
आजादी का अगला पड़ाव
- 1931 में रोपे विद्या भवन के विचार से एआइ युग तक...आज़ादी यानी सबको साथ लेकर चलना
किसी देश की आत्मा उसकी कागजी आजादी के दस्तावेज में नहीं, बल्कि कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति के चेहरे की बेफिक्र मुस्कान में सांस लेती है। 15 अगस्त 1947 ने हमें महज एक तारीख नहीं, बल्कि अपनी तकदीर खुद तराशने का अधिकार दिया था। यह आजादी हमारी अंतिम मंजिल नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण, शिक्षित, समावेशी और संवेदनशील समाज के निर्माण की दिशा में पहला कदम है। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि देश ने हमें क्या दिया, बल्कि यह कि एक नागरिक के रूप में हम इस मुल्क की लोकतांत्रिक और सामाजिक नींव को कितना मजबूत कर पा रहे हैं?
इसी वैचारिक चेतना की पृष्ठभूमि में वर्ष 1931 में स्थापित विद्या भवन की दूरदृष्टि आज भी हमारा मार्ग प्रशस्त करती है। स्वाधीनता से पूर्व ही इसने इस मौलिक तथ्य को रेखांकित कर लिया था कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के निर्माण के लिए भारत को ऐसे नागरिकों की आवश्यकता होगी जो शिक्षित होने के साथ-साथ विवेकशील, संवेदनशील और समाज के प्रति समर्पित हों।
इसके मूल में एक ऐसी समावेशी सामाजिक संरचना का स्वप्न था, जहां जाति, धर्म, भाषा, लिंग या आर्थिक स्थिति बच्चों के सपनों की सीमा तय न करे और शिक्षा हर प्रकार की असमानता को दूर करने का सशक्त माध्यम बने।
शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रतिस्पर्धा नहीं
समकालीन युग में, जब हम एआइ और तकनीकी संसाधनों के बीच जी रहे हैं, तब शिक्षा-शास्त्र के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा है क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था व्यक्ति को केवल प्रतिस्पर्धी बाजार का हिस्सा बना रही है या उसे समावेशी विकास का वाहक भी बना रही है? सफलता का मापदंड केवल व्यक्तिगत प्रगति या दूसरों को पीछे छोड़ देना नहीं हो सकता। वास्तविक शैक्षणिक प्रगति वह है जहां व्यक्ति यह अनुभव करे कि उसकी सफलता तभी सार्थक है, जब वह सामूहिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करे। इसलिए मेरी व्यक्तिगत उपलब्धि क्या है? से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह होना चाहिए कि मैंने समाज के कितने वर्गों को अपने साथ आगे बढ़ाया है? अत्यधिक बाजार-उन्मुख प्रतिस्पर्धा विद्यार्थियों में तनाव, मानसिक दबाव और संकुचित सोच को जन्म देती है। अतः आधुनिक शिक्षा का मूल उद्देश्य सह-अस्तित्व, सहयोग, संवेदनशीलता और साझी प्रगति के मूल्यों को मजबूत करना होना चाहिए।
विद्या भवन शिक्षा से जीवन-दृष्टि तक
अकादमिक दृष्टि से विद्या भवन केवल एक विद्यालय न होकर एक बहुआयामी शैक्षिक पारिस्थितिकी तंत्र है। यहां प्रारंभिक बाल्यावस्था से लेकर उच्च माध्यमिक शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण, शोध, तकनीकी पाठ्यक्रम, कृषि विज्ञान और खेल अकादमी तक शिक्षा के विविध आयाम एक साथ आकार लेते हैं। यहां शिक्षा केवल बौद्धिक विकास तक सीमित न रहकर भावनात्मक, सामाजिक और पर्यावरणीय चेतना के सर्वांगीण विकास का माध्यम बनती है। विद्या भवन की विचारधारा स्पष्ट संदेश देती है कि राष्ट्र-निर्माण केवल विशाल ढांचागत परियोजनाओं या आर्थिक आंकड़ों से संभव नहीं है, इसका मूल आधार 'मानव-निर्माण' है। हमें ऐसा समाज चाहिए जहां कोई कमजोर व्यक्ति पीछे छूटने के लिए अभिशप्त न हो।
भविष्य की जिम्मेदारी
स्वतंत्रता दिवस को केवल अतीत की उपलब्धि नहीं, बल्कि भविष्य के उत्तरदायित्व के रूप में देखना होगा। हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनानी होगी जहाँ शिक्षा विशेषाधिकार न होकर सार्वभौमिक अवसर बने। जहां सफलता अकेले आगे निकल जाने का नाम नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर आगे बढ़ने का उत्सव हो और भारत की इस प्रगति यात्रा में कोई पीछे न छूटे।
शायद स्वतंत्रता का अगला पड़ाव यही है
वो मंज़िल अधूरी है, जहां कोई पीछे रह जाए,
असली सफर वही है, जो सबको साथ ले जाए।
जय हिंद।
डॉ. फरजाना ईरफान, प्राचार्य
विद्या भवन जी.एस.टीचर्स कॉलेज, उदयपुर