
Udaipur Terror Attack 1986: आज 21 अक्टूबर को पुलिस शहीद दिवस है, जिस पर उन पुलिसकर्मियों को याद कर श्रद्धांजलि दी जाती है, जिन्होंने ड्यूटी के दौरान जान गंवाई। यूं तो राजस्थान सहित देशभर में शहीद पुलिसकर्मियों को याद किया जाता है, लेकिन दो परिवार ऐसे हैं, जिन्होंने 40 साल पहले अपने पुलिसकर्मी पिता को खो दिया था। ये परिवार आज भी उन्हें शहीद का दर्जा दिलाने के लिए संघर्षरत हैं। उनकी शहादत 40 साल पहले उदयपुर में हुई एक आतंकी घटना के दौरान हुई थी।
ऑपरेशन ब्लू स्टार से जुड़े आतंकियों सुखविंदर सिंह सुक्खी और हरजिंदर सिंह जिंदा ने 16 अप्रैल 1986 को आतंकी घटना को अंजाम दिया था। गोली लगने से एसआई राजेंद्र सिंह शेखावत और रोशन लाल माथुर की जान चली गई थी। घटना में जान गंवाने वाले दोनों पुलिस अधिकारियों को अब तक शहीद का दर्जा नहीं मिला है। इसकी एक बड़ी वजह यह रही कि वर्ष 2005 तक मामला कोर्ट में चला। इसके बाद इसे आतंकी घटना करार दिया गया।
इतने वर्षों में पुलिस महकमे ने भी जान गंवाने वाले इन पुलिसकर्मियों को भुला दिया था। एसआई शेखावत और माथुर के परिवार कुछ प्रयास करते रहे, लेकिन सफलता नहीं मिली। वर्ष 2019 के बाद उन्होंने प्रयास तेज किए और केंद्र सरकार तक अपनी बात पहुंचाई। इसके बावजूद एसआई शेखावत और माथुर को शहीद का दर्जा नहीं मिल सका। एसआई शेखावत की बेटी रुचि शेखावत और रोशन लाल माथुर के पुत्र सौरभ माथुर आज भी अपने पिता को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अप्रैल 1986 में 12 से 14 तारीख के बीच शहर में युवाओं के दो गुटों के बीच झगड़ा हुआ। विवाद बढ़ने और दंगा भड़कने की आशंका के चलते शहर में भारी पुलिस बल तैनात किया गया। उस समय पुलिस कंट्रोल रूम सूरजपोल दरवाजे में था। आधी रात को वहां से गुजर रही एक कार को रुकवाकर पूछताछ के दौरान आतंकियों ने फायरिंग कर दी।
इसमें सब इंस्पेक्टर राजेंद्र सिंह शेखावत, रिजर्व इंस्पेक्टर रोशन लाल माथुर, एएसपी सुरेशचंद्र पंड्या और एक अन्य अधिकारी को गोली लगी। आतंकी कार में सवार होकर भाग गए। कार में सवार चार लोगों में आतंकी सुखविंदर सिंह सुक्खी और हरजिंदर सिंह जिंदा भी शामिल थे।
दरअसल, वर्ष 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ था। इसका बदला लेने के लिए आतंकी सुक्खी और जिंदा अपनी टीम तैयार कर रहे थे। दोनों ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम देने वाले जनरल ए.के. वैद्य की हत्या करने के लिए पुणे, महाराष्ट्र जा रहे थे। वे उदयपुर से गुजर रहे थे और यहां पहले से चल रही तनावपूर्ण स्थिति में फंस गए। पकड़े जाने के डर से उन्होंने फायरिंग की थी। बाद में आतंकियों ने जनरल वैद्य की हत्या भी कर दी थी।
भीम का खेड़ा, भींडर के सहायक उप निरीक्षक चंदन सिंह भी ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले पुलिसकर्मियों में से एक हैं। उनका नाम शहीदों की सूची में तो शामिल कर लिया गया, लेकिन न तो उन्हें शहीद का दर्जा दिया गया और न ही उनके परिवार को इसका हक मिला। चंदन सिंह 9 मार्च 1971 को पुलिस बल में शामिल हुए थे। इसके बाद 5 जून 2002 को उनकी जान चली गई।
सेंट्रल जेल से कोर्ट में पेशी के लिए 14 बंदियों को लाया गया था। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत बंद सिराज को एएसआई चंदन सिंह लेकर कोर्ट पहुंचे थे। यहीं मौजूद चार बदमाशों ने फायरिंग कर दी। सिर में गोली लगने से चंदन सिंह की मृत्यु हो गई थी। उनके पुत्र गोविंद सिंह पिछले 24 वर्षों से अपने पिता को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।