रायपुर

शर्मनाक: टोनही/डायन के संदेह में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश ओडिशा, झारखण्ड में हो रही निर्दोष महिलाओं की हत्याएं

महाराष्ट्र छत्तीसगढ़,मध्यप्रदेश ओडिशा, झारखण्ड, बिहार, असम सहित अनेक प्रदेशों में प्रतिवर्ष टोनही/डायन के संदेह में निर्दोष महिलाओं की हत्याएं हो रही हैं जो सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने सन 2001 से 2015 तक 2604 महिलाओं की मृत्यु डायन प्रताडऩा के कारण होना माना है। जबकि वास्तविक संख्या इनसे बहुत […]

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Mar 14, 2026
शर्मनाक: टोनही/डायन के संदेह में छत्तीसगढ़,मध्यप्रदेश ओडिशा, झारखण्ड में हो रही निर्दोष महिलाओं की हत्याएं

महाराष्ट्र छत्तीसगढ़,मध्यप्रदेश ओडिशा, झारखण्ड, बिहार, असम सहित अनेक प्रदेशों में प्रतिवर्ष टोनही/डायन के संदेह में निर्दोष महिलाओं की हत्याएं हो रही हैं जो सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने सन 2001 से 2015 तक 2604 महिलाओं की मृत्यु डायन प्रताडऩा के कारण होना माना है। जबकि वास्तविक संख्या इनसे बहुत अधिक है। अधिकतर मामलों में पुलिस रिपोर्ट ही नहीं हो पाती। झारखंड में 7000, बिहार में 1679, छत्तीसगढ़ में 1357, ओडिशा में 388, राजस्थान में 95, असम में 102 मामलों की प्रमाणिक जानकारी है।

शिकायतों पर संज्ञान लेकर तुरंत कार्रवाई आवश्यक

सुभाषचन्द्र बोस राज्य पुलिस अकादमी चन्द्रखुरी में कार्यशाला का आयोजन किया गया। यहां आयोजित व्याख्यान में अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष व नेत्र विशेषज्ञ डॉ. दिनेश मिश्र ने कहा, विज्ञान की शिक्षा एवं प्रौद्योगिकी के कारण देश में वैज्ञानिक उपलब्धियां बढ़ रही हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी तकनीक का प्रभाव बढ़ा है, पर इसके बाद भी देश में अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों के कारण अक्सर अनेक निर्दोष लोगों को प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है। जिनमें डायन/टोनही के संदेह में प्रताड़ित महिलाओं की संख्या अधिक है। जादू टोना, टोनही जैसे अंधविश्वास से राहत के लिए आम जन में जागरूकता के साथ शिकायतों पर संज्ञान लेकर तुरंत कार्रवाई आवश्यक हैं।

प्रदेश में 2005 से राज्य टोनही प्रताड़ना निरोधक कानून बना

प्रदेश में 2005 से राज्य टोनही प्रताड़ना निरोधक कानून बना हुआ है, जिसके अभी भी गांव गांव में प्रचार,प्रसार की जरूरत है। उन्होंने कहा, सामाजिक अंधविश्वासों पर चर्चा, तर्क और विश्लेषण जारी रहना समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए जरूरी है। 18वीं सदी की मान्यताएं व कुरीतियां अभी भी जड़े जमाई हुई हैं, इस कारण जादू-टोना, डायन, टोनही, बलि व बाल विवाह जैसी परंपराएं व अंधविश्वास आज भी वजूद में हैं। इससे प्रतिवर्ष अनेक मासूम जिन्दगियां तबाह हो रही हैं। ऐसे में वैज्ञानिक जागरूकता को बढ़ाने और तार्किक सोच को अपनाने की आवश्यकता है।

बच्चों को भूत-प्रेत के नाम से न डराएं

डॉ. दिनेश ने कहा, मौसम परिवर्तन व संक्रामक बीमारियां गांव को चपेट में लेती हैं, वायरल बुखार, मलेरिया, दस्त जैसे संक्रमण भी सामूहिक रूप से अपने पैर पसारते हैं। ऐसे में कई ग्रामीण कई बार बैगा-गुनिया के परामर्श के अनुसार विभिन्न टोटकों, झाड़-फूंक के उपाय अपनाते हैं, जबकि प्रत्येक बीमारी व समस्या का कारण व उसका समाधान अलग-अलग होता है, जिसे विचारपूर्ण तरीके से ढूंढा जा सकता है। उन्होंने कहा कि आज भी बच्चों को भूत-प्रेत, जादू-टोने के नाम से डराया व भ्रमित किया जाता है। जबकि इससे उनके मन में काल्पनिक डर बैठ जाता है जो उनके मन में ताउम्र बसा होता है। बल्कि उन्हें आत्मविश्वास, निडरता के किस्से कहानियां सुनानी चाहिए। जिनके मन में आत्मविश्वास व निर्भयता होती है उन्हें न ही नजर लगती है और न कथित भूत-प्रेत बाधा लगती है।

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