफल रिकवरी थी और साथ ही चीन की जमीन पर पहली बूस्टर रिकवरी भी। इसके साथ LandSpace, SpaceX और Blue Origin के बाद, ऑर्बिटल‑क्लास बूस्टर को प्रणोदन (propulsive) तरीके से लैंड कराने वाली दुनिया की तीसरी निजी कंपनी बन गई।

ये दोनों सफलताएं चीन को रॉकेट पुन: उपयोग की दिशा में एक बड़ा कदम आगे ले जाती हैं — Long March‑10B ने समुद्र में नेट से, जबकि Zhuque‑3 ने जमीन पर लैंडिंग लेग्स से यह साबित किया कि चीन के पास अब रिकवरी की दो अलग-अलग, स्वतंत्र रूप से विकसित तकनीकें मौजूद हैं।

'किल चेन' की ताकत में इजाफा

इन तकनीकी सफलताओं का अर्थ केवल रॉकेट बचाना नहीं है, बल्कि यह चीन की सैन्य 'किल चेन' क्षमता को भी अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत करता है। 'किल चेन' का अर्थ है — दुश्मन को ढूंढ़ना, ट्रैक करना, निशाना साधना और तबाह करना। इस पूरी प्रक्रिया में सैटेलाइट, संचार, जीपीएस/बेईदोऊ (BeiDou) और रॉकेट तकनीक का एक साथ उपयोग होता है।

चीन की पीएलए (PLA) ने हाल के वर्षों में अपनी अंतरिक्ष क्षमताओं को संस्थागत रूप से एकीकृत किया है। 19 अप्रैल 2024 को, PLA ने अपनी पुरानी Strategic Support Force (SSF) को भंग कर उसे तीन स्वतंत्र, केंद्रीय सैन्य आयोग (CMC) के अधीन शाखाओं में बांट दिया — Aerospace Force (एयरोस्पेस फोर्स), Cyberspace Force (साइबरस्पेस फोर्स) और Information Support Force (सूचना समर्थन फोर्स)। इनमें से Aerospace Force अब PLA के सभी सैटेलाइट, लॉन्च साइट और अंतरिक्ष-आधारित C4ISR (कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन, कंप्यूटर, इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस) नेटवर्क का संचालन देखती है।

पुन: उपयोग योग्य रॉकेट तकनीक से चीन को यह रणनीतिक लाभ मिल सकता है कि वह संकट की स्थिति में तेजी से सैटेलाइट भेज सके, अपनी निगरानी और संचार क्षमताओं को कम लागत में बनाए रख सके, और बड़े पैमाने पर सैटेलाइट मेगाकॉन्स्टेलेशन (जैसे Guowang और Thousand Sails) खड़ा कर सके — जो निगरानी के साथ-साथ सैन्य उपयोग के लिए भी अहम माने जाते हैं।

(नोट: 'किल चेन' और सैन्य निहितार्थ वाला यह हिस्सा रक्षा-विश्लेषकों की व्याख्या पर आधारित एक रणनीतिक आकलन है, न कि किसी आधिकारिक सैन्य दस्तावेज़ का सीधा उद्धरण।)

भारत की अंतरिक्ष स्थिति: कहां खड़ा है ISRO?

चीन की इन छलांगों के बीच भारत भी अपनी गति से आगे बढ़ रहा है, हालांकि पैमाने और सैन्य-अंतरिक्ष एकीकरण के मामले में अभी फासला बना हुआ है।

  • गगनयान मिशन: ISRO भारत के पहले स्वदेशी मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है। क्रू मॉड्यूल और सर्विस मॉड्यूल की प्रणोदन प्रणाली के परीक्षण जारी हैं, और मानवरहित गगनयान उड़ान 2026 के अंत तक होने की योजना है।
  • भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन: इसरो का लक्ष्य 2035 तक अपना खुद का अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करना और 2040 तक मानवयुक्त चंद्र मिशन भेजना है। करीब 80 सैटेलाइटों पर काम जारी है, जो वैज्ञानिक शोध, आपदा प्रबंधन, आंतरिक सुरक्षा और नेविगेशन में इस्तेमाल होंगे।
  • निजी क्षेत्र: स्काईरूट एयरोस्पेस (विक्रम-1) और अग्निकुल कॉसमॉस (अग्निबान) जैसी निजी कंपनियां छोटे उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में पकड़ बनाने के लिए स्वदेशी रॉकेट विकसित कर रही हैं, जो भारत के वाणिज्यिक अंतरिक्ष क्षेत्र के विस्तार का संकेत है।
  • बजट और दक्षता: वैश्विक तुलना में भारत का अंतरिक्ष बजट अमेरिका और चीन से काफी छोटा है, लेकिन इसरो को अक्सर "सबसे कम लागत में सबसे ज्यादा नतीजे" देने वाली एजेंसियों में गिना जाता है — चंद्रयान और मंगलयान जैसे मिशनों की तुलनात्मक रूप से कम लागत इसका उदाहरण है।
  • पुन: उपयोग योग्य रॉकेट: भारत का अभी तक चीन जैसा पूर्ण पुन: उपयोग योग्य ऑर्बिटल-क्लास बूस्टर रिकवरी सिस्टम परिचालन में नहीं है, हालांकि ISRO पुन: उपयोग योग्य लॉन्च वाहन (RLV) तकनीक पर परीक्षण कर रहा है।

भारत और वैश्विक सुरक्षा पर असर

चीन की यह बढ़ती ताकत भारत सहित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों के लिए चिंता का विषय बन सकती है। पीएलए की बढ़ती निगरानी और तेज-प्रक्षेपण क्षमता को देखते हुए भारत को अपनी रक्षा रणनीतियों और अंतरिक्ष सुरक्षा नीतियों पर लगातार पुनर्विचार करना होगा। अमेरिका और NATO जैसे साझेदार भी इस बदलाव पर नजर रखे हुए हैं और अपनी अंतरिक्ष रक्षा तैयारियों को मजबूत कर रहे हैं।

भारत के लिए जरूरी है कि वह अपनी अंतरिक्ष क्षमताओं — सैटेलाइट लॉन्च दर, पुन: उपयोग योग्य रॉकेट और अंतरिक्ष-आधारित निगरानी प्रणाली — को तेजी से विकसित करे, साथ ही अंतरराष्ट्रीय सहयोग और नियमों के तहत अंतरिक्ष क्षेत्र में पारदर्शिता की दिशा में भी कदम बढ़ाए।

(यह हिस्सा भी विश्लेषणात्मक आकलन है, किसी एक आधिकारिक भारतीय सरकारी बयान पर आधारित तथ्यात्मक दावा नहीं।)

वैश्विक अंतरिक्ष शक्तियां: टॉप 10 देश (2026)

सरकारी अंतरिक्ष बजट (नागरिक + रक्षा), लॉन्च क्षमता और तकनीकी उपलब्धियों के आधार पर एक अनुमानित रैंकिंग — ध्यान रहे, अलग-अलग रिपोर्ट अलग-अलग मानदंड (बजट, लॉन्च संख्या, मिशन सफलता) इस्तेमाल करती हैं, इसलिए क्रम स्रोत के अनुसार थोड़ा बदल सकता है:

क्रमदेशप्रमुख एजेंसीअनुमानित वार्षिक बजट (सिविल+रक्षा)खासियत
1अमेरिकाNASA / US Space Force~$80 अरबसबसे बड़ा बजट, आर्टेमिस चंद्र कार्यक्रम, SpaceX जैसी निजी कंपनियां
2चीनCNSA / PLA Aerospace Force~$15–20 अरबतियांगोंग स्पेस स्टेशन, चंद्र नमूना वापसी, तेज लॉन्च दर, पुन: उपयोग योग्य रॉकेट
3जापानJAXA~$5 अरबउपग्रह तकनीक, ग्रह अन्वेषण, आर्टेमिस सहयोग
4फ्रांस/यूरोपESA (22 सदस्य देश)~$7–9 अरब (ESA सामूहिक)कोपरनिकस पृथ्वी अवलोकन, जूस मिशन, गुयाना लॉन्च साइट
5रूसRoscosmos~$3–4 अरबविरासती मानव अंतरिक्ष उड़ान अनुभव, सोयुज कार्यक्रम
6जर्मनीDLR (ESA सदस्य)~$2.7 अरबESA में प्रमुख योगदानकर्ता
7भारतISRO~$1.5–2 अरबकम लागत में उच्च दक्षता, चंद्रयान/मंगलयान, गगनयान, बढ़ता निजी क्षेत्र
8इटलीASI (ESA सदस्य)~$2.3 अरबESA में प्रमुख योगदानकर्ता
9ब्रिटेनUK Space Agencyसैटेलाइट नवाचार, वाणिज्यिक साझेदारी, स्पेसपोर्ट विस्तार
10दक्षिण कोरियाKARIउपग्रह प्रक्षेपण क्षमता, बढ़ता अंतरिक्ष कार्यक्रम

(बजट आंकड़े विभिन्न 2026 स्रोतों — Novaspace/Euroconsult, OECD और एजेंसी रिपोर्टों — पर आधारित अनुमान हैं और वर्ष-दर-वर्ष बदल सकते हैं।)

आगे क्या हो सकता है?

चीन की यह सफलता केवल शुरुआत मानी जा रही है। आने वाले समय में पुन: उपयोग योग्य रॉकेट तकनीक तेज, सस्ती और अधिक नियमित लॉन्च को संभव बना सकती है, जिससे चीन को अंतरिक्ष में निरंतर उपस्थिति बनाए रखने, सैटेलाइट नेटवर्क बढ़ाने और संकट की स्थिति में तेज प्रतिक्रिया देने की क्षमता मिलेगी।

भारत और अन्य देशों को भी अंतरिक्ष क्षेत्र में सक्रिय रहना होगा — न केवल रक्षा के लिए, बल्कि शिक्षा, अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए भी। चीन की यह नई उपलब्धि केवल तकनीकी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेत भी है। भविष्य की सुरक्षा चुनौतियां अब जमीन, हवा या समुद्र तक सीमित नहीं रहेंगी।