
सिर्फ अधिकारों के उपभोक्ता नहीं, बल्कि कर्तव्यों के संरक्षक बनेंगे यही असली स्वतंत्रता
-राजकुमार दक, प्रबुद्ध नागरिक विचार मंच, राजसमंद
स्वतंत्रता दिवस सिर्फ ब्रिटिश हुकूमत से मुक्ति का उत्सव नहीं है, बल्कि यह देश को उत्कृष्टता के पथ पर आगे बढ़ाने का निरंतर चलने वाला संकल्प है। 15 अगस्त को हमारे पूर्वजों ने जिस आजाद भारत का सपना देखा, वह सिर्फ अधिकारों का नहीं, बल्कि कर्तव्य निर्वहन के साथ जिम्मेदारियों का देश था। आज के वैश्विक और डिजिटल युग में जब हम इस महान पर्व को मनाते हैं, तो हमें ईमानदारी से यह आत्म चिंतन करने की आवश्यकता है कि क्या हम स्वतंत्रता का सही उपयोग कर रहे हैं, या जाने-अनजाने इसे 'स्वच्छंदता' (निरंकुशता) में बदल रहे हैं।
आज का युवा वर्ग भौतिकवादी एवं तकनीक के युग में महत्वाकांक्षी और जागरूक हुआ, पर इसी के साथ जीवन के हर मोर्चे पर बिना रोक-टोक के अत्यधिक स्वच्छंदता के साथ जीने की चाहत भी तेजी से बढ़ी है, इस ओर हमने गंभीरता से ध्यान नहीं दिया तो आने वाले समय में चुनौतियों का मुकाबला करना मुश्किल हो जाएगा। हम निम्न बिंदुओं पर चिंतन करें
1. पारिवारिक स्तर पर दूरी: आधुनिक युवा परिवार में किसी भी प्रकार के मार्गदर्शन, टोकने या बड़ों के अनुभवों को अपनी 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' और 'निजता ' में दखल मानने लगा है। इसके कारण परिवारों में संवादहीनता और एकाकीपन बढ़ रहा है। माता-पिता एवं संतान के मध्य संवाद की कमी होती जा रही है जिससे एक दूसरे को समझ ही नहीं पा रहे हैं।
2. सामाजिक मर्यादाओं से दूरी: समाज के नैतिक मूल्यों, परंपराओं और सामूहिक जिम्मेदारी को 'पुराने विचार ' कहकर खारिज करना आज के समय में फैशन बनता जा रहा है। अपनी मर्जी से जीने की चाह में सामाजिक सरोकार पीछे छूट रहे हैं। एक समय था जब सामाजिक मर्यादाओं के कारण अनेक समस्याओं का स्वतः निराकरण हो जाता था |
3. देश और कानून के प्रति नजरिया: देश में अभिव्यक्ति और अधिकारों की आज़ादी का अर्थ कानून की अवहेलना मान लिया है। यातायात नियमों को तोड़ना, नियमों को ताक पर रखकर स्टंट करना या विरोध प्रदर्शन के नाम पर राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाना युवा आक्रोश और स्वच्छंदता का चिंताजनक उदाहरण है। मनमर्जी के शब्दों का उपयोग करना आम बात हो गई है |
4. सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति की आज़ादी का भ्रम: संविधान ने हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, जो एक जीवंत लोकतंत्र की आत्मा है, पर आज सोशल मीडिया के दौर में इस आज़ादी का चेहरा पूरी तरह बदल चुका है।
5. सत्यता बनाम अफवाह: किसी भी बिना जांचे-परखे तथ्य या फेक न्यूज़ को फॉरवर्ड करना और समाज में वैमनस्य फैलाना आज आम बात हो गई है।
6. मर्यादा का हनन: रचनात्मक आलोचना की जगह ट्रोलिंग, गाली-गलौज और व्यक्तिगत आक्षेपों ने ले ली है। डिजिटल आज़ादी के नाम पर किसी की निजता का हनन करना स्वतंत्रता नहीं, बल्कि मानसिक अराजकता है।
7. पर्यावरण के प्रति हमारी 'आज़ाद' सोच का नुकसान: हम अपनी मर्ज़ी से जीने और उपभोग करने के इतने आदी हो चुके हैं कि हम यह भूल जाते हैं कि हमारे कृत्य प्रकृति को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं।
8. प्लास्टिक का उल्लास: स्वतंत्रता दिवस पर गर्व से प्लास्टिक के तिरंगे खरीदे जाते हैं, पर अगले ही दिन वे सड़कों और कचरे के ढेरों में पैरों तले कुचले मिलते हैं। यह राष्ट्रध्वज और पर्यावरण दोनों का अपमान है।
9. संसाधनों का अनियंत्रित दोहन: पानी की बर्बादी, सड़कों पर कचरा फेंकना और ध्वनि प्रदूषण फैलाना; हम इन सब को अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता मान बैठते हैं, जबकि यह आने वाली पीढ़ी के अधिकारों का हनन है |
10. स्वतंत्रता बनाम स्वच्छंदता: स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में एक बहुत बारीक धागा होता है-वह धागा है 'अनुशासन' और 'उत्तरदायित्व' का। जब स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी का भाव खत्म हो जाता है, तो वह स्वच्छंदता बन जाती है जो समाज और स्वयं व्यक्ति दोनों का विनाश करती है। महान विचारकों ने कहा है कि "आपकी लाठी घुमाने की आज़ादी वहां समाप्त हो जाती है, जहां से दूसरे व्यक्ति की नाक शुरू होती है।" तेरापंथ धर्म संघ के आचार्यश्री तुलसी ने कहा कि "निज पर शासन -फिर अनुशासन" इसी तरह पंडित श्रीराम शर्मा ने कहा कि "हम सुधरेंगे -युग सुधरेगा " "हम बदलेंगे -युग बदलेगा " आइए इस स्वतंत्रता दिवस पर संकल्प लें कि हम केवल अधिकारों के उपभोक्ता नहीं, बल्कि कर्तव्यों के संरक्षक बनेंगे। जब देश का युवा वर्ग परिवार के प्रति आदर, समाज के प्रति जिम्मेदारी और देश के प्रति निष्ठा रखेगा, तभी हमारे शहीदों का सपना सही मायनों में साकार होगा।