11 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

profile_icon

प्रोफाइल

पूर्व सैनिक और पुनर्वास

मंत्रालयों और कार्यक्रमों के साथ रणनीतिक साझेदारी से, जिसमें ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्किल इंडिया’ भी शामिल हो, वेटरन को उद्यमशीलता के साथ-साथ कौशल विकास में भी मदद मिलेगी।

3 min read
Google source verification

image

Sunil Sharma

Aug 10, 2018

opinion,work and life,rajasthan patrika article,

varun gandhi

- वरुण गांधी, सांसद

देश में सशस्त्र बलों के 25 लाख से अधिक वेटरन (सेनानिवृत्त फौजी) हैं। इनमें से अधिकांश आला दर्जे के कौशल और प्रशिक्षण से युक्त हैं और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने को तत्पर हैं। हर साल करीब 60,000 सैनिक इनमें जुड़ जाते हैं। वेटरन में शामिल होने वाले अधिकांश सैनिकों की उम्र 35 से 45 वर्ष होती है। चरणबद्ध सेवानिवृत्ति की ओर अग्रसर होने के बावजूद इनमें से अधिकांश के विशिष्ट कौशल का उचित इस्तेमाल नहीं हो पाता है।

सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों के बीच कराए गए एक सर्वेक्षण में 84 फीसदी ने बताया कि उन्हें पुनर्वास की मौजूदा सुविधाओं से लाभ नहीं हुआ है। इसी तरह, एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि वायु सेना के 82 फीसदी वेटरन को पुनर्वास में किसी भी प्रमुख संस्थान से कोई सहायता नहीं मिली। ज्यादातर सैनिकों के लिए, सेवानिवृत्ति आम तौर पर जल्दी होती है, हालांकि उनके मामले में ‘सेवानिवृत्ति’ शब्द भ्रमित करने वाला है।

मध्य-आयु में सैन्य जीवन से नागरिक जीवन की ओर जाना पुन: सामाजीकरण की प्रक्रिया है, जो एक तनावपूर्ण काम भी है। अधिकांश सैनिकों को करियर में बदलाव की स्थिति से निपटना ही पड़ता है। उन्हें सुरक्षा का पर्याय रही जगह को छोड़ ऐसे वर्कफोर्स में शामिल होना होता है, जो अपनी बनावट में ही भविष्य को लेकर अनिश्चितताओं से घिरा है। अक्सर नागरिक जीवन में वापसी के बाद सेवानिवृत्त फौजी का अधिकांश समय घर पर ही गुजरता है, जिससे समायोजन की समस्याएं भी पैदा होती हैं। ‘वन रैंक वन पेंशन’ पर बहस से इतर वेटरन के पुनर्वास पर गंभीरता से सामाजिक अध्ययन की जरूरत है।

ऐसा नहीं है कि वेटरन के लिए संस्थागत चिंता का पूर्णतया अभाव है। केंद्रीय सैनिक बोर्ड के तहत जिला सैनिक बोर्ड हैं जो पूर्व सैनिकों के लिए जमीनी स्तर पर सुविधाएं मुहैया कराते हैं, उन्हें फौरी व स्थायी रोजगार दिलाने में मदद करते हैं। इसी तरह, कैंटीन स्टोर्स विभाग पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को कैंटीन सेवाएं मुहैया कराते हैं। सशस्त्र बलों की स्थानीय सेवा संस्थाएं उन्हें प्रशासनिक सेवाएं और आम्र्ड फोर्सेज वाइव्स वेल्फेयर एसोसिएशन उनकी पत्नियों और उनके बच्चों को वित्तीय और गैर-वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

वेटरन को एक्स-सर्विसमैन कांट्रीब्यूटरी हेल्थ स्कीम के फायदे हासिल होते हैं, जिससे वे ईसीएचएस सिस्टम के माध्यम से कैशलेस चिकित्सा सुविधाओं का लाभ ले पाते हैं। सैन्य बलों में भी समायोजन की व्यवस्था है, जिसमें वेटरन रक्षा सेवा इकाइयों में 100 फीसदी योगदान करते हैं। प्लेसमेंट सेल (विशेष रूप से वायुसेना में, जिसे संतुष्टि स्तर पर कम आंका गया है) और सरकारी रोजगार केंद्र भी नौकरियां दिलाने में मदद करते हैं। इतना ही नहीं, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में आरक्षण नीति का भी वे लाभ उठा सकते हैं - हालांकि, सिर्फ 16-18 फीसदी लोग ही वास्तव में लाभान्वित हुए हैं।

एक तरफ ये इंतजाम हैं तो दूसरी तरफ इनके बारे में जानकारी का अभाव। कभी-कभी जरूरी योग्यता परीक्षा पास नहीं कर पाना भी एक कारण है। अच्छा तो ये हो कि सरकार वेटरन के लिए नौकरियों में, खासकर केंद्रीय सुरक्षा बलों में, समायोजन के मौकों का विस्तार करे, उनके सैन्य सेवा से बाहर आते ही सार्वजनिक क्षेत्र में नई नौकरी दिलाने की व्यवस्था पर विचार करे।

पूर्व सैनिक फिर से नया कौशल हासिल कर सकें, इसके लिए डाइरेक्टरट जनरल ऑफ रिसेटलमेंट (डीजीआर) नाममात्र का शुल्क लेता है। इसके लिए प्रतिष्ठित संस्थानों में विभिन्न पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं। पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते भी ऐसे पाठ्यक्रमों का बहुत ज्यादा लोग चुनाव नहीं कर पाते हैं (औसतन 170 सालाना, रक्षा मंत्रालय, 2016)। हालांकि कई पाठ्यक्रम उच्च गुणवत्ता के होने के बावजूद बाजार की जरूरतों के मुताबिक नहीं हैं। आदर्श स्थिति ये होगी कि डीजीआर उपयोगी सर्टिफिकेट्स और पाठ्यक्रमों की जरूरतों को समझने के लिए उद्योग के साथ मिलकर काम करें और कुशल वेटरन सरकारी कार्यक्रमों से जोड़े जाएं। मंत्रालयों और कार्यक्रमों के साथ रणनीतिक साझेदारी से, जिसमें ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्किल इंडिया’ भी शामिल हो, वेटरन को उद्यमशीलता के साथ-साथ कौशल विकास में भी मदद मिलेगी।

ब्रिटिश सरकार भी आम्र्ड फोर्सेज अनुबंध (2011) में पूर्व सैनिकों का पुनर्वास सुनिश्चित करने को पूर्ण समर्थन देती है और सशस्त्र बलों में सेवा करते हुए होने वाले नुकसान की भरपाई के साथ ऋण, हेल्थकेयर, सोशल हाउसिंग और नौकरी दिलाने में मदद का वादा करती है।

आदर्श स्थिति तो यह होगी कि सेवानिवृत्ति के बाद वेटरन को अपने हाल पर न छोड़ा जाए। सरकार को, निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी में, नागरिक समाज में उनका पूर्ण एकीकरण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। प्रभावी पुनर्वास के बिना सेवा में कार्यरत जवानों के मनोबल को बनाए रखना कठिन होगा। यह प्रतिभाशाली युवाओं को सशस्त्र बलों में शामिल होने से हतोत्साहित करेगा। सैन्य बलों की भर्ती और प्रशिक्षण पर जोर देने के साथ सशस्त्र बलों से उनकी गरिमामयी विदाई सुनिश्चित करने पर भी जोर देना होगा।