
आजादी के पर्व पर आत्म-स्वतंत्रता का रखें ध्यान - श्रमण डॉ पुष्पेंद्र
15 अगस्त सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह भारत के स्वाभिमान, संघर्ष, त्याग और संकल्प का प्रतीक है। यह वह दिन है जब हम उन अनगिनत वीरों को स्मरण करते हैं, जिन्होंने अपना वर्तमान देश के भविष्य के लिए समर्पित कर दिया। उनके बलिदान ने हमें राजनीतिक स्वतंत्रता दी। लेकिन स्वतंत्रता दिवस का वास्तविक अर्थ केवल इतना नहीं कि हम एक स्वतंत्र राष्ट्र में जन्मे हैं। इससे आगे एक गहरा प्रश्न है- क्या स्वतंत्र राष्ट्र का नागरिक भी भीतर से स्वतंत्र है? यहीं भगवान महावीर का दर्शन हमारे सामने एक नई दृष्टि प्रस्तुत करता है। महावीर ने स्वतंत्रता की वास्तविक परिभाषा बताई। भगवान महावीर ने मनुष्य को बाहरी परिस्थितियों से अधिक उसके आंतरिक बंधनों पर विजय पाने की प्रेरणा दी। उनके अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष संसार से नहीं, स्वयं से है।
क्रोध हमें बांधता है।
लोभ हमें बांधता है।
अहंकार हमें बांधता है।
मोह और आसक्ति हमें बांधते हैं।
भय हमें बांधता है।
जिस व्यक्ति का मन इन विकारों के अधीन है, वह बाहर से स्वतंत्र होते हुए भी भीतर से परतंत्र है। इसलिए महावीर का संदेश केवल “स्वतंत्र रहो” नहीं, बल्कि “अपने ऊपर विजय प्राप्त करो” का संदेश है। यही आत्म-विजय वास्तविक स्वतंत्रता है।
आज का युवा अत्यंत शक्तिशाली है। उसके पास ज्ञान है, तकनीक है, अवसर हैं और दुनिया से जुड़ने की क्षमता है। पर इसी सुविधा के बीच कुछ अदृश्य बंधन भी बढ़ रहे हैं। मोबाइल की लगातार आवश्यकता, सोशल मीडिया पर स्वीकृति पाने की इच्छा, दूसरों से तुलना, दिखावे की संस्कृति, शीघ्र सफलता पाने की बेचैनी और उपभोग की बढ़ती प्रवृत्ति-ये सब आधुनिक जीवन की ऐसी बेड़ियां हैं, जिन्हें दिखाई नहीं देता, लेकिन मनुष्य उनसे बंधता चला जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा स्वयं से पूछे-“क्या मैं तकनीक का उपयोग कर रहा हूँ या तकनीक मेरा उपयोग कर रही है?” “क्या मैं अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करता हूँ या इच्छाएं मुझे नियंत्रित करती हैं?”
“क्या मैं अपनी पहचान स्वयं तय करता हूँ या समाज और सोशल मीडिया की स्वीकृति से?”
इन प्रश्नों के उत्तर ही वास्तविक स्वतंत्रता की दिशा तय करेंगे।
“स्वतंत्रता मनमानी नहीं, आत्मसंयम है”
आज स्वतंत्रता का अर्थ कई बार यह समझ लिया जाता है कि हमें जो अच्छा लगे, वही करें। लेकिन भगवान महावीर का दर्शन इससे कहीं अधिक गहरा है। यदि क्रोध आया और हमने उसे रोक लिया-यह स्वतंत्रता है।
यदि लोभ आया और हमने आवश्यकता को लालच से ऊपर रखा-यह स्वतंत्रता है। यदि अपमान मिला और हमने प्रतिशोध के बजाय क्षमा चुनी-यह स्वतंत्रता है। यदि हमारे पास अधिक है और हमने आवश्यकता से अधिक संग्रह करने से स्वयं को रोका-यह स्वतंत्रता है। अर्थात् स्वतंत्रता इच्छाओं की गुलामी नहीं, इच्छाओं पर संयम है। अहिंसा-स्वतंत्र भारत की नई सामाजिक भाषा है, भगवान महावीर का अहिंसा संदेश आज पहले से अधिक प्रासंगिक है। आज हिंसा केवल हथियारों से नहीं होती। शब्दों से भी होती है, विचारों से भी होती है और डिजिटल माध्यमों से भी। सोशल मीडिया पर किसी के प्रति अपमानजनक टिप्पणी करना, बिना सत्य जाने किसी को बदनाम करना, मतभेद को दुश्मनी में बदल देना-ये भी सामाजिक हिंसा के रूप हैं। युवा यदि यह सीख ले कि असहमति के बावजूद सम्मान बनाए रखा जा सकता है, तो समाज में संवाद और सौहार्द की नई शुरुआत हो सकती है।
Bअनेकांत—आज के युवा के लिए अत्यंत आवश्यक शिक्षाB
आज हर व्यक्ति अपनी बात को सही और दूसरे की बात को गलत साबित करने में लगा है। परिवारों में पीढ़ियों का अंतर हो, राजनीति में विचारों का मतभेद हो या सोशल मीडिया पर किसी विषय को लेकर बहस-असहमति बहुत जल्दी कटुता में बदल जाती है। भगवान महावीर का अनेकांत हमें सिखाता है कि सत्य को समझने के लिए दूसरे दृष्टिकोण को सुनना भी आवश्यक है। युवा यदि यह स्वीकार करना सीख जाए कि “मेरी बात सही हो सकती है, लेकिन केवल मेरी बात ही सही हो-यह आवश्यक नहीं”, तो उसके व्यक्तित्व में विनम्रता, विवेक और सहिष्णुता आएगी।
Bअपरिग्रह=उपभोग की दौड़ में संतुलन का संदेशB
आज सफलता को अक्सर इस बात से मापा जाता है कि हमारे पास कितना है-कितनी बड़ी गाड़ी, कितना बड़ा घर, कितने महंगे वस्त्र और कितनी सुविधाएं। भगवान महावीर का अपरिग्रह हमें याद दिलाता है कि जीवन की समृद्धि वस्तुओं की संख्या में नहीं, आवश्यकताओं की मर्यादा में है। युवा यदि आवश्यकता और लालच के बीच अंतर समझ ले, तो वह आर्थिक रूप से ही नहीं, मानसिक रूप से भी अधिक स्वतंत्र हो सकता है। स्वतंत्र भारत को चरित्रवान युवाओं की आवश्यकता है। राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता। राष्ट्र उसके नागरिकों के चरित्र से बनता है। आज भारत जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है, उसमें युवा शक्ति की सबसे बड़ी भूमिका है। लेकिन केवल तकनीकी रूप से कुशल युवा पर्याप्त नहीं हैं। देश को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो कुशल होने के साथ संवेदनशील, सफल होने के साथ विनम्र और आधुनिक होने के साथ संस्कारित हों। जिस युवा में प्रतिभा है, लेकिन संयम नहीं, उसकी शक्ति विनाशकारी भी हो सकती है। जिस युवा में ज्ञान है, लेकिन करुणा नहीं, उसका ज्ञान अधूरा है। और जिस युवा में सफलता है लेकिन चरित्र नहीं, उसकी सफलता समाज के लिए प्रेरणा नहीं बन सकती। इस बार 15 अगस्त पर केवल तिरंगे को सलाम करने के साथ अपने भीतर भी एक संकल्प लें—
क्रोध से स्वतंत्र होना है।
घृणा से स्वतंत्र होना है।
अहंकार से स्वतंत्र होना है।
दिखावे से स्वतंत्र होना है।
अनावश्यक संग्रह से स्वतंत्र होना है।
दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर रहने से स्वतंत्र होना है।
और अपनी कमजोरियों पर विजय प्राप्त करनी है।
देश की स्वतंत्रता हमें हमारे पूर्वजों से विरासत में मिली है, लेकिन आत्म-स्वतंत्रता हमें अपने पुरुषार्थ से अर्जित करनी होगी। महावीर का संदेश आज के युवा से कहता है-दुनिया को जीतने से पहले स्वयं को जीतिए। दूसरों पर शासन करने से पहले अपने मन पर शासन करना सीखिए और अधिकार मांगने से पहले अपने कर्तव्यों को पहचानिए। तभी स्वतंत्रता केवल राष्ट्रीय पर्व नहीं रहेगी, बल्कि जीवन का दर्शन बन जाएगी। तिरंगा हमें राष्ट्र की स्वतंत्रता का गौरव देता है, और महावीर हमें आत्मा की स्वतंत्रता का मार्ग दिखाते हैं। इसलिए इस स्वतंत्रता दिवस पर केवल यह न पूछें—
“भारत कितना स्वतंत्र है?”
एक बार स्वयं से भी पूछें—
“मैं अपने भीतर कितना स्वतंत्र हूँ?”
क्योंकि—
देश की स्वतंत्रता हमारी विरासत है,
आत्मा की स्वतंत्रता हमारी साधना है।
यही स्वतंत्रता दिवस का सच्चा संदेश है।