जिस कुलपति का चयन शिक्षाविदों एक उच्चस्तरीय समिति द्वारा किया जाता है, उसे नियुक्ति के बाद छात्र, कर्मचारी एवं शिक्षक वर्ग के सामने अपमानित होना पड़ता है
- चन्द्रकान्ता शर्मा
देश के विश्व विद्यालय वर्तमान में राजनीतिक एवं सरकारी हस्तक्षेप से पीडि़त हुए नेस्तनाबूद होने की स्थिति में हैं। प्रायः सभी विश्वविद्यालय इससे मुक्ति के लिए छटपटा रहे हैं, लेकिन शिकंजा कसता चला जा रहा है और परिसर असहाय होकर रह गए हैं। कुलपतियों की स्थिति का जायजा लिया जाए तो हालात और भी विकट हैं। जिस कुलपति का चयन शिक्षाविदों एक उच्चस्तरीय समिति द्वारा किया जाता है, उसे नियुक्ति के बाद छात्र, कर्मचारी एवं शिक्षक वर्ग के सामने अपमानित होना पड़ता है, वहीं राज्य सरकारें पृथक से उस पर अपनी मनमानी थोपकर सरकारी नीतियों की दखलन्दाजी बनाए रखना चाहता है।
धन के लिए प्रायः विश्वविद्यालयों को राज्य सरकारों पर मुख्य रूप से निर्भर रहना पड़ता है। इसके लिए राज्य सरकार कुलपतियों को नाकों चने चबवाती हैं या मनचाहा नाच नचवाती हैं, उसके बाद ही स्वीकृति अनुदान दिया जाता है, हर तीसरे माह मिलने वाली ब्लॉक ग्रांट पर कुलपतियों की फजीहत होते देखी जा सकती है अथवा परिसर को रहन रखकर विश्वविद्यालयों में ओवर-ड्राफ्ट करके वेतन वितरित किया जाता है।
विश्वविद्यालयों की यह स्थिति अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है, ऐसा होने पर उल्टा होता यह है कि राज्य सरकार कुलाधिपति, जो कि राज्यपाल होते हैं, उनके द्वारा कुलपतियों पर अधिक अनियमितताओं के आरोप लगाकर उनको जलील किया जाता है। इस दृष्टि से विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की दशा दयनीय व अत्यन्त त्रासदपूर्ण है।
जिस व्यक्ति को चयन करते समय उच्च शिक्षाविद तथा महान मानकर कुलपति का पद सौंपा जाता है, बाद में उसी को अनेक लांछनों से अलंकृत कर जांच आयोगों के कटघरे में खड़ा किया जाता है। पहले विश्वविद्यालयों में काम करो तथा बाद में किए गए कार्यो के लिए अपनी जांच कराओ। अनेक विश्वविद्यालय इसके उदाहरण हैं-जब कुलपतियों को अपार मानसिक संताप दिए गए हैं, उनके विरूद्ध जांच आयोग बैठाए गए अथवा उन्हें निलंबित करके भर्त्सना के योग्य ठहराया गया है।
भारतीय विश्वविद्यालयों की यह स्थिति असह्य और अवैधानिक होने के बाद भी कुछ नहीं होता, बस परिसर अशांत बने रहते हैं तथा अध्ययन-अध्यापन का माहोल चौपट होता रहता है। राज्य सरकार के तो कानों पर जैसे जूं भी नहीं रंगती। वह इन हालातों से बेखबर रहकर वहाँ राजनीतिक उठा-पटक तथा सरकारी हस्तक्षेप का ताना-बाना घना करने में मशगूल रहती है। इससे ये हिंसा, आगजनी, हड़ताल तथा अशांति के प्रतीक बनकर रह गए हैं तथा उनकी मूल अस्मिता भी लगभग नष्ट हो गई है। स्थापना की मूल भावना ‘गुरूकुल’ तो पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है और अब वे छात्रों, शिक्षकों एवं कर्मचारी संघों की राजनीति के अखाड़े बनकर रह गए हैं।
छात्र संघों के चुनावों की अवहेलना की जाती है तथा दूसरे छात्र गुटों को विश्वास में लेकर माहौल सुधारने का यदि कुलपति का प्रयास करते हैं तो इसे अन्यथा लिया जाता है और छात्र उत्तीर्ण होने के लिए गलत रास्ते अपनाने का सचेष्ट हो जाते हैं। जब छात्र पढ़ेंगे नहीं, पाठ्यक्रम पूरा नहीं होगा तथा वातावरण अध्ययन-अध्यापन का बचेगा ही नहीं तो सहज ही समझने की बात है कि परिसर निष्चित रूप से अशांत होंगे और एक अराजकतापूर्ण स्थिति बनेगी ही बनेगी। फिर सारी स्थितियों का दोष आता है कुलपतियों पर। सारे दोष उसके सिर मढ़कर कुलपतियों को पद त्याग के लिए विवश किया जाता है तथा इस तरह शैक्षणिक गरिमा को उस समय ताक पर धर दिया जाता है।
बदलते समय के मूल्यों के अनुसार ढ़ले उच्छृंखल छात्रों का सामना करना, अनचाहे दबावों में आना तथा स्वायत्तता के नाम पर होने वाले अवैधानिक आंदोलनों से जूझना कुलपतियों की दिनचर्या का मुख्य भाग बना हुआ है। बदलती राज्य सरकारों के दृष्प्रभाव से भी कुलपति नहीं बच पाते हैं। जिस राज्य सरकार ने कुलपति को चुना है, यदि वह चली गई है तथा नयी राजनीतिक सरकार आ गई है तो वह पहले वाली सरकार द्वारा नियुक्त कुलपति को हटाने के लिए दृढ़ संकल्प हो जाती है। इससे भी परिसर में राजनीतिक बांट बनी रहती है तथा शिक्षक एवं छात्र आने वाले के पक्ष-विपक्ष में बयानबाजी आरम्भ कर देते हैं। विश्वविद्यालय के संचालन के लिए आमतौर पर विविध समितियों का गठन किया जाता है।
वरिष्ठ प्रोफेसर के अलावा शिक्षकों का उनमें मनोनयन कर प्रजातांत्रिक तरीके से उन पर निर्णायक स्वीकृति प्रदान की जाती है, लेकिन उसके बाद भी दोषारोपण की चपेट में आता हैं, अकेला कुलपति जो राजनीतिक रूप से पीडि़त होने के बाद सबकी उपेक्षा का भी पात्र बन जाता है। सत्ता बदलते ही सभी प्राध्यापक अपने समीकरण बदल डालते हैं तथा उगते सूर्य को नमस्कार करने में तल्लीन हो जाते हैं। ऐसे समय में कुलपति कितने मानसिक तनाव को झेलता है, यह भली-भांति हम भी जान सकते हैं। उस पर तोहमतें, लांछन तथा आरोपों की बौछारें करके राज्य सरकार नये कुलपति की तलाश शुरू कर देती है।
यह सही है कि तानाशाह कुलपति के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए तथा उसके काले कारनामे सामने आने चाहिए ताकि वे सबक बन सकें, लेकिन क्या यह जाँच सर्वथा निष्पक्ष होती है ? क्या इनमें निर्दोष लोगों को प्रताडि़त नहीं कर दिया जाता है ? जब हालात सत्य के निकट हैं तो कुलाधिपति के रूप में राज्यपालों द्वारा की जाने वाली कार्रवाई पर भी प्रश्नचिन्ह लग जाता है। राज्य सरकारें इन कार्यों के लिए राज्यपालों की आड़ लेती हैं तथा अपना मनमानापन थोपे रहती हैं। आज विश्वविद्यालयों में राज्य सरकार की ओर से वित्त नियंत्रक के अलावा अनेक लेखाधिकारी, अभियन्ता, जन सम्पर्क अधिकारी, विशेषाधिकारी, कुल सचित तथा अन्य अनेक पदों पर अधिकारी प्रतिनियुक्त करके भेजे जाते हैं, यह सरकार का हस्तक्षेप करने का अप्रत्यक्ष तरीका नहीं तो और क्या है।