
pushkar animal fair
- मेनका संजय गांधी
केवल किसान ही पशुओं की खरीद-फरोख्त कर सकते हैं, जबकि यहां एक भी किसान दिखाई नहीं देता। सब के सब पशु व्यापारी हैं। छोटे व्यापारी पशुओं को बूचडख़ाना मालिकों को बेच देते हैं। नियमानुसार एक व्यक्ति को दो से ज्यादा पशु नहीं बेचे जा सकते जबकि 100-१०० पशुओं को एक ही व्यक्ति को बेचा जाता हैं।
पिछले दिनों भारत सरकार ने पशु बाजारों के नियमन के लिए कुछ नए नियम जारी किए हैं। इससे केरल में बिना इन नियमों को पढ़े और समझे भारत सरकार के खिलाफ धमकियां जारी कर दी गईं। राजनीतिक कार्यकर्ता तो इतने उग्र हो गए कि एक बछड़े को बीच सडक़ पर खुलेआम मार डाला और उसका मांस इस निर्मम कृत्य के मूक दर्शक बने लोगों में वितरित कर दिया। हालांकि केरल में कोई पशु बाजार नहीं है फिर भी वहां के लोगों का आक्रोश समझ से परे है।
ये नियम दरअसल बेहद जरूरी थे। विभाजन के बाद सरकार ने किसानों की सहायता करने का विचार किया। इसके तहत सरकारी जमीन पर छोटे ग्रामीण बाजार बनाए गए ताकि किसान एक-दूसरे को पशु बेच सकें और व्यापार कर सकें। अब तक ऐसे बाजार बहुत ही छोटे हुआ करते थे। कोई किसान एक या दो पशु लेकर इस बाजार में आता और पास के ही गांव का कोई दूसरा किसान उसे खरीदता था। यहां पशुओं के लिए पानी पीने के साधन और रहने के लिए शेड उपलब्ध था। सप्ताह के अन्य दिनों में यहां ग्रामीण सब्जी, बर्तन और कपड़ों का बाजार लगाते थे। कभी खुशहाल दिखने वाला यह स्थान हिंसा और अशांति का गवाह बनने लग गया। कुछ समय बाद यह किसानों के लिए नहीं रह गया था। इस बाजार का नियंत्रण पशुओं की खरीद-फरोख्त करने वाले माफिया के हाथ में आ चुका था।
अनौपचारिक तौर पर यहां पुलिस की गश्त होती है, जो इन व्यापारियों से हफ्ता वसूलते हैं। जिन गाय-भैसों को यहां खरीद-फरोख्त के लिए लाया जाता है उनकी बिक्री और बूचडख़ाने भेजने पर कानूनन रोक है, क्योंकि ये या तो बच्चे होते हैं या फिर इनकी उम्र काफी कम होती है। इनमें से अधिकतर गर्भ धारण किए होती है, कुछ के तो सिर से पांव तक ल्यूकेमिया की बीमारी होती है। इनमें से किसी की भी उम्र 16 वर्ष से अधिक नहीं होती, 16 वर्ष या इससे अधिक की उम्र ही पशुओं के वध के लिए कानूनी तौर पर वैध मानी गई है।
अब तो शायद बार-बार वध या बूचडख़ाना शब्द का इस्तेमाल करने की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि ये ‘किसान बाजार’ ही अब किसी बूचडख़ाने से कम नहीं हैं। कानूनी नियमों के मुताबिक केवल किसान ही पशुओं की खरीद-फरोख्त कर सकते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि यहां एक भी किसान दिखाई नहीं देता। सब के सब पशु व्यापारी हैं। छोटे व्यापारी पशुओं को बूचडख़ाना मालिकों को बेच देते हैं। नियमानुसार एक व्यक्ति को दो से ज्यादा पशु नहीं बेचे जा सकते जबकि 100-१०० पशुओं को एक ही व्यक्ति को बेचा जाता है।
अपने आपको ‘किसान’ बताने वाले इन पशु व्यापारियों के पास फर्जी प्रमाण पत्र होते हैं, जिससे वे खुद को किसान साबित करते हैं। भले ही उनके पास एक एकड़ जमीन भी ना हो। खरीददार 100 जानवरों को कहां ले जाएगा और क्या करेगा, सभी यह बात जानते हैं। मौजूदा कानूनी प्रावधानों के अनुसार, इन ग्रामीण बाजारों के आसपास कोई ट्रक नहीं आ सकता; कारण यह है कि यह बाजार केवल स्थानीय व्यापार के लिए है। परन्तु हालात यह है कि इन बाजारों के चारों ओर ट्रक ही ट्रक खड़े रहते हैं और तीस से साठ जानवरों को क्रूरता से इन ट्रकों में भर कर बूचडख़ाने ले जाया जाता है।
कानून के मुताबिक एक ट्रक में 6 से अधिक जानवर नहीं लादे जा सकते, परन्तु स्थानीय प्रशासन की लापरवाही के चलते अनियमितता जारी है। ट्रकों को इन बजारों से पांच सौ मीटर दूर खड़ा किया जाता है। यह किसान अपने पशुओं को धीरे-धीरे उन ट्रकों तक ले जाता है और उनमें चढ़ा देता है। बूचडख़ाने स्थानीय नहीं हैं। वे काफी दूर होते हैं। कुछ तो दूसरे राज्यों में हैं। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के कसाई राजस्थान आ गए हैं और बिहार के हरियाणा। यहां एक प्रकार से माफिया राज कायम हो गया है और स्थानीय प्रशासन ने आंखें मूंद रखी हैं। कसाइयों ने जानवरों की कीमतें आसमान पर पहुंचा दी हैं। आम किसान तो खेत में जुताई करवाने के लिए भी पशु नहीं खरीद पाता।
ऐसे हालात के चलते ज्यादातर किसान दिवालिया हो गए हैं, क्योंकि जिन किसानों के पास पशु खरीदने के ही पैसे नहीं हैं, वे अपने छोटे से खेत के लिए मशीन कैसे खरीद पाएंगे? नए नियमों के अनुसार जिला प्रशासक, चिकित्सक, पशु चिकित्सक, एसपी, एसपीसीए, तहसीलदार, दो पशु कल्याण संगठन व चार अन्य सदस्यों को मिलाकर एक बाजार समिति बनाई जाएगी। समिति यह सुनिश्चित करेगी कि इन बाजारों में जानवरों के लिए शेड, पानी, भोजन आदि की समुचित व्यवस्था हो तथा छोटे व गर्भधारी पशुओं के लिए अतिरिक्त व्यवस्था हो साथ ही वहां का फर्श या आंगन फिसलन रहित हो और साफ सफाई की समुचित व्यवस्था हो।
इन बाजारों में तयशुदा संख्या से अधिक जानवर नहीं होंगे और इस संख्या के बारे में बाजार स्थल के बाहर लगे बोर्ड पर सूचना अंकित की जाएगी। कसाई अब भी जानवर खरीद सकते हैं। बस, वे किसान बाजार से पशु नहीं खरीद पाएंगे। पशुओं की कीमत कम होगी तो छोटे किसान उन्हें फिर से खरीद सकेंगे। इससे किसान फिर से कुछ धनार्जन कर सकेंगे। यह एक अच्छा नियम है और मैं इस अधिनियम को लाने के लिए पर्यावरण मंत्रालय को बधाई देती हूं। किसान पिछले बीस सालों से ऐसे कानून की मांग कर रहे थे।

Published on:
01 Jan 2018 09:45 am
