
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की एक ताजा रिपोर्ट ने वैश्विक खान-पान की आदतों को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले छह दशकों में दुनिया भर में मीट की खपत करीब दोगुनी हो गई है और लोग अब पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा नॉन-वेज की तरफ बढ़ रहे हैं। इस साल जून में जारी FAO की रिपोर्ट के अनुसार, 1961 में जहां प्रति व्यक्ति सालाना मांस खपत औसतन सिर्फ 25 किलोग्राम थी, वहीं 2022 तक यह बढ़कर 47 किलोग्राम हो गई।
रिपोर्ट के मुताबिक इस बढ़ोतरी में सबसे बड़ा योगदान पोल्ट्री यानी चिकन का रहा है। 1961 में एक व्यक्ति सालभर में औसतन 3 किलोग्राम से भी कम चिकन खाता था, जो 2022 में बढ़कर 17 किलोग्राम हो गया है। यानी करीब छह गुना का उछाल, जिसने चिकन को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली एनिमल प्रोटीन कैटेगरी बना दिया।
इसी अवधि में पोर्क यानी सूअर के मांस की खपत लगभग दोगुनी होकर 15 किलोग्राम तक पहुंच गई, जबकि बीफ की खपत करीब 9 किलोग्राम पर स्थिर बनी रही। FAO की सह-लेखिका डैनियला बटालिया के मुताबिक, मीट की उपलब्धता और पहुंच में अब भी बड़ी असमानता है। अमीर देशों में खपत ऊंची और स्थिर बनी हुई है, जबकि गरीब देशों में सामर्थ्य ही सबसे बड़ी बाधा है।
देशों के हिसाब से देखें तो अमेरिका और पुर्तगाल जैसे उच्च आय वाले देश सबसे ज्यादा मीट खाने वालों में शुमार हैं, जहां प्रति व्यक्ति सालाना खपत करीब 149 किलोग्राम तक पहुंचती है। ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, मंगोलिया, स्पेन और इस्राइल जैसे देश भी सूची में ऊपर हैं, जहां खपत 100 किलोग्राम प्रति व्यक्ति से ज्यादा है।
यूरोपीय देशों में भी औसत खपत वैश्विक औसत से काफी ऊपर है। इसके उलट अफ्रीका के कई देशों, खासकर रवांडा और इथियोपिया जैसे कम आय वाले देशों में यह आंकड़ा महज 7 से 9 किलोग्राम प्रति व्यक्ति तक सीमित है, क्योंकि वहां मीट की कीमत ही सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
भारत की बात करें तो यहां मांस, पोल्ट्री, सीफूड और अंडे बड़े पैमाने पर खाए जाते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) के मुताबिक 15-49 साल की उम्र के करीब 80 प्रतिशत भारतीय किसी न किसी रूप में मांसाहार का सेवन करते हैं। पुरुषों (87%) में यह हिस्सा महिलाओं (75%) के मुकाबले काफी ज्यादा है।
पिछले डेढ़ दशक में मांसाहारी भारतीय वयस्कों का अनुपात 2006 के 74 प्रतिशत से बढ़कर 2021 में 80 प्रतिशत हो गया है। संख्या के लिहाज से देखें तो भारत की करीब 70 से 80 प्रतिशत आबादी मांसाहारी है, जो 100 करोड़ से भी अधिक लोगों के बराबर बैठती है।
राज्यों के हिसाब से पश्चिम बंगाल और केरल में करीब 98-99 प्रतिशत लोग मांसाहार करते हैं, वहीं आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और ओडिशा में भी यह आंकड़ा 97-98 प्रतिशत के आसपास है। इसके उलट पंजाब, हरियाणा और राजस्थान देश के ऐसे इकलौते राज्य हैं, जहां शाकाहारी आबादी बहुमत में है।
धर्म के आधार पर देखा जाए तो मुस्लिम और ईसाई समुदाय में लगभग 99 प्रतिशत लोग मांसाहारी हैं, जबकि हिंदू समुदाय में यह आंकड़ा करीब 78 प्रतिशत है। जैन और सिख समुदाय में शाकाहारियों का अनुपात सबसे ज्यादा है।
दिलचस्प बात यह है कि आय के हिसाब से मांसाहार का पैटर्न उलटा नजर आता है। भारत की सबसे गरीब 20 प्रतिशत आबादी में करीब 9 में से 9 यानी लगभग सभी लोग मांस खाते हैं, जबकि सबसे अमीर 20 प्रतिशत आबादी में यह अनुपात घटकर करीब 7 में से 7 यानी थोड़ा कम रह जाता है। यानी कम आय वर्ग में मांसाहार की प्रवृत्ति ज्यादा देखने को मिलती है।
NFHS-5 के मुताबिक 15-49 साल के जो पुरुष पूरी तरह शाकाहारी हैं, उनका हिस्सा सिर्फ 16.6 प्रतिशत है। FAO और NFHS-5 दोनों के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि दुनिया भर में और खासकर भारत में मांसाहार की तरफ रुझान लगातार बढ़ रहा है, जिसके पीछे बदलती आय, शहरीकरण और खान-पान की प्राथमिकताएं अहम वजह मानी जा रही हैं