CG News: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र से दो दिलों की सच्ची कहानी सामने आई है। जो प्यार, दर्द और संघर्ष के बीच नई जिंदगी की शुरुआत की है.. चलिए जानते हैं अनोखी कहानी
CG News: ताबीर हुसैन. प्यार, दर्द और संघर्ष। यह सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के दो दिलों की सच्ची कहानी है। 15 साल तक जंगलों में बंदूक और डर के साए में जिंदगी बिताने के बाद जब टिकेश्वर प्रसाद और गणेश्वरी नेताम ने मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया, तब उनकी जिंदगी में पहली बार सुकून और सच्चे प्यार की शुरुआत हुई। इस वेलेंटाइन स्पेशल में पढि़ए कैसे संघर्ष के बीच खिला उनका रिश्ता। इस वेलेंटाइन डे पर टिकेश्वर और गणेश्वरी की कहानी यही संदेश देती है सच्चा प्यार डर और दर्द से भी मजबूत होता है, और जब दो लोग साथ खड़े हों तो जिंदगी नई शुरुआत जरूर देती है।
टिकेश्वर जिला धमतरी के नगरी ब्लॉक के ग्राम एकावरी के रहने वाले हैं। वे बताते हैं कि कम उम्र में ही नक्सलियों ने उन्हें गांव की बैठकों में बुलाना शुरू किया। डर और दबाव के चलते उन्हें जंगलों में जाना पड़ा। धीरे-धीरे वही जिंदगी उनकी मजबूरी बन गई। 15 साल तक वे उसी संगठन के साथ रहे। जंगलों की जिंदगी आसान नहीं थी। कभी खाना मिलता, कभी नहीं। दवा का अभाव, लगातार खतरा और चारों ओर घेराबंदी का डर। साल 2019 को उन्हें छाती और पेट में गोली भी लगी थी। इलाज भी साथियों ने ही किया।
गणेश्वरी, जिला गरियाबंद के मैनपुर क्षेत्र की रहने वाली हैं। वे भी उसी एरिया में सक्रिय थीं। दोनों लंबे समय तक एक ही इलाके में काम करते रहे। धीरे-धीरे बातचीत बढ़ी, साथ में काम करते हुए अपनापन महसूस हुआ। कठिन हालातों में एक-दूसरे का सहारा बनते-बनते यह रिश्ता प्यार में बदल गया। टिकेश्वर कहते हैं, उसी समय से लगाव होने लगा था, पर असली फैसला हमने बाहर आने के बाद लिया।
2024 को टिकेश्वर जंगल से बाहर निकले और धमतरी में आत्मसमर्पण किया। बाद में गरियाबंद में भी औपचारिक प्रक्रिया पूरी हुई। गणेश्वरी ने भी उनके साथ आत्मसमर्पण किया। आज टिकेश्वर गोपनीय सैनिक और गणेश्वरी कलेक्ट्रेट में प्यूजन के रूप में काम कर रहे हैं। दोनों ने मुख्यधारा में लौटकर शादी की और अब सामान्य जिंदगी जी रहे हैं।
टिकेश्वर बताते हैं कि जंगल की जिंदगी में हर दिन अनिश्चित था। बारिश में भीगकर रहना, भूखे पेट सोना, गोलीबारी का खतरा। यह सब आम बात थी। वहां का खाना-पीना बहुत कठिन था। कभी मिलता था, कभी नहीं। दवाई की सुविधा भी नहीं थी। गणेश्वरी को कभी शारीरिक चोट नहीं लगी, लेकिन मानसिक दबाव और डर उनके हिस्से में भी बराबर था।
आज टिकेश्वर 40 साल के हैं और गणेश्वरी 32 साल की। उम्र का अंतर उनके रिश्ते के बीच कभी नहीं आया। दोनों कहते हैं कि अब वे शांति, सम्मान और सामान्य जीवन की कीमत समझते हैं। उनकी कहानी बताती है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, प्यार रास्ता ढूंढ ही लेता है। बंदूक की आवाज से लेकर शादी के सात फेरों तक का सफर आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
दंतेवाड़ा के कारली गांव से निकली यह कहानी संघर्ष, विचारधारा, प्रेम और बदलाव की है। बामन जो कभी नक्सली संगठन से जुड़े थे, आज मुख्यधारा में लौटकर नई जिंदगी शुरू कर चुके हैं। 15 साल तक संगठन में रहने वाले बामन ने 2011 में बाहर आने का फैसला किया। उसी दौर में संगठन में जुड़ी हिड़मे से उनका साथ, दोस्ती और फिर प्रेम हुआ। हाल ही में दोनों ने सामाजिक रीति से विवाह कर लिया और अब शांतिपूर्ण जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं।
बामन बताते हैं कि गांवों में जमीन और हक की लड़ाई के नाम पर बैठकों और सभाओं का दौर चलता था। इन्हीं बैठकों से प्रभावित होकर वे संगठन से जुड़ गए। उस समय वे कम उम्र के थे और गांव में चल रही राजनीतिक बातों से आकर्षित हुए। संगठन में रहते हुए उन्होंने पढऩा लिखना भी सीखा।
करीब 15 साल तक संगठन में सक्रिय रहने के बाद 2011 में उन्होंने मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया। आज वे दंतेवाड़ा के कारली पुलिस लाइन इलाके में रह रहे हैं और गोपनीय पुलिस में जुड़े हैं। वे कहते हैं कि अब वे शांति से जीवन जीना चाहते हैं।
हिड़मे ने बताया, वर्ष 2018 में संगठन से जुड़ी थीं। हम दोनों एक ही यूनिट में रहते थे। साथ काम करते करते दोनों के बीच अपनापन बढ़ा और यह रिश्ता प्रेम में बदल गया। संगठन के भीतर रिश्तों पर सख्त नियम होते थे, लेकिन दोनों ने एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ा।