उदयपुर

रचनात्मक अभियान से प्राप्त करें पारिस्थितिक स्वाधीनता- यही हो 15 अगस्त का संकल्प

Aug 14, 2026
Rajasthan

- डॉ. अनिल मेहता, पर्यावरणविद
15 अगस्त को हमारी चेतना में लाल किले की प्राचीर, लहराता तिरंगा, सीमाओं पर मुस्तैद सशस्त्र बल और स्वाधीनता संग्राम के महान नायकों का आत्मबलिदान स्वतः ही उभर आता है। एक और विचार-विमर्श का स्वाधीनता दिवस पर उभार जरूरी है। वह यह कि भारत की स्वतंत्रता, अखंडता और संप्रभुता की मूलभूत शक्ति उसकी राजनीतिक सीमाओं के साथ-साथ पर्वतों, नदियों, घने जंगलों और विशाल जलागम, जल ग्रहण क्षेत्रों में भी निहित है। हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर राजस्थान की प्राचीन अरावली श्रृंखला तक, मध्य भारत के विंध्य-सतपुड़ा से लेकर दक्षिण के समृद्ध पश्चिमी घाट तक भारत का पर्वत तंत्र केवल भूवैज्ञानिक, भौगोलिक संरचना या पर्यटन स्थल नहीं हैं। ये हमारे राष्ट्र के प्राकृतिक दुर्ग, जल-जनक, जलवायु-नियामक, जैव-विविधता के अक्षय कोष, सतत सामाजिक -आर्थिक समृद्धि के संवाहक और हमारी बहुआयामी सभ्यता की जीवंत स्मृति हैं।
हमारी नदियां इन्हीं पर्वतों और जलागमों से जन्म लेकर भारत की कृषि, उद्योग, स्वास्थ्य और जनजीवन को जीवनरस प्रदान करती हैं। इनके किनारे ही हमारी अनेक सभ्यताएं, तीर्थ, नगर, व्यापारिक मार्ग और सांस्कृतिक परंपराएं विकसित हुई हैं।
इतिहास इसका साक्षी है कि पर्वत, नदियां और वन सामाजिक, सांस्कृतिक, सामरिक और पारिस्थितिकीय , पर्यावरणीय विकास के आधार रहे हैं। पर्वतों ने जहां एक ओर बाहरी आक्रमणों के सामने प्राकृतिक अवरोध का कार्य किया, वहीं उनके संकरे दर्रों ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामरिक नियंत्रण के प्रवेश-द्वार की भूमिका निभाई। हिंदूकुश और हिमालयी दर्रों ने उत्तर-पश्चिम से होने वाली हर ऐतिहासिक गतिविधि को प्रभावित किया। पर्वतों की घाटियों में केवल सेनाएं ही नहीं गुजरीं बल्कि विचार, भाषाएं, व्यापार, धर्म, कला और संस्कृतियां ने भी यात्रा की।
किसी भी राष्ट्र की दीर्घकालिक रणनीतिक क्षमता उसकी भौगोलिक, पारिस्थितिक और सांस्कृतिक अखंडता पर टिकी होती है। प्रकृति, प्राकृतिक भूगोल की रक्षा वास्तव में राष्ट्र की सामरिक क्षमता, जल सुरक्षा और सांस्कृतिक निरंतरता की रक्षा है।
हिमालय केवल भारत की उत्तरी प्राकृतिक सीमा नहीं है। यह गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी प्रणालियों से जुड़े विशाल जलागमों का आधार है। यह मानसूनी हवाओं, जलवायु, हिमनदों, झरनों और पर्वतीय जल प्रणालियों को प्रभावित करता है। केदारनाथ, बद्रीनाथ, अमरनाथ, कैलाश की सांस्कृतिक स्मृति, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे तीर्थ बताते हैं कि भारतीय समाज ने हिमालय को केवल भूगोल नहीं, बल्कि आस्था और आध्यात्मिक चेतना के रूप में भी देखा। इसलिए, हिमालय की रक्षा केवल सीमा सुरक्षा नहीं-जल, जलवायु और भारतीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा भी है।
अरावली गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैला एक प्राचीन पर्वतीय तंत्र है। यह अनेक महत्वपूर्ण जलागमों, भूजल पुनर्भरण क्षेत्रों, वन्यजीव आवासों और नदी प्रणालियों से जुड़ा है। अरावली उत्तर-पश्चिम भारत की पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण अवरोध और जल-विभाजक का कार्य करती है तथा थार के मरुस्थलीय प्रभाव के पूर्व की ओर विस्तार को नियंत्रित करने में भूमिका निभाती है।
अरावली पर्वतमाला भारत की उस ऐतिहासिक परंपरा का भी सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है, जहां प्रकृति और स्वाभिमान परस्पर एकाकार हो गए। महाराणा प्रताप और मेवाड़ के पराक्रमी संघर्ष का एक महत्वपूर्ण आधार अरावली से बना मेवाड़ का दुर्गम भूगोल था। अरावली की संकरी घाटियों, वनों और दुर्गम पहाड़ियों ने मेवाड़ के योद्धाओं को प्राकृतिक सुरक्षा, आश्रय और छापामार युद्ध के लिए अनुकूल परिस्थितियां प्रदान कीं।
अरावली के वनों, घाटियों और गुफाओं ने कठिन समय में आश्रय और स्थानीय संसाधनों तक पहुंच प्रदान की। वनवासी, वीर भील समुदाय ने अरावली के कोने-कोने के अपने असाधारण ज्ञान के बल पर प्रताप की विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह इस बात का प्रमाण है कि जब समाज अपने प्राकृतिक भूगोल को समझता है और उसके साथ सह-अस्तित्व का संबंध बनाता है, तो वही भूगोल उसकी शक्ति बन जाता है। उसे विजय का मुकुट पहनाता है। लेकिन, जिस अरावली ने सदियों तक स्वाभिमान, स्वतंत्रता और प्रतिरोध को शरण दी, आज वही अरावली स्वयं अपने अस्तित्व के लिए रक्षा की गुहार लगा रही है। अनियोजित शहरीकरण, अवैध खनन, अंधी रिसॉर्ट संस्कृति और कंक्रीट के विस्तार ने इस प्राचीन पर्वतमाला को क्षत-विक्षत किया है। जिस पहाड़ी को हमने कभी प्राकृतिक किला माना था, उसे आज विकास के मार्ग का रोड़ा मानने की भारी भूल की जा रही है। यह अरावली के महान इतिहास, पारिस्थितिक अस्तित्व और सांस्कृतिक विरासत का घोर अपमान है।
अरावली वस्तुतः एक पवित्र पारिस्थितिक क्षेत्र हैं, जिसमें भूविज्ञान, वन, नदियां, झीलें, जलागम, लोककलाएं, पुरातात्विक विरासत, तीर्थ परंपराएं और जनजातीय ज्ञान का अद्भुत संगम है। भील समुदाय द्वारा किया जाने वाला गवरी अनुष्ठान प्रकृति, शक्ति, समुदाय और आध्यात्मिकता के गहरे संबंध का प्रतीक है। मगरा बावजी के रूप में पहाड़ की पूजा करने की परंपरा यह दर्शाती है कि भारत की लोक चेतना में पर्यावरण संरक्षण का भाव आधुनिक कानूनों से शताब्दियों पहले से रचा-बसा था। इन परंपराओं के पीछे एक गहरी पारिस्थितिकीय, पर्यावरणीय नैतिकता - इकोलॉजिकल एथिक्स थी। पहाड़ पवित्र था, इसलिए उसे काटना अपराध था। जलस्रोत पवित्र था, इसलिए उसे प्रदूषित करना अनुचित था। वन जीवनरेखा था, इसलिए उसका संरक्षण सामुदायिक दायित्व था। प्रकृति के प्रति श्रद्धा समाज और ईश्वर के प्रति समर्पण था। आज जब हम आधुनिक कानूनी और प्रशासनिक ढांचों के बावजूद पर्यावरण की रक्षा करने में संघर्ष कर रहे हैं, तो हमें इन लोक-परंपराओं और जनजातीय दर्शन से सीखने की महती आवश्यकता है।
इसलिए हिमालय को बचाना केवल पर्वतों को बचाना नहीं वरन संपूर्ण उत्तर भारत के जल, जलवायु , जीवन और संस्कृति को बचाना है। अरावली को बचाना केवल राजस्थान की पहाड़ियों को बचाना नहीं-उत्तर-पश्चिम भारत के जल, जैव-विविधता, जलवायु जंगल, जनजाति और सांस्कृतिक परिदृश्य को बचाना है।विंध्य और सतपुड़ा की रक्षा केवल मध्य भारत के पर्वतों की रक्षा नहीं-नदियों, वनों, जैव-विविधता और वनवासी सांस्कृतिक परंपराओं की सुरक्षा है। पश्चिमी घाट की रक्षा केवल जैव-विविधता की रक्षा नही बल्कि दक्षिण भारत की नदियों, वर्षा, कृषि और पवित्र प्राकृतिक परंपराओं की सुरक्षा है।
भारत की संस्कृति को उसके पर्वतों और नदियों से अलग करके नहीं समझा जा सकता। हमारे पर्वतों के नामों में इतिहास है। हमारी नदियों के नामों में स्मृति है। हमारे तीर्थों में भूगोल है। हमारे लोकगीतों में जल और वन हैं। हमारे वनवासी उत्सवों में ऋतु और प्रकृति है। हमारे पवित्र वनों में जैव-विविधता और आस्था का सह-अस्तित्व है। इसलिए जब एक नदी मरती है, तो केवल उसका जल नहीं जाता उससे जुड़ी लोक-स्मृति, आजीविका, तीर्थ, उत्सव और सांस्कृतिक पहचान भी कमजोर होती है। जब एक पहाड़ काटा जाता है, तो केवल चट्टान नहीं हटती-कभी-कभी उसके साथ एक पूरा सांस्कृतिक परिदृश्य समाप्त होता है। सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और प्राकृतिक विरासत का संरक्षण वास्तव में एक-दूसरे के पूरक हैं।
आज यह विचार आवश्यक है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सीमाओं पर तोपों और टैंकों की तैनाती तक सीमित नहीं है। सामरिक दृष्टि से जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु स्थिरता भी देश की स्वतंत्रता, सामाजिक स्थिरता और आर्थिक प्रगति के लिए अनिवार्य हैं। जल बहुत महत्वपूर्ण है। आधुनिक अर्थव्यवस्था का कोई भी क्षेत्र-चाहे कृषि हो, भारी उद्योग हो, तकनीकी विनिर्माण हो या शहरों का संचालन, जल के बिना नहीं चल सकता। जल सुरक्षा का प्राथमिक आधार जलागम (वाटरशेड) है और इन वाटरशेड का संरक्षण कर पहाड़ करते हैं। पहाड़ अपनी वनस्पति और मृदा संरचना के माध्यम से वर्षा के जल को थामते हैं, भूजल भंडारों का पुनर्भरण करते हैं और नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में सहायता करते हैं इसलिए जब एक पहाड़ नष्ट होता है, तो सिर्फ एक भौगोलिक आकृति गायब नहीं होती। उसके साथ एक जल-चक्र, एक वाटरशेड, एक पारिस्थितिकी तंत्र और संस्कृति भी कमजोर हो जाते हैं। इसका परिणाम कृषि संकट, खाद्य असुरक्षा, उद्योगों के लिए जल संकट और अंततः आर्थिक अस्थिरता के रूप में सामने आ सकता है। यहां एक महत्वपूर्ण आयाम खनिज संसाधनों का दोहन है। पहाड़ों में मौजूद खनिजों का राष्ट्रीय आर्थिक प्रगति के लिए बिल्कुल भी उपयोग नहीं हो, यह जिद व्यावहारिक नहीं है। भारत को अपनी बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण, बुनियादी ढांचे और हरित ऊर्जा के लिए खनिज संसाधनों की आवश्यकता है। इसलिए प्रश्न खनन को पूर्णतः रोकने का नहीं, बल्कि खनिजों को अपने गर्भ में धारण करने वाले पहाड़ों के अस्तित्व और पारिस्थितिक अखंडता का है।
खदान से निकाला खनिज एक खनिज पूंजी, मिनरल कैपिटल है। वहीं एक स्वस्थ पहाड़ प्राकृतिक पूंजी , नेचुरल कैपिटल है। हमें खनिज पूंजी और प्राकृतिक पूंजी के बीच विवेकपूर्ण, वैज्ञानिक और सतत संतुलन स्थापित करना होगा ताकि देश की खनिज-आधारित प्रगति भी आगे बढ़े और हमारे प्राकृतिक संरक्षक-पहाड़, नदियां, वन, तालाब और झीलें भी सुरक्षित और समृद्ध रहें।
21वीं सदी के भारत के सामने सबसे बड़ा दायित्व, जिम्मेदारी है कि वह अपनी पारिस्थितिक स्वाधीनता को सुरक्षित रखे। यदि हमारे पर्वत काटकर समतल कर दिए जाएंगे, नदियां सूखकर गंदे नालों में तब्दील हो जाएंगी, भूजल स्तर पाताल में चला जाएगा, मिट्टी बंजर हो जाएगी, जैव-विविधता समाप्त हो जाएगी और हवा जहरीली हो जाएगी, तो केवल राजनीतिक स्वाधीनता हमें सुरक्षित और समृद्ध भविष्य नहीं दे पाएगी।जो राष्ट्र अपनी प्राकृतिक पूंजी को गंवा देता है, वह अंततः अपनी आर्थिक स्वायत्तता और सामरिक संप्रभुता भी कमजोर कर देता है। और यदि वह अपनी सांस्कृतिक प्राकृतिक विरासत खो देता है, तो उसकी सभ्यतागत आत्मा भी कमजोर होती है। इसलिए, जब तक देश का प्रत्येक नागरिक और नीति-निर्माता प्रकृति रक्षा को राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में स्वीकार नहीं करेगा, तब तक हमारी स्वाधीनता मजबूत नहीं बनेगी। पर्वत बचेंगे तो जल बचेगा। जल बचेगा तो कृषि बचेगी। कृषि बचेगी तो अर्थव्यवस्था बचेगी प्रकृति बचेगी तो संस्कृति बचेगी। संस्कृति बचेगी तो हमारी सभ्यतागत पहचान बचेगी। प्रकृति, अर्थव्यवस्था, सामरिक शक्ति और संस्कृति सुरक्षित रहेंगे तो निश्चित ही स्वतंत्र भारत वास्तव में अखंड, स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बन सकेगा। इसलिए, एक सकारात्मक, रचनात्मक जन अभियान के माध्यम से पारिस्थितिक स्वाधीनता स्थापित करना-यही आज के भारत का नवीन लक्ष्य होना चाहिए।

Updated on:
14 Aug 2026 06:01 am
Published on:
14 Aug 2026 06:01 am