अधिकांश महिलाएँ एवं पुरूष संकीर्ण विचारधारा या बहकाव में आकर छोटी-छोटी बातों को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं
- चन्द्रकान्ता शर्मा
कमला विमला को बता रही थी कि वह प्रमिला से भरी पार्टी में किए गए अपने अपमान का तो कभी न कभी बदला लेकर रहेगी। ‘हां सच ! उस दिन प्रमिला ने तुम्हारी बड़ी मिट्टी खराब करने की कोषिष की थी।’ विमला बात को तूल देने लगी थी। ‘सच, विमला तू भी देखना उसे मैं कैसे मजा चखाऊँगी। उस समय मैं चुप रह गई, हालांकि गलती थोड़ी मेरी भी थी। पर इसका मतलब यह तो नहीं कि वह सबके सामने मेरी तौहीन करने लगी।’ कमला तैष में आकर बोली। ‘अगर अब तुमने प्रमिला को सबक नहीं सिखाया तो सच समझो वह तुम पर हमेषा के लिए हावी हो जाएगी। ऐसा कुछ करो कि वह किसी को मुंह दिखाने लायक भी न रहे।’
अधिकांष महिलाएँ एवं पुरूष संकीर्ण विचारधारा या बहकाव में आकर छोटी-छोटी बातों को अपनी प्रतिष्ठा का प्रष्न बना लेते हैं और प्रतिषोध की आग में सुलग कर बदला लेने के मौके तलाषते रहते हैं चाहे सामने वाले व्यक्ति ने वह बात सही व उनके चरित्र के अनुकूल ही कही हो, पर वे तो उसे अपना अपमान समझकर बदला लेने को आतुर रहते हैं। बदला लेने की भावना से ग्रस्त स्त्री व पुरूष एक भयंकर मानसिक तनाव की स्थिति से गुजरता है जिस कारण सदैव स्वास्थ्य संबंधी हानि की आषंका बनी रहती है।
इस भावना से ग्रस्त स्त्री-पुरूष बदले की भावना का चिंतन करते रहने के कारण कभी-कभी तो इस स्थिति पर पहुँच जाता है कि उसे स्वयं को लाभ होना तो दूर उल्टा वह कानूनी पेचीदगियों में उलझ जाता है जिससे उसका सुखमय पारिवारिक जीवन सदा के लिए विषादमय बन जाता है। उसके परिवार का भविष्य अंधकारमय हो जाता है और उसका विकास रूक जाता है। बदले की भावना उन स्त्री-पुरूषों में ज्यादा पाई जाती है जिनका व्यक्तित्व बहुत संकीर्ण होता है।
वे बात-बात पर उत्तेजित हो जाते हैं और अपने चिड़चिड़े स्वभाव के कारण सदैव बदला लेने की युक्तियाँ सोचते रहते हैं। इसी कारण वह व्यक्ति सभी की दृष्टि में आलोचना का पात्र हो जाता है। यहाँ तक कि लोग उससे बात करने में कतराने लगते हैं। इसी तरह कभी-कभी तो उसके अकेले पड़ जाने के कारण जीना भी दूभर हो जाता है। सारा समाज उसकी मनोवृत्तियों से परिचित हो जाता है और लोग उसके साथ रूखाई से पेष आते हैं, जिसके कारण उसे भयंकर मानसिक त्रासदी भोगनी पड़ती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति के स्वाभिमान का ह्स होने लगता है और ऐसी दयनीय स्थिति भी आ जाती है जब उसके मन में हर किसी के सामने पूर्ण समर्पण की भावना घर कर जाती है।
अपने हाथों ही वह अपनी इज्जत खो बैठता है, जिससे उसकी सारी सामाजिक एवं पारिवारिक प्रतिष्ठिा धूल-धूसरित हो जाती है। बदले की भावना से की गई हत्या या ओर कोई जघन्य अपराध उसे आजीवन या कुछ वर्षो के लिए कारावास के नारकीय जीवन में धकेल देता है, इससे उसकी सब जगह बदनामी होती है। उसका चहुमुखी विकास, जिसके लिए वह पहले प्रयत्नषील था, रूक जाता है और जीवन तबाह होने लगता है। फिर न तो वह सरकारी कार्य कर पाता है, न समाज में प्रतिष्ठा के साथ जी पाता है। ऐसी स्थिति में उसको व उसके परिवार की जो दुर्गति होती है, उससे उबरने के लिए उसे अत्यन्त परिश्रम करने की आवष्यकता पड़ती है।
संभव है! वह फिर भी वैसी प्रतिष्ठा न बना पाए, जैसी पहले थी। अतः बदले की भावना से किया गया कार्य स्वयं के लिए हानिकारक है, न कि ओर किसी के लिए। दूसरे से अच्छा व्यवहार करके ही अपने प्रति अच्छे व्यवहार की अपेक्षा की जा सकती है। दुनिया एक कसौटी है जिस पर हर आदमी को परखा जाता है। जो इसमें खरा उतरता है, वही समाज में मान, पद-प्रतिष्ठा और लाभ प्राप्त करता है। अतः अपने व्यक्तित्व के बहुमुखी विकास के लिए प्रतिषोध व बदले जैसी भावना को त्यागना चाहिए ताकि अपने साथ-साथ दूसरे का भी हित हो।