
UN SOFI Report 2026: संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की ओर से जारी 'द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड 2026' (SOFI 2026) रिपोर्ट ने वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा की एक ऐसी तस्वीर दिखाई है, जो बेहद चिंताजनक है। हालांकि, आंकडों में पिछले तीन सालों के दौरान मामूली सुधार दिखाई दिया है, लेकिन धरातल पर सच्चाई यह है कि दुनिया से भुखमरी खत्म करने का वैश्विक लक्ष्य अभी बहुत दूर नजर आ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, आज भी दुनिया की एक बड़ी आबादी को दो वक्त का भोजन नसीब नहीं हो रहा है और जो भोजन उपलब्ध है, उसमें जरूरी पोषण गायब है। महंगी होती थाली लोगों को कुपोषण और बीमारियों की ओर धकेल रही है।
सोफी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में दुनिया भर में लगभग 64.5 करोड़ लोग (दुनिया की कुल आबादी का 7.8 प्रतिशत) भुखमरी से पीड़ित रहे। हालांकि, यह आंकड़ा 2024 की तुलना में लगभग 1.4 करोड़ और 2022 के उच्चतम स्तर से 4.3 करोड़ कम है, लेकिन यह सुधार बहुत धीमा है।
महामारी पूर्व के आंकडों से तुलना करें, तो वर्ष 2019 की तुलना में आज भी 6.1 करोड़ अधिक लोग भुखमरी के शिकार हैं। 2015 में जब संयुक्त राष्ट्र ने 2030 तक शून्य भुखमरी (Zero Hunger) का वैश्विक संकल्प लिया था, तब से लेकर अब तक भूखे लोगों की कुल संख्या में करीब 5 करोड़ का इजाफा हुआ है। इस रफ्तार से वर्ष 2030 तक दुनिया से भूख मिटाने का सपना अधूरा रह सकता है।
क्षेत्रीय दृष्टिकोण से देखें तो अफ्रीका महाद्वीप अब दुनिया में भुखमरी का नया केंद्र बन चुका है। अफ्रीका में लगभग 30.9 करोड़ लोग (वहां की आबादी का 20 प्रतिशत) गंभीर भूख का सामना कर रहे हैं। इस मामले में अफ्रीका ने एशिया को भी पीछे छोड़ दिया है, जहां पहले सबसे अधिक भूखे लोग रहते थे।
रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि अब भूख के अलावा पौष्टिक और संतुलित आहार की पहुंच से बाहर होना सबसे बड़ा संकट बन गया है।
2.1 अरब लोग अस्वस्थ भोजन के शिकार: रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की लगभग 25.8 प्रतिशत आबादी, यानी करीब 2.1 अरब लोग मध्यम या गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। इसका सीधा अर्थ है कि इन लोगों को नियमित रूप से पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण भोजन नहीं मिल पाता है।
एक तिहाई आबादी की थाली से पोषण गायब: दुनिया की एक तिहाई से अधिक आबादी (लगभग 2.6 अरब लोग) के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वे एक स्वस्थ और संतुलित आहार (Healthy Diet) खरीद सकें।
महंगाई का असर: हरी सब्जियां, फल, दालें, दूध और प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थों की कीमतें बीते कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी हैं। वर्ष 2017 के मुकाबले एक स्वस्थ थाली की औसत कीमत में लगभग 48 प्रतिशत की बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
जब पौष्टिक भोजन महंगा हो जाता है, तो गरीब और मध्यम वर्ग के लोग पेट भरने के लिए केवल सस्ते और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर अनाज का सहारा लेते हैं। इससे पेट तो भर जाता है, लेकिन शरीर को जरूरी पोषक तत्व, विटामिन और प्रोटीन नहीं मिल पाते हैं। इसका परिणाम बच्चों में बौनापन (Stunting), दुबलापन (Wasting), एनीमिया और वयस्कों में मोटापा और गंभीर बीमारियों के रूप में सामने आ रहा है।
सोफी 2026 की रिपोर्ट में वैश्विक खाद्य प्रणाली की उन कमियों को बताया गया है, जो दुनिया को इस स्थिति में ला रही हैं:
युद्ध और सशस्त्र संघर्ष भुखमरी को बढ़ावा देने वाले सबसे घातक कारक साबित हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि मिडिल-ईस्ट (मध्य पूर्व) में चल रहे युद्ध और रूस-यूक्रेन संघर्ष ने दुनिया की खाद्य सुरक्षा को गहरा धक्का पहुंचाया है।
उर्वरक और ईंधन की कीमतें: युद्ध के कारण प्राकृतिक गैस, ईंधन और रासायनिक उर्वरकों की सप्लाई पर बुरा असर पड़ा है। उर्वरक महंगे होने से खेती की लागत बढ़ी है, जिसका सीधा असर खाने की चीजों पर पड़ रहा है।
सप्लाई चेन में रुकावट: व्यापारिक मार्गों पर तनाव और समुद्री शिपिंग में बाधाओं के कारण दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक खाद्यान्न पहुंचाना महंगा और कठिन हो गया है।
भविष्य का आकलन: रिपोर्ट के अनुसार, अगर मिडिल-ईस्ट संघर्ष और युद्ध लंबा खींचता है, तो साल 2030 तक दुनिया में भूखे लोगों की संख्या घटकर 50.3 करोड़ पर आने के बजाय 52 करोड़ से अधिक बनी रह सकती है।
यदि भारत के संदर्भ में बात करें, तो सोफी 2026 की रिपोर्ट में कुछ राहत की खबरें भी हैं, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं।
अल्पपोषण में कमी: भारत में अल्पपोषित (Undernourished) लोगों की संख्या में भारी गिरावट आई है। साल 2004-2006 में जहां भारत की 21.1 प्रतिशत आबादी (लगभग 24.3 करोड़ लोग) कुपोषित थी, वहीं 2023-2025 में यह घटकर 9.8 प्रतिशत (लगभग 14.2 करोड़ लोग) पर आ गई है।
पौष्टिक भोजन का संकट: भारत में सबसे बड़ी समस्या पौष्टिक आहार की महंगाई है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में एक इंसान के लिए स्वस्थ आहार की लागत लगभग 397 रुपये तक पहुंच गई है। इस वजह से देश की लगभग 35.5 प्रतिशत आबादी (लगभग 52 करोड़ लोग) एक स्वस्थ और संतुलित थाली का खर्च उठाने में असमर्थ है।
महिलाओं और बच्चों की स्थिति: भारत में बच्चों में बौनापन (Stunting) कम होकर 32.9 फीसदी हुआ है, लेकिन महिलाओं में एनीमिया (खून की कमी) और बच्चों में दुबलेपन का स्तर अभी भी चिंताजनक बना हुआ है।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि भूखमरी कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसका समाधान न हो सके। यदि मजबूत नीतियां और सही निवेश किया जाए, तो इस संकट से निपटा जा सकता है।
स्थानीय कृषि को बढ़ावा: दुनिया के बाजारों पर अत्यधिक निर्भरता कम करके स्थानीय किसानों और पारिवारिक खेती को मजबूत करना होगा।
सामाजिक सुरक्षा का विस्तार: गरीब और वंचित वर्गों की आर्थिक मदद करना, मुफ्त स्कूल भोजन और सब्सिडी वाले पौष्टिक खाद्यान्न वितरण को और व्यापक बनाना होगा।
खाद्य प्रणालियों में सुधार: खेती में नयापन लाते हुए सिर्फ गेहूं और चावल तक सीमित रहने के बजाय मोटे अनाज (श्री अन्न), दालों, सब्जियों और डेयरी उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा देना चाहिए।