
उदयपुर. किसी बच्चे के लिए सबसे बड़ी जरूरत एक परिवार होती है। मां की गोद, पिता का साया, भाई-बहनों का साथ और अपनेपन का एहसास लेकिन 34 ऐसे बीमार बच्चे भी थे जिन्हें पैदा होते ही मां ने मजबूरी या बीमारी के चलते पालने में डाल दिया। शिशुगृह में पल बढ़ रहे इन बच्चों को भारत में किसी ने नहीं अपनाया, लेकिन सात समंदर पार बैठे विदेशियों ने उन्हें परिवार का सदस्य बनाया। पहली बार इस माह दो बच्चों को भारत में नए मां-बाप मिले।वर्ष 2018 से 2026 के बीच कुल 34 बच्चों को विदेशों में दत्तक के तौर पर ग्रहण किया गया। इनमें बेटियों की संख्या ज्यादा थी। आज ये बच्चे अमेरिका, इटली, स्वीडन, स्पेन, कनाडा, यूके, माल्टा, फिनलैंड और सिंगापुर जैसे देशों में अपने नए परिवारों के साथ जी रहे हैं।
बीमारी थी सबसे बड़ी बाधा
इन बच्चों में अधिकांश विशेष आवश्यकता (स्पेशल नीड्स) श्रेणी के थे। किसी को जन्मजात हृदय रोग था, कोई श्रवण बाधिता से ग्रस्त था, तो कुछ बच्चे सेरेब्रल पाल्सी, दृष्टि संबंधी समस्याओं, न्यूरोलॉजिकल विकार, हाथ-पैर की विकृतियों और अन्य चिकित्सकीय चुनौतियों से जूझ रहे थे। विशेष आवश्यकता वाले बच्चे होने से इन्हें भारत में लेने कोई नहीं आया लेकिन केन्द्रीय दत्तक ग्रहण योसजना के माध्यम से बाद में इन बच्चों को विदेशी दंपती ले गए।
माता-पिता ने कहा, बच्चा जैसा भी हो, हमारा है
विदेशों के कई दंपतियों ने बच्चों की पूरी मेडिकल रिपोर्ट देखने और उनकी स्वास्थ्य चुनौतियों की जानकारी मिलने के बाद भी उन्हें अपनाया। उन्होंने बीमारी को कमजोरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी समझा। दत्तक ग्रहण के बाद कई बच्चों की जटिल सर्जरी हुई। कुछ को आधुनिक पुनर्वास सेवाएं मिली, तो कई बच्चों को विशेष शिक्षा और थेरेपी उपलब्ध कराई गई। जो बच्चे कभी अपने भविष्य को लेकर अनिश्चित थे, वे आज स्कूल जा रहे हैं, खेल रहे हैं और अपने नए परिवारों के साथ सामान्य जीवन की ओर बढ़ रहे हैं।
अमरीका बना सबसे बड़ा सहारा
उदयपुर से विदेश दत्तक ग्रहण के आंकड़े बताते हैं कि सबसे अधिक 15 बच्चों को अमरीका के परिवारों ने अपनाया। इसके अलावा इटली ने 6, स्वीडन ने 3, स्पेन ने 3, कनाडा ने 2 तथा यूके, माल्टा, फिनलैंड और सिंगापुर ने एक-एक बच्चे को नया परिवार दिया। शेष 19 बच्चे अन्य देशों में गए। इस वर्ष पहली बार उदयपुर के दो विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को दक्षिण भारत के परिवारों ने अपनाया है।
उदयपुर से विदेशों में दत्तक गए अधिकांश बच्चे विशेष आवश्यकता श्रेणी के थे। इनमें कई बच्चों को चिकित्सकीय उपचार, पुनर्वास और विशेष देखभाल की जरूरत थी। विदेशी दंपत्ती बच्चों की स्वास्थ्य स्थिति की पूरी जानकारी मिलने के बाद उन्हें अपनाते हैं और उनके उपचार की जिम्मेदारी भी लेते हैं। हाल के वर्षों में देश के भीतर भी ऐसे बच्चों को अपनाने के प्रति सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है।
दिशा भार्गव, अधीक्षक राजकीय विशेषज्ञ दत्तक ग्रहण एजेन्सी